गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाध महिमा का अंग ७७
सो मूरत क्यूँ ना पूजहीं पत्थर ढेला डार ।
सीता लछमन राम के लीजे चरन जुहार ॥४६॥
ग्यारह रुद्रों पर तपै द्वादस मद्ध मिलाप ।
सूछम मूरत सूँरते ब्रह्म सब्द गरगाप ॥५०॥
कोट धुजा१ किस काम का सूम सकल है चाल ।
असी गंज२ बाँटे नहीं परा तासु पर ज्वाल३ ॥५१॥
दिल दानी है तासुका सदाबरत मन माहिं ।
पृथ्वी पारस हो रही हुन बरषी जिस ठाहिं ॥५२॥
सुअर गऊ कूँ खात है बिसमिल४ करै हमेस ।
दोऊ दीन दोजख गये जम तेहि पकरे केस ॥५३॥
करदी करद५ चलावहीं जीव जोनि पर जाय ।
नैन बैन सूँ मिलि रहा छाती परदे पाय ॥५४॥
यह तो काफिर करम है धरम नहीं यह पाप ।
द्रोही नबी रसूल के डूबेंगे गरगाप ॥५५॥
जिव हिंसा जो करत हैं या आगे क्या पाप ।
कंटक जूनि जहान में भेंटा सिंह अरु साँप ॥५६॥
आतम प्रान उधार ही ऐसा धरम न और ।
कोटि जग्ग असुमेध फल सब्द समाना भौर ॥५७॥
॥ साध महिमा का अंग ॥
धन जननी धन भूमि धन धन नगरी धन देस ।
धन करनी धन सुकुल धन जहाँ साध परबेस ॥ १ ॥
जा ऊदर साधू बसै सो ऊदर है पाख६ ।
(१) पहिले कायदा था कि पूरे करोड़ रुपये पर एक फरहरा खड़ा कर दिया करते
थे जो निशान करोड़पती होने का समझा जाता था। (२) खज़ाना । (३) ज़वाल ।
(४) ज़िबह । (५) छुरी । (६) पाक ।
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