गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
साँच का अंग ५५
महाभारत के जंग में पाँच उबारे पंड ।
जुगन जुगन की भक्तनी घंटा लै रख अंड १ ॥२४॥
साँचों के संगति रहै झूठों सेतीं दूर ।
परमेसुर करुना मई रहै सकल घट पूर ॥२५॥
बालमीक आये सुपच बजा पाँच-जन नाद ।
पंडों जग असुमेध में एकै पाया साध२ ॥२६॥
(१) भगवंत ने अरुही चिड़िया की प्रार्थना पर महाभारत के मैदान में उसके अंडों
की रक्षा के लिये हाथी का घंटा गिरा कर उन को ढाँक कर बचा दिया । (२) पांडवों के
राजसूय यज्ञ में यद्यपि पृथ्वी भर के सब ऋषीश्वर और मुनीश्वर और योगीश्वर आदि
उपस्थित थे पर श्रीक्रुशन का पंचजन्य शंख जो चिन्ह यज्ञ के सुफल होने का है नहीं बजा ।
राजा युधिष्ठिर ने कारण पूछा तो श्रीक्रुशन ने उत्तर दिया कि यह सब जो जमा हुए हैं
अहंकारी हैं इनमें कोई सच्चा भक्त नहीं है, जाओ बाल्मीकि नामक स्वपच अर्थात् डोम
को जो सच्चा भक्त और महात्मा है आदर सहित बुला लाओ तब यज्ञ सुफल होगा ।
यह सुनकर भीमसेन स्वपच को बुलाने को भेजे गये । भीमसेन ने अहंकार से स्वपच से
कहा कि चल तुझे राजा ने याद किया है । स्वपच ने जवाब दिया कि मैं पूजा पर बैठा
हूँ जरा माला मेरी खूँटी से उतार कर मुझे दे दीजिये तो जाप करके तुर्त चला आऊँ ।
भीमसेन ने कुभाव से माला को खूँटी से उतार कर देना चाहा पर यद्यपि उनको अस्सी
हजार हाथी का बल था उस माला को न उठा सके, फिर भी अहङ्कार न छूटा और नाक
भौँ चढ़ा कर बोले कि तूही उठ कर लेले मुझे देर होती है । जब भीमसेन लौट कर गये तो
श्रीक्रुशन से कहा कि महाराज स्वपच थोड़ी देर में हाजिर होता है । श्रीक्रुशन हँस कर
युधिष्ठिर से बोले कि आप खुद जाकर बुला लाइये । जब राजा युधिष्ठिर स्वपच के घर
पहुँचे तो उसे खिचड़ी पकाते पाया, बड़ी आधीनता से प्रार्थना की कि यज्ञ में सुशोभित
होकर उसे सुफल कीजिये । स्वपच बोला कि मैं तो नीच डोम यज्ञ में बैठने योग्य नहीं
हूँ पर राजा की आज्ञा सिर आँखों पर धरता हूँ जरा खिचड़ी खा लूँ । राजा ने जवाब
दिया सब काम से निपट लीजिये मुझे जल्दी नहीं है । स्वपच ने हाँडी से थोड़ी खिचड़ी
निकाल कर राजा के सामने धरी, राजा ने यह कह कर कि धन्य भाग उसके जिसे भक्तों
का प्रसाद मिले पूरे भाव से हाथ फैलाया परन्तु स्वपच ने अपना हाथ खींच लिया कि
ऐसा नहीं हो सकता और उठकर राजा के साथ हो लिया । जब यज्ञ में पहुँचा तो श्रीक्रुशन
ने पांडवों की स्त्री द्रोपदी से उत्तम उत्तम प्रकार के भोजन बनवा रक्खे थे जिसे थालों में
रुकमिणी जी ने सजाकर स्वपच के सामने धरा । स्वपच मीठे सलोने खट्टे इत्यादि सब
प्रकार के भोजन एक साथ सान कर मुंह में भरने लगा । यह तमाशा देख कर द्रोपदी के
जी में आया कि आखिर डोम मेरे पकाये हुए उत्तम खानों का स्वाद क्या जाने । इस
खयाल के उपजते ही स्वपच ने हाथ खींच लिया और पंचजन्य शंख जो उसके आते ही
बजने लगा था एक बारगी बन्द हो गया तब लोग फिर श्रीक्रुशन के समीप आये । श्रीक्रुशन
बोले कि द्रोपदी से पूछो कि उसके जी में क्या खयाल गुजरा । द्रोपदी बड़ी लज्जित
५६ गरीबदास जी की बानी
भेखों के लसकर फिरैं बानी चोर कठोर ।
सतगुर धाम न परसहीँ चौरासी के ढोर१ ॥२७॥
पारंगत२ परिचय नहीं बानी कहै बनाय ।
धरमराय दरगह३ सड़ै झूठा लतरी४ खाय ॥२८॥
कपटी कूँ भावै नहीं भगित मुक्ति की रीत ।
झूठा लंगर फिरत है साधों टोहत सीत५ ॥२६॥
साँचे सूरे संत हैं मरदाने जूझार६ ।
लाख दोस ब्यापै नहीं एक नाम की लार ॥३०॥
सत्त सुकृत अरु बंदगी जा उर ज्ञान विवेक ।
साध रूप साँईं मिले पूरन ब्रह्म अलेख ॥३१॥
सत्त सुकृत संतोप सर आधीनी अधिकार ।
दया धरम जा उर बसै सो साँईं दीदार ॥३२॥
आदि अंत मध संत हैं रंचक झूठ जहान ।
कपटी जुग जुग कपट है लख चौरासी खान ॥३३॥
साँचे कूँ संका नहीं झूठे भय घर माहिं ।
बिचार का अंग ५७
साहब सेती दोसती सन्तों सेती प्यार ।
तिन्ह को संका है नहीं धरमराय दरबार ॥३८॥
॥ बिचार का अंग ॥
ज्ञान बिचार न ऊपजै क्या मुख बोलै राम ।
संख बजावै बादई रते न निरगुन नाम ॥ १ ॥
ज्ञान बिचार बिबेक बिन क्यों दम तोरै स्वाँस ।
कहा होत हरि नाम सूँ जो दिल ना बिस्वास ॥ २ ॥
ज्ञान बिचार बिबेक बिन क्यों भौंकत है स्वान ।
दस योजन जल में रहै भीजत ना पाखान ॥ ३ ॥
ज्ञान बिचार बिबेक बिन क्यों रेंकत खर गीध ।
कहा होत हरि नाम सूँ जो मन नाहीं सीध ॥ ४ ॥
समझ बिचारे बोलना समझ बिचारे चाल ।
समझ बिचारे जागना समझ बिचारे ख्याल ॥ ५ ॥
करै बिचारै समझ कर खोज बूझ का खेल ।
बिना मथे निकसै नहीं है तिल अंदर तेल ॥ ६ ॥
जैसे तिल में तेल है यौं काया मध राम ।
कोल्हू में डारे बिना तत्त नहीं सहकाम ॥ ७ ॥
बिचार नाम है समझ का समझ न परी परख ।
अकलमंद एकै घना बिना अकल क्या लख ॥ ८ ॥
बिना बिचारे क्या लहै कस्तूरी भटकंत ।
बिन बूझे नहिं पाइये गाँव डगर मग पंथ ॥ ६ ॥
ज्ञान सफा के चौक में जहाँ बिचार बिबेक ।
कुटिलाई जिव बहुत हैं निरमल अंगा एक ॥१०॥
बिना बिचारे भरम है सुरपति सारखा होय ।
गौतम रिषि गुरुवा बड़े जा की पत्नी जोय१ ॥११॥
(१) बिना विचार के इन्द्र सरीखा दूषित हो जाता है जिसने अहिल्या के संग
प्रसङ्ग किया ।
द्वितीय खण्ड: सतलोक-वर्णन, काल-निरंजन माया भेद
५८ गरीबदास जी की बानी
बिना बिचारे बिचरता बैरागी सुकदेव ।
सप्त पुरी में गमन कर ढूँढ़े जनक बिदेह¹ ॥१२॥
गोरखनाथ सुनाथ है जंतर मंतर जोग ।
सतगुरु मिले कबीर से काटे दीरघ रोग² ॥१३॥
गँधरपसेन गदहा भया पुत्तर पिता सराप ।
बिना बिचारे पैठ माँ सुना उरबासी लाप³ ॥१४॥
जादो गये बिचार बिन भरमे छप्पन क्रोड़ ।
दुर्बासा से छल किया लागी मोटी खोड़⁴ ॥१५॥
(१) शुकदेव जी के पिता व्यास जी ने उनको बहुत समझाया कि घर के त्याग
करने से कुछ परमार्थ का काम नहीं बनता पर शुकदेव जी के मन में यह बात न बैठती थी
सातो पुरी इत्यादि की यात्रा करते ही रहे तब व्यासजी ने थक कर उनसे कहा कि
एक बेर राजा जनक से मिल लो फिर जो जी में आवे सो करो । शुकदेव जी राजी हुए
और राजा जनक के पास गये । राजा जनक को राज्य कार्य में फँसा हुआ देख कर इन
के मन से उनकी महिमा जाती रही । जब जनक ने पूछा कि कैसे आये तो उत्तर दिया
कि पिता जी से आपके ज्ञानी और विदेह होने की महिमा सुनी थी सो देख लिया और
हम तो बन में एकान्त वास करेंगे । इस पर राजा जनक ने अपने तपोबल से ऐसा
चमत्कार किया कि राज्य भवन में जहाँ वह बैठे थे बड़े जोर से आग लग गई । राजा
जनक निश्चिन्त बैठे अपना काम करते रहे परन्तु शुकदेव जी अपनी कोपीन और
कमंडल सम्हाल कर भागने लगे । इस पर राजा हँसे और कहा कि इसी को त्याग
कहते हो ! मेरा सब महल और माल जल रहा है सो मुझे फिकर नहीं है और तुम एक
लँगौटी के बचाने में बेचैन हो गये, याद रक्खो कि जितना तुम को अपनी लँगौटी
और कमण्डल का बन्धन है उतना मुझे अपने सकल राज का नहीं है । त्याग मन में
होता है तन से नहीं, जब तुम्हारे संग तन, दसों इन्द्री, मन और पंच भूत का कुटुम्ब
लगा है तो बाहरी कुटुम्ब के त्याग से क्या होता है । शुकदेव जी यह सुन कर बहुत
लज्जित हुए और फिर बन बास का ख्याल छोड़ दिया । (२) गोरखनाथ जी कबीर साहब
का नाम सुन कर उनकी परीक्षा के अभिप्राय से काशी में आये और आकाश में त्रिशूल
पर आसन मार कर बैठे और कबीर साहब को आवाज दी कि यहीं आवो तो वार्तालाप
करें । कबीर साहब ने जवाब दिया कि आप बड़े सिद्ध हैं मैं तो महा अधम हूँ क्योंकर
आप तक पहुँच सकता हूँ । फिर कबीर साहब ने सत्यलोक में जो पिण्ड और ब्रह्मांड के
परे है आसन लगाकर गोरखनाथ को दया से दर्शन दिये । गोरखनाथ चकित हो गये
और कबीर साहब के पूरे सतगुरु होने के कायल होकर चरणों पर गिरे यह कबीर
गोरख की गोष्ठी में प्रसिद्ध कथा है ।
(३) राजा गन्धर्पसेन को उरबसी अप्सरा का गान सुनकर मोहित होने से गदहे
का चोला धारण करना पड़ा। (४) खोड़ = बड़ा अपराध—एक समय दुर्बासा ऋषि
बिचार का अंग ५६
इजै बिजै थे पौरिया बिसुन पौर दरबान ।
बिन बिचार राकस भये बड़ कलंक है मान१ ॥१६॥
रावन सिव का तप किया दीन्हे सीस चढ़ाय ।
दस मस्तक बीसो भुजा जो दीन्हे सो पाय२ ॥१७॥
घूमते घूमते द्वारिका में पहुँचे जहाँ छप्पन करोड़ यादवों के लड़के खेल रहे थे। लड़कों
ने कलोल में श्रीकृष्ण के पुत्र परम सुन्दर शाम्ब को स्त्री का रूप बना कर उसके पेट पर
एक तवा बाँध दिया जिसमें गर्भवती मालूम हो, फिर ऋषि के सन्मुख ला कर कहा कि
यह स्त्री गर्भवती है लज्जा से बोलती नहीं पर जानना चाहती है कि इस गर्भ से पुत्र
होगा या कन्या । दुर्वासा ध्यान से असल बात समझ गये और क्रोध में आकर शाप
दिया कि इस गर्भ से लोहे का मूसर उत्पन्न होगा जो सारे यादवों के बंश का नाश
करेगा। यह सुन कर लड़के घबरा गये और जो शाम्ब के पेट का कपड़ा खोला तो तवे
के बदले उसमें से लोहे का मूसर गिर पड़ा। जब यह समाचार श्रीकृष्ण को मिला उस
समय यह यादवों की सभा के बीच में बैठे हुए थे। यादवों ने सलाह करके मूसर को
लोहार से रेतवा कर समुद्र में डलवा दिया और एक छोटा सा टुकड़ा जो नहीं रेता गया
उसको भी समुद्र में डलवा दिया। कितने दिन पीछे समुद्र की लहरों से वह रेत
किनारे लगकर जम आई और पटेरा (सरपत) रूप हो गई और इसी को ले ले कर
प्रभास क्षेत्र से लौटती बेरा यादव लोग नशे की हालत में आपस में लड़ कट मरे ।
लोहे के बचे हुए टुकड़े को एक मछली लील गई थी जब वह जाल में फँसी तो वह लोहा
एक ब्याध के हाथ लगा और उसने उस टुकड़े की अपने तीर की गाँसी बनाई। यादवों
के संहार के बाद पीपल के पेड़ के नीचे पैर पर पैर रक्खे श्रीकृष्णचन्द्र बैठे थे, दूर से
उनके चरण की चमक को मृगा के कान समझ कर बहेलिया ने तीर मारा जिससे उनका
शरीर छूट गया।
(१) बैकुंठ में भगवान के पार्षद जय, विजय द्वारपाल पहरा दे रहे थे, कि ब्रह्मा
के मानसिक पुत्र सनक, सनन्दन, सनत्कुमार चारो ऋषि जिन की सदा पाँच बरस
की अवस्था रहती है भगवान के दर्शन को आये। दोनों द्वारपालों ने उनको
लड़का समझकर बेत से रोक दिया । ऋषियों को इस अपमान पर क्रोध आया और
शाप दिया कि तुम दोनों पृथ्वी पर जा कर राक्षस योनि को प्राप्त हो । इसी बीच में
बिष्णु भगवान मुसकाते हुए वहाँ आ पहुँचे । ऋषि लोग उनको देख कर अपने शाप
पर लज्जित हुए और कहा कि तीन जन्म में तुम दोनों का उद्धार हो जायगा । भगवान
बोले कि यह हमारी इच्छा से हुआ और ऋषियों को आदर पूर्वक महल में ले गये ।
फिर यही दोनों द्वारपाल पहिले जन्म में हिरण्यकश्यिप और हिरण्याक्ष, दूसरे जन्म
में रावण और कुम्भकर्ण और तीसरे जन्म में शिशुपाल और दन्तवक्र हुए, तिस के बाद
बैकुंठ को गये ।
(२) रावण ने शिव जी की भारी तपस्या की और कितनी ही बार अपने मस्तकों
को काट काट कर शिव जी के प्रसन्न करने को अग्नि कुंड में होम कर दिया इसी से
६० गरीबदास जी की बानी
लंक राज रावन किया खोया बिना बिचार ।
पलक बीच परलय भये लंका के सरदार१ ॥१८॥
सीता सतवन्ती सही रामचन्द्र की नार ।
रावन दानै छल लई बिनही ज्ञान बिचार१ ॥१९॥
पारासर सेवन करै कुटिल कला घट माहिं ।
कन्या सूं संगम किया ज्ञान बिचारा नाहिं२ ॥२०॥
उद्दालक के नासकेत गये फूल बनराय ।
पिता बचन जब मेटिया तौ जम नगरी जाय३ ॥२१॥
रामचन्द्र जी जब उसके सिर काटते थे तो तुर्त दूसरे सिर उनकी जगह निकल आते थे ।
इससे यह सिद्ध हुआ कि जो दे सो पावे ।
(१) जब श्रीरामचन्द्र मारीच राक्षस को जो मृग का रूप धारण करके प्रगट हुआ
था मारने गये और लक्ष्मण जी भी जिनको रामचन्द्र सीता जी की रक्षा के लिए छोड़
गये थे सीता जी के कटु बचन से रामचन्द्र जी की खोज में चले तो उन्होंने सीता के
चारो ओर एक लकीर खींच दी कि उसके बाहर कदापि पग न धरैं । सीता जी को अकेली
पाकर रावण यती का भेष धर कर भीख माँगने आया । सीता जी ने देखा और भीतर
से भीख देना चाहा तब यती रूपी रावण बोला कि मेरे गुरु ने बँधी भिक्षा लेने का
निषेध किया है। सीता जी धर्म लोप से डर कर भिक्षा देने लकीर के बाहर निकलीं
कि रावण ने तुर्त सीता सती को दान करते हर लिया । इसी अत्याचार के प्रभाव से
रावण ने लंका को जलवाया और आप मिट्टी में मिल गया ।
(२) पाराशर ऋषि ने मच्छोदरी से नाव में भोग किया (यह कन्या उन्हीं के
बीज से मछली के पेट से पैदा हुई थी जो बीज गंगा में नहाते वक्त ऋषि जी का किसी
समय में गिर गया था और एक मछली ने खा लिया था) उस मच्छोदरी ने कहा
अभी दिन है लोग देखते हैं तब ऋषि ने अपनी सिद्ध शक्ति से अँधेरा कर दिया आकाश
में बादल आ गये । फिर स्त्री ने कहा मेरे बदन से मच्छी की बदबू आती है ऋषि ने
बदबू को बदल के खुश्बू कर दिया । नतीजा इस संगत का यह हुआ कि व्यास जी उस
मच्छोदरी से पैदा हुए ।
(३) उद्दालक ऋषि के पुत्र नासकेत जी के पिता ने आज्ञा दी कि पूजा के लिये
पुष्प जल्द लाओ । नासकेत फूल लेने बन को गये पर देर लग गई और ऋषि जी
की पूजा का समय निकल गया । जब नासकेत जी लौट कर आये तो पिता क्रोध
से बोले कि क्या तुम यमपुरी होकर आये जो इतनी देर लगाई । यह सुन कर
नासकेत पिता को पुष्प इत्यादिक देकर प्रणाम कर यमपुरी को चले गये और अपने
तपोबल से उसी देह से लौट आये । उद्दालक ऋषि ने यह देख कर पुत्र को गले से
लगा लिया कि उसकी योग सिद्धि पूर्व जन्म की है और अपने बेबिचारे बचन पर
बहुत पछतावा किया ।
विचार का अंग ६१
नारद मुनि निरगुन कला ततबेता१ तिहुँ लोक।
नर सेतीं नारी भया यह हीना बड़ धोख२॥२२॥
(१) तत्व ज्ञानी।
(२) एक समय नारद मुनि ने बैकुंठ में जाकर भगवान से कहा कि
महाराज अब मैंने आपकी माया को जीत लिया। भगवान मुस्कुरा कर बोले कि
आप बड़े ज्ञानी हैं आप के लिये माया को जीत लेना क्या बड़ी बात है, इस पर
नारद मुनि फूले न समाये। थोड़ी देर पीछे भगवान ने मुनि जी से कहा कि आज
कान्यकुब्ज देश के राजा से मिलने को हम जाते हैं आप का जी चाहे तो हमारे
साथ गरुड़ पर आप भी सवार हो लीजिये। यह सुन कर नारद भी भगवान के
साथ चले। कान्यकुब्ज देश की सीमा पर बन में एक सुन्दर ताल देख पड़ा नारद
जी की इच्छा से विष्णु भगवान वहाँ उतरे और कहा कि आप का चित्त चाहे तो
झटपट स्नान पूजा कर लीजिये। नारद जी स्नान के लिये नदी में धंसे जब डुबकी
लगा कर उछले तो स्त्री हो गये और इस बीच में बिष्णु गरुड़ पर चढ़ कर बैकुंठ को
लौट आये। नारद जी स्त्री वेष में बिचारने लगे कि मैं सुन्दर युवा स्त्री हूँ मेरे योग्य
पति भी मिलना चाहिये। इतने में वहाँ का राजा शिकार खेलता हुआ पहुँचा और स्त्री
पर मोहित होकर पूछा कि तुम किस की कन्या हो और इस बन में क्या करने आईं।
स्त्री बोली कि मैं कुछ नहीं कह सकती आप को जो उचित जान पड़ै सो कीजिये। राजा
उस सुन्दरी को घोड़े पर बैठा कर अपने राजभवन में लाये और अपनी पटरानी
बनाया और दोनों बड़े प्रेम से रहने लगे। समय पाकर रानी को १२ पुत्र और १२
कन्या उत्पन्न हुईं फिर उनके बिवाह होकर १२ पतोहू और बारह दामाद घर आये
और पोते और नातियों की नई टकसार खुली। अब तो रानी को बड़ा अहंकार हुआ
कि मेरे बराबर संसार में कौन भाग्यवान हो सकता है। इस तरह रानी-रूप नारद के
साठ बरस बीते। उस समय एक दूसरे देश के राजा ने उस पर चढ़ाई की और युद्ध
में रानी के बारहों पुत्र मारे गये। रात को जब लड़ाई बन्द हुई रानी अपने पति को
लेकर लड़कों के छिन्न भिन्न मृतक शरीर उठा लाई और अति विलाप करने लगी
कि मुझ सी दुखिया अभागी संसार में दूसरी न होगी। गर्व-प्रहारी भगवान को यह
दीन दशा नारद की देख कर दया आई और ब्राह्मण का रूप धर कर प्रगट हुए और
रानी को समझाया कि इस रोने पीटने से क्या मिलेगा तुम्हारे पुत्र प्यासे मारे गये हैं
इससे जल्द स्नान कर के उनको तिलांजलि दो जिसमें उनकी प्यास बुझै मंत्र हम
पढ़ देंगे। ऐसा सुन कर रानी झटपट उसी ताल में स्नान को धँसी जब गोता लगा
कर पानी के ऊपर सिर निकाला तो जटा लटकाये मूँछ बढ़ाये नारद का रूप हो गई
और भौंचक्की होकर इधर उधर देखने लगी। भगवान भी अपना रूप धारण करके
नारद से बोले कि मुनिजी देखते क्या हो जल्द अपनी लँगोटी पहिन कर तुम्बा उठाओ
और मेरे साथ चलो राजा से मिलने को देर होती है। नारदजी दौड़ कर भगवान
के चरणों पर गिरे और कहा कि धन्य आपकी माया वह आप ही के आधीन है
और मैं आप की शरण हूँ। भगवान मुस्कुरा कर बोले कि आप यह कैसी बहकी
बातें करते हो अभी तो आपने छिन भर हुआ गोता लगाया था। नारद बोले कि अब
६
६२ गरीबदास जी की बानी
पुत्र बहत्तर बाक छल नर से नारी कीन्ह ।
मान डिंभ छूटा नहीं ततबेता मतहीन ॥२३॥
भृगू भरम में बह गये कीन्हा नहीं बिचार ।
त्रिभुवन नाथ बिसंभरै लात घात करतार१ ॥२४॥
बिन बिचार तन क्या धरे कुटिलाई बस प्रान ।
नाहीं सुरत सरीर की ता घट कैसा ज्ञान ॥२५॥
गोपी लुट गईं कृस्न की अर्जुन सरिखे संग ।
लख संधानी बान कर जीते भारी जंग२ ॥२६॥
काबा गोपी लूटिया अर्जुन चले न बान ।
होनी होय सो होत है समझ बूझ यह ज्ञान२ ॥२७॥
रहने दीजिये और मुझे राजा के पास जिस की रानी बन कर साठ बरस साथ रही
फिर न ले चलिये ।
(१) एक समय देवताओं में यह विचार होने लगा कि ब्रह्मा बिश्नु और
महादेव में कौन बड़ा है इसे परीक्षा लेने को सब देवता और ऋषियों ने भृगुजी
को भेजा । भृगुजी पहले अपने पिता ब्रह्मा के सामने आये और प्रणाम नहीं किया
जिस पर ब्रह्मा को ऐसा क्रोध आया कि शाप देना चाहा पर मुर्ख लड़का समझ कर
रुक गये । फिर भृगु जी कैलाश में महादेव जी के पास गये शिव उनको देख कर बड़े
आदर से भेटने को चले कि भृगु ने पीछे हट कर कहा कि खबरदार हम को छुओ
नहीं क्योंकि अशुद्ध चिता-भस्म और मुंडमाल धारण किये हो । यह सुन कर
महादेव जी क्रोध में भर त्रिशूल लेकर भृगुजी को मारने दौड़े भृगुजी भागते भागते
बैकुण्ठ में जा घुसे तब बचे । बैकुण्ठ में पहुँचने पर भृगु ने बिश्नु को सुख सय्या पर
सोता पाया जिस पर उन्हों ने बड़े जोर से बिश्नु की छाती में लात मारी । बिश्नु
महाराज चौंक पड़े और भृगु के चरण पकड़ कर सुहराने लगे और बोले कि कहाँ
बज्र से अधिक कठोर मेरा हृदय और कहाँ पुष्प से भी कोमल आपका चरणारबिन्द
इससे मेरे जगाने में आपको बड़ा कष्ट हुआ क्षमा कीजिये । भृगुजी ने शरमा कर सिर
नीचा कर लिया । फिर देवताओं की सभा में जाकर खबर दी कि तीनों देवताओं में
बिश्नु सब से बड़े हैं क्योंकि वही शान्त हैं ।
(२) जब कृष्ण भगवान का इस संसार से कूच करने का समय आया तो
अर्जुन से कहा कि आज के सातवें दिन द्वारिका को समुद्र डुबा लेगा इस लिये तुम
हमारी स्त्रियों को माल असबाब समेत हस्तिनापुर को ले जाओ तुम उनकी रक्षा करने
की सामर्थ्य रखते हो । यह सुन कर अर्जुन सब स्त्रियों को लेकर रवाना हुए रास्ते में
काबा अर्थात् भीलों ने लूटने को घेरा । अर्जुन ने डाकुओं के मारने को अपना गांडीव
धनुष चलाना चाहा परन्तु चलाने की कौन कहे उसको चढ़ा भी न सके, वह सामर्थ्य और
बल श्रीकृष्णचन्द्र के साथ ही गुप्त हो गये और जिस अर्जुन ने अठारह अक्षौहिणी दल
जरना का अङ्ग ६३
॥ जरना १ का अंग ॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों पृथिवी तत थीर ।
खोदे से कसकै नहीं ऐसा बज्र सरीर ॥ १ ॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों अप २ तेज अनूप ।
न्हावै धोवै थूक दे तामस नहीं सरूप ॥ २ ॥
ऐसी जरना चाहिये पवन तत्त परमान ।
कुटिल बचन कोई कहै मानै नहीं अमान ॥ ३ ॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों अगिन तत्त में होय ।
जो कुछ परै सो सब जरै बुरा न बाचै कोय ॥ ४ ॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों गगन तत्त गलतान ।
बुरा भला बाचै नहीं ता में सकल समान ॥ ५ ॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों तरवर ३ के तीर ।
काटै चीरै काठ को तौ भी मन है धीर ॥ ६ ॥
बृच्छ नदी अरु साध जन तीनों एक सुभाव ।
जल न्हावै फल बृच्छ दे साध लखावै नाँव ॥ ७ ॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों घनहर ४ जल मेह ।
सबही ऊपर बरसता ना दिल दोष सनेह ॥ ८ ॥
दीठी अनदीठी करैं जिन की लूँ मैं दाद ५ ।
सँग से कभी न बिच्छरूँ खेलूँ आदि अनाद ॥ ९ ॥
दीठी अनदीठी करैं जिन की लूँ मैं दाद ।
सँग से कभी न बिच्छरूँ परम सनेही साध ॥ १० ॥
दीठी अनदीठी करैं जिनकी लूँ मैं दाद ।
सँग से कभी न बिच्छरूँ हर दम नाम अराध ॥ ११ ॥
महाभारत में उसी धनुष बाण से सबको जीता था उनके देखते देखते काबों ने सब
स्त्रियों को लूट लिया ।
(१) सहना, आपा घालना, लगन । (२) जल । (३) पेड़ । (४) गहरा बादल ।
(५) न्याय, बख्शिश ।
६४ गरीबदास जी की बानी
दीठी अनदीठी करें सब अपने सिर लेहिं ।
सँग से कभी न बिच्छूरूँ जो मुझ सरबस देहिं ॥१२॥
दीठी अनदीठी करें जिन के हूँ मैं संग ।
भक्ति पुरातम देत हैं चढ़त नवेला रंग ॥१३॥
दीठी अनदीठी करें जिनके हूँ मैं साथ ।
भक्ति पुरातम देत हैं पीड़ा लगै न गात ॥१४॥
दीठी अनदीठी करें जिनके हूँ मैं तीर ।
बजर टूटते राखहीं पीड़ा नहीं सरीर ॥१५॥
दीठी अनदीठी करें सो साधू परबीन ।
नाम रते निरबंध हैं छाँड़े दोनों दीन ॥१६॥
दीठी अनदीठी करें सो साधू सिर-पोस ।
जो बीतै सो सिर धरैं देहिं न काहू दोस ॥१७॥
दीठी कूँ कहि देत हैं जिनके दिल नहिं थीर ।
ता के सँग हम ना रहें सो कुट्टन बेपीर ॥१८॥
जरना जोगी जगतगुरु जरना है जगदीस ।
जरना आप अलेख है राखो अपने सीस ॥१६॥
जरना जोगी जगतगुरु जरना अलह अलेख ।
जरना कभी न डिगमिगै जरना निःचल देख ॥२०॥
जरना जोगी जगतगुरु जरना आप करीम ।
जरना हमरे उर बसै जम नहिं चंपै सीम¹ ॥२१॥
जरना जोगी जगतगुरु जरना अलख अलाह ।
जरना कूँ कुरबान जाँ जरना बेपरवाह ॥२२॥
जरना जोगी जगतगुरु जरना रमता राम ।
जरना कूँ कुरबान जाँ जरना है निःकाम ॥२३॥
(१ जम अपनी सीमा याने हद पर नहीं रोक सकता ।
जरना का अंग ६५
जरना पूरन ब्रह्म है जरना करता आप।
जो कछु लखै सो सब जरै जरना है गरगाप ॥२४॥
जरै सो अछै निरंजन कहिये जरै सकल में देव।
जरना जोगी गुरमुखी जरना अलख अभेव ॥२५॥
जरना जोगी जुग जुग जिवै जरना प्रलय न जाय।
जरना जोगी जगतगुरु पद में रहै समाय ॥२६॥
जरना जोगी जुगजुग जिवै जरना प्रलय न होय।
जरना जोगी जगतगुरु सब्द समाना सोय ॥२७॥
कसनी कसै कपूर ज्यों करनी करै करार।
जरना जोगी जगतगुरु आप तरै जग तार ॥२८॥
सिंघ साध का एक मत जीवत ही कूँ खायँ।
यह जग मुरद-फरोस१ है पर द्वारे नहिं जायँ ॥२६॥
सिंघ साध का एक मत भच्छन करें बिचार।
यह जग मुरद फरोस है जाहिं न आन दुआर ॥३०॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों अललपच्छ के अंग।
अंडा छुटै अकास तें बहुर मिलै सतसंग२ ॥३१॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों अललपच्छ के होय।
सतसंगत सेवत रहा बिछुर गया दिन दोय२ ॥३२॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों चन्दन के अंग।
मुख से कछू न कहत है तन कूँ खात भुवंग ॥३३॥
(१) मुर्दा-परस्त याने मुर्दा पूजने वाले से मतलब है। (२) एक चिड़िया जिसकी
निस्बत कहा जाता है कि वह इतने ऊँचे आकाश में रहती है कि वहाँ जब अंडा देती
है तो रास्ते में वायुमंडल की रगड़ से अंडा सेय जाता है और बच्चा पैदा होकर पृथ्वी
पर पहुँचने के पहिले उसके पंख जम आते हैं और वह रास्ते ही से अपने माता पिता
की संगत में लौट जाता है।
६६ गरीबदास जी की बानी
ऐसी जरना चाहिये ज्यों पारस के होय ।
लोहे से सोना करै कह न सुनावै कोय ॥३४॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों पृथ्वी-पति इन्द्र ।
मोती मुक्ता होत है बूँदै स्वाँत समुन्द्र ॥३५॥
जरना बिन जोगी अफल बस्तु न लागै हाथ ।
बिन जरना क्या पाइये भाट बकै पर-बात१ ॥३६॥
कथनी से क्या होत है करनी कारन मूल ।
करनी कर जरना जरै लगै पान फल फूल ॥३७॥
कथनी में कुछ है नहीं करनी में रँग लाग ।
करनी कर जरना जरै सो जोगी बड़ भाग ॥३८॥
अनंत कोटि धुन होत है अनंत कोटि झनकार ।
एती सुन जरना जरै सो जोगी करतार ॥३६॥
अनंत कोटि धुन होत है अनंत कोटि छबि रंग ।
एती लख जरना जरै सो साधू सब्द बिहंग ॥४०॥
अनंत कोटि बाजे बजैं अनंत कोटि रबि तेज ।
एती लख जरना जरै सो साधू परसै सेज ॥४१॥
साहब से परचै भये दुनिया बीच अधीन ।
एती लख जरना जरै सो साधू परबीन ॥४२॥
साहब से परचै भये उस दरबार अबाद् ।
इहाँ न परगट होत हैं परम सनेही साध ॥४३॥
काँछ बाँछ परबन्ध है सतबादी नर सूर ।
साहब के दरबार में जिन्ह मुख रहता नूर ॥४४॥
काँछ बाँछ को कस रहे सतबादी नर एक ।
साँईं के दरबार में रहै जिन्हों की टेक ॥४५॥
(१) दूसरों के गुन । (२) इच्छा ।
जरना का अंग ६७
जरना साहब संत है जरना सतगुरु साँच ।
जरना पाँचो तत्त है ऐसी जरना काँछ ॥४६॥
जरै सो अबिचल रहेगा जरै सो परलय नाहिं ।
जरना जोगी ना मरै आवागमन ना जाहि ॥४७॥
जरै सो निरगुन नूर है जरै सो निरगुन तंत ।
जरै सो साहब आप है जरै सो सत भगवंत ॥४८॥
ज्ञान जोग कूँ सब जरै जरै नाम निरधार ।
आठ सिद्ध नौ निद्ध कूँ जरना अधम उधार ॥४६॥
भक्ति मुक्ति कूँ सब जरै जरै जोग बैराग ।
आपा ठहरावै नहीं यह मत पूरन भाग ॥५०॥
दया धर्म को सब जरै जरै सील सन्तोष ।
मनी कुफर ब्यापै नहीं मिल पद रहै अजोख ॥५१॥
मुख से कहै सो सब जरै सरवन सुनै समोय ।
मन की धारन सब जरै सो जन निःचल होय ॥५२॥
चार मुक्ति जरना जरै बिहिस्त बैकुंठ बिलास ।
काया माया सब जरै सो साधू निज दास ॥५३॥
पुर पट्टन नगरी बसै भेद न काहू देत ।
कीड़ी कुंजर१ पोषता अपना नाम न लेत ॥५४॥
पुर पट्टन नगरी बसै निरधारं आधार ।
लख चौरासी पोषता ऐसी जरना सार ॥५५॥
चौरासी भाँड़े गढ़ै खेलै खेल अनंत ।
जाकी जरना देख कर जे कोइ साधै संत ॥५६॥
चौरासी भाँड़े गढ़ै खेलै खेल अपार ।
खान पान सब देत है ऐसा समरथ सार ॥५७॥
(१) चींटी से हाथी तक ।
६८ गरीबदास जी की बानी
कहि न सुनावै और कूँ जो कुछ करै सो लीन१।
जाकी जरना देख कर संत भये बेदीन ॥५८॥
परचे कोट अनंत हैं अजमत२ कोट अनंत ।
कीमत कोट अनंत है जरना जोगोकंत ॥५६॥
कच्छ मच्छ बारह३ कुरम४ सेस धौल५ फन धार ।
ब्रह्मंड कोट अनंत है रोम रोम की लार ॥६०॥
एती लख जरना जरै कारन कवन अलेख ।
संत सूर जरना जरै कोइ हमरी जरना देख ॥६१॥
धौल गगन गिरनार६ है बसुधा७ ब्रह्म विलास ।
हमरी जरना देख कर बिस्नु लहै कोइ दास ॥६२॥
निरगुन सरगुन सब कला बहुरंगी बरियाम८ ।
पिंड ब्रह्मांड पूरन पुरुष अवगत रमता राम ॥६३॥
अनँत कला कलधूत९ हैं अनँत कला परवान ।
ऐसी जरना तू जरै धन कादिर१० कुरवान ॥६४॥
सब जानत है जगत गुरु कहि न सुनावै कोय ।
ऐसी जरना तू जरै नहीं किसी से होय ॥६५॥
जुगन जुगन के पाप सब जुगन जुगन के मैल ।
जानत है जगदीस तू जोर किये बद-फेल ॥६६॥
करमों कारन देख कर मौन रहे मुसताक ।
तेरी जरना देख कर संतों हासिल हाथ ॥६७॥
जरना बड़ जाजुल्ल११ है जरना नाद समोय ।
ऐसी जरना सो जरै जा तन सीस न होय ॥६८॥
(१) गुप्त । (२) करामात । (३) बाराह । (४) कुरम और कच्छ दोनों एक ही हैं
ज्यादा "दिग्गज" का शब्द लगता है क्योंकि आठों दिशा के गज और शेष नाग पृथ्वी
को सम्हाले हुए हैं। (५) सफेद । (६) नाम पहाड़ का जिस पर बहुत से सिद्ध रहते हैं ।
(७) पृथ्वी । (८) वरीयान = सब से श्रेष्ठ । (६) निर्दोष । (१०) शक्तिमान । (११) खूब
जलता हुआ।
जरना का अंग ६६
जरना जरै सो जालिम जोगी जरना जालिम जिंद।
जरना जरै सो आपै आपं काल करम नहि फंद ॥६६॥
परदा कभी न पाड़िये१ जे सिर जलै अँगौठ।
चाबुक तोड़ौ चौपटे गुनहगार की पीठ ॥७०॥
परदा कभी न पाड़िये जे सिर बलै अँगार।
चाबुक तोड़ौ चौपटे गुनहगार सिर भार ॥७१॥
परदा कभी न पाड़िये अपने ही सिर लेह।
चाबुक तोड़ौ चौपटे गुनहगार मुख खेह ॥७२॥
परदा कभी न पाड़िये जे सिर आई होय।
चाबुक तोड़ौ चौपटे सार झरंता लोह ॥७३॥
परदा कभी न पाड़िये जे जाता है सीस।
चाबुक तोड़ौ चौपटे हुकम सरे जगदीस ॥७४॥
परदा कभी न पाड़िये जो जाती है जान।
चाबुक तोड़ौ चौपटे नीर छीर कूँ छान ॥७५॥
एती जरना जब जरै सतगुरु से है भेंट।
बका बकाई करत हैं जिन्ह हद्दी गुरु फेंट२ ॥७६॥
जिन के अंतर लगन है जोर कहेंगे राम।
बका बकाई करत हैं आन भखैं बेकाम ॥७७॥
पृथ्बी का गुन लीजिये औगुन उर नाहिं धार।
जिनके दिल में एक है दूजे को दें डार ॥७८॥
सब्द अनाहद जो रते दूजा नहीं उपाव।
सुन्न मँडल में रम रहा ना जहँ करम लगाव ॥७६॥
अनहद मंदल३ बाजहीं बारह मास अचंभ।
कबीर दास गरीब कूँ भक्ति दई आरंभ ॥८०॥
(१) उघारिये। (२) जो संसारी गुरू की लपेट में रहेंगे वह बाद बिबाद में जन्म
गँवावेंगे। (३) तबला, मृदंग।
१०
७० गरीबदास जी की बानी
॥ निश्चय का अंग ॥
अपने दिल साधू नहीं वा कूँ दरसा साध ।
भैंस सींग से जानिये गत कुछ अगम अगाध१ ॥ १ ॥
उसके मन की फुरत है अपने मनकी नाहिं ।
गनिका चढ़ी बिमान में अजामील की बाँहि२ ॥ २ ॥
तीन धात हैं पिता की चार धात हैं माय३ ।
सिष स्वामी इकसा मिलै हंसा पहुँचै ठाँय ॥ ३ ॥
निःचय ऊपर नामदेव पाहन दूध पिलाये ।
भैंस सींग में साहब आये नाम रतन धन पाये४ ॥ ४ ॥
निःचय ही से देवल फेरा पूजो क्यों न पहारा ।
नामदेव दरवाजे बैठा पंडित के पिछवारा ॥ ५ ॥
(१) देखो नोट पृष्ठ २० । (२) अजामिल के कुकर्मी होने और अन्त में नारायण
नाम के प्रताप से तर जाने की कथा नोट पृष्ठ २१ में लिखी है परन्तु उसकी बदौलत
उसकी बेश्या का भी उद्धार होने का प्रमान कहीं नहीं पाया जाता । (३) बालक में पिता
और माता दोनों के अंश से तीन तीन बस्तु की उत्पत्ति लिखी है— पिता के अंश से
हड्डी रग और मज्जा (या गूदा) और माँ से बाल लोहू और मांस, चौथी वस्तु माँ के
अंश से कौन सी बनी है इसका प्रमान हम को कहीं नहीं मिला । महात्मा चरनदास
जी ने पिता के अंश में रग की जगह बीर्ज लिखा है और माता के अंश में बाल की
जगह त्वचा ।
(४) नामदेवजी की प्रचंड भक्ति जगत-प्रसिद्ध है। यह बामदेव जी की विधवा कन्या
के उदर से भगवंत की दया दृष्टि से हजरत ईसा की भाँत जनमे थे । इन के नाना भी
बड़े भक्त और माता पूरी सती और प्रेमी थीं। नामदेवजी के विषय में बहुत से चमत्कार
लिखे हैं । लड़कपन ही से इन की परमार्थ में रुचि थी और उसी अवस्था में एक बार
उनके नाना ठाकुर जी की सेवा उनके सुपुर्द कर के बाहर गये । जब नामदेवजी ने ठाकुर
जी के सामने दूध धरा और उन्होंने न पिया तो इन्होंने समझा कि हमसे अप्रसन्न हैं
और तीन दिन तक मन्दिर में बिना अन्न पानी के दुखी पड़े रहे अंत को ठाकुर जी ने
कटोरा उनके हाथ से लेकर दूध पी लिया और थोड़ा सा उनको प्रसाद दिया ।
किसी मेले के समय में नामदेव जी अपना जूता कमर में बाँध कर पंढरपुर के
ठाकुरद्वारे में दर्शन को गये संयोग से जूता किसी ने देख लिया और इन को मार कर
मन्दिर से निकाल दिया । बेचारे मंदिर के पीछे जाकर दर्शन न मिलने से व्याकुल होकर
बैठ गये और वहाँ विनती करने लगे उसी दम मंदिर जड़ से फिर कर द्वारा उनकी
ओर हो गया ।
निश्चय का अंग ७१
निःचय ही से गऊ जिआई निःचय बच्छा चूगै ।
देस दिसंतर भक्ति गई है फिर को लावै भूगै१ ॥ ६ ॥
गोपीचन्द भरथरी जोगी निःचय राज बिराजी२ ।
निःचय होय तो नेड़े निपजै क्या पंडित क्या काजी ॥७॥
निःचय सेऊ सीस चढ़ाया चोरी संत सिधारे ।
बनियाँ कूँ जहँ पकड़ लिया है करदे३ सीस उतारे४ ॥८॥
पिता समन और माता नेकी जिनके निःचय भारी ।
जहाँ कबीर कमाल फरीदा भोजन की भइ त्यारी४ ॥६॥
सेऊ के धड़ सीस चढ़ाया मीन मेख नहिं कोई ।
हाजिर नाजिर मिले बिसंभर ऐसा निःचय होई ॥१०॥
तपिया के तौ जकतक५ कीना लोदिया के घर आये ।
ताड़ी घाल लिये परमेसर निःचय हाथ बँधाये ॥११॥
निःचय ऊपर बालद आई और केसो बनजारा ।
नौलख बोरी लदा लदीना कासी नगर मँझारा६ ॥१२॥
निःचय पंडा पाव७ बुझाया जगन्नाथ के माहीं ।
अटका फूट पड़ा पाँवन पर अजहूँ बात न भाई ॥१३॥
(१) एक बार बादशाह ने उनको पकड़ बुलाया और कहा कि तुमने सिद्धाई का
ढचर फैला रक्खा है हमारी गाय मर गई है उसको जिला दो नहीं तो कतल कर डाले
जाओगे । नामदेवजी ने बहुत उजर किया कि मैं तो एक नीच छीपी हूँ मुझ में कोई गुन
नहीं है—पर बादशाह ने न माना आखिर को महात्मा जी ने भगवत चरन में बिनती
की और गाय जी उठी ।
एक बार घर में आग लगी तो नामदेवजी और सामान जो घर के बाहर रक्खा
हुआ था उसको भी आग में मालिक की मौज से उसका लगना समझ कर डालने लगे ।
भगवान ने उनका छप्पर का घर दूसरा बिचित्र रीति से आप रच दिया ।
(२) राजा भरथरी बड़े त्यागी और जोगी हुए और राजा गोपीचन्द उनके भांजे
उनके चेले बने । (३) छुरी से । (४) देखो नोट पृष्ठ १३ । (५) झगड़ा । (६) देखो
नोट पृष्ठ २६ । (७) पावक = आग [ जगन्नाथ जी के मन्दिर में आग लग जाने से
वहाँ का रसोइया जलने लगा कबीर साहब ने काशी में धरती पर पानी गिरा कर
आग बुझा दी ] ।
७२ गरीबदास जी की बानी
कासी तज कर मगहर पहुँचे ऐसा निःचा कहिये।
सतगुरु साख समझ ले भाई थीर पकर थिर रहिये१ ॥१४॥
कासी मरे सो जाय मुक्ति कूँ मगहर गदहा होई।
पुरुष कबीर चले मगहर कूँ ऐसा निःचा जोई१ ॥१५॥
कासी के तो पंडित कूकैं मगहर मरो न भाई।
वा तौ पृथ्वी सूची नाहीं त्रिसंक पड़ो चिल्लाई१ ॥१६॥
कासी तज मगहर कूँ चाले किया कबीर पयाना।
चादर फूल बिछेही छाँड़े सब्दै सब्द समाना२ ॥१७॥
मगहर में तो कबर बनाई बिजलीखान पठाना।
कासी-चौरा उड़ गया भौंरा दूनों दीन दिवाना ॥१८॥
कनक जनेऊ कंध दिखाया है रैदास रँगीला।
धरे सातसै रूप तास कूँ ऐसी अद्भुत लीला३ ॥१६॥
पीपा तो दरिया में कूदे ऐसा निःचा कहिये।
मिले बिसम्भर नाथ तासु कूँ झूठी भक्ति न गहिये४ ॥२०॥
सेना के घर साहब आये करी हजामत सेवा।
संतों की तो सरधा राखी पारब्रह्म निज देवा५ ॥२१॥
(१) कबीर साहब काशी से जाकर मगहर में रहे थे और वहीं शरीर त्याग किया।
मगहर को मगह देस बोलते हैं और लोगों का विश्वास है कि वहाँ मरने से गधे की
जोनि मिलती है क्योंकि गुरुद्रोही राजा त्रिशंकु का शरीर जो अधर में लटक रहा है उसकी
छाया उस भूमि पर पड़ने से वह अपवित्र हो गई है।
(२) कबीर साहब के अंतकाल के सम्बन्ध में यह प्रसिद्ध है कि हिन्दुओं ने इनके
मृतक शरीर को जलाना और मुसलमानों ने गाड़ना चाहा इस पर बहुत झगड़ा हुआ
अंत को चादर उठा कर देखा तो मृतक स्थान पर शरीर नदारद था फूल और खाट पड़ी
थी (कितने खाट की जगह पान कहते हैं) तब हिन्दुओं ने फूल लेकर मगहर में उनकी
समाधि बनाई और मुसलमानों ने जिनमें कबीर साहब का जेठा चेला बिजलीखाँ पठान
प्रधान था कबर बनाई। काशी में उसी समय एक भौंरे के कहने से कबीर साहब के
गुरुमुख शिष्य धर्म्मदासजी ने कबीर-चौरा बनाया। (३) देखो नोट पृष्ठ २७। (४) देखो
नोट पृष्ठ २८। (५) देखो नाट पृष्ठ २७।
निश्चय का अंग ७३
नरसी की तो हुंडी भाली कागज सीस चढ़ाया ।
ध्योती का तो ब्याह भया जब भात भरन कूँ आया१ ॥२२॥
तिरलोचन के भये बिरतिया ऐसी भक्ति कमाई ।
संतों के तो नाल फिरे अरु तीन लोक ठकुराई२ ॥२३॥
जीवन मूल बिसम्भर३ साहब आतमदेव बिनानी४ ।
जहँ जहँ भीर परी संतों कूँ छाना दूध अरु पानी ॥२४॥
प्रहलाद भक्त कूँ दई कसौटी चौरासी बरताया ।
नरसिंह रूप धरे नारायन खंभ फार कर आया५ ॥२५॥
(१) नरसी जी गुजरात देश के बासी थे जिन की प्रचंड भगवत भक्ति प्रसिद्ध
है । इनकी महिमा ग्रन्थों में बहुत कुछ बर्नन की है । दो चमत्कार जो इस कड़ी में
लिखे हैं एक तो यह है कि जब नरसी जी दान देते देते कंगाल हो गये थे एक समय
साधुओं ने आकर इन को घेरा कि द्वारिका की यात्रा के लिये खर्च दो । नरसी जी
ने अपनी नादारी हजार कही पर जब साधुओं ने पिंड न छोड़ा तो हुण्डी द्वारिका को
भगवान के ऊपर साँवल साह के नाम से लिख दी । वहाँ ईश्वर ने आप साँवल साह
का रूप धर कर उनकी हुण्डी का दाम चुका दिया । दूसरे यह कि जब उनकी बड़ी बेटी
के लड़का हुआ अर्थात् नरसी जी के दोहता पैदा हुआ तो छठियारे के लिये कुछ न था
भगवान ने आप उस रसम को अदा किया ।
(२) तिरलोचन देव वैश्य कुल के भक्त थे इन को साधु सेवा में सहायता के
लिये एक नौकर की बड़ी खोज थी और मन का आदमी नहीं मिलता था आखिर
को भगवान तीन लोक के ठाकुर अर्थात् स्वामी नौकर का भेष धर आप इनकी
चाकरी में रहे ।
(३) बिशवंभर ।। (४) बिज्ञानी ।
(५) प्रह्लाद भक्त का पिता हिरण्य-कश्यप बड़ा ईश्वर-द्रोही था और अपने
बेटे को राम नाम लेने से रोकता था । इसी अकस से प्रह्लाद को सारे दंड चौरासी
के दिये, अर्थात् पहाड़ से गिराया, जंजीर से बाँधकर नदी में डलवाया, हाथी से
रुँदवाना चाहा, जमीन में गड़वाया, अंग में साँप लिपटवाया, तोप पर रक्खा, सिर
पर आरा फेरा, उलटा टाँग कर तीर चलाये, चिता बना कर जलवाया, (देखो होलिका
की कथा नोट पृष्ठ ५४ ), विष पिलाया और आखिर को खंभे से बाँध कर खङ्ग से
सिर काट डालना चाहा तब ईश्वर ने नरसिंह रूप धर कर हिरण्य-कश्यप का पेट नख
से फाड़ कर उसका बध किया । इस अवसर के भयानकपन को नीचे लिखे हुए दंडक
छंद में इस तरह लिखा है :-
७४ गरीबदास जी की बानी
ध्रू का ध्यान अमान अगोचर डिगै न डोलै भाई।
सप्त पुरी पर तारी लागी कोटि कल्प जुग जाई१ ॥२६॥
नारद पुंडरीक और व्यासा गोरख जनक बिदेही।
द्वादस कोट बंध जिन तोरी भक्ता परम सनेही२ ॥२७॥
सुल्तानी बाजीद फरीदा देत तत्त गलताना।
जब राजा कूँ नाम दिया जब सबदै सब्द समाना२ ॥२८॥
कहा बखानूँ कोटिन निर्णय राजा पारँग कीन्हा।
अकल अजीत उदित अध्यातम गोरख से परबीना२ ॥२६॥
बसिष्ट विश्वामित मद माते मन माया जिन जीते।
कागभसुंड डंड नहिं जाके अवगत आनंद चीते२ ॥३०॥
लोमष ऋषि और मार्कंड को ध्यान लगा वा पद में।
अबिनासी से अरस परस है सुरत बसी अनहद में२ ॥३१॥
मोरध्वज तामरध्वज राजा अम्बरीक अनुरागी।
हरीचन्द पद हाजिर नाजिर मन से माया त्यागी२ ॥३२॥
द्रोपद सुता के चीर बढ़ाये पीतंबर पहराना।
अंत भये कछु वार न पारा दूसासन हैराना३ ॥३३॥
पंडों के जग अस्वमेध में सुपच बजाया संख।
द्रोपदी के दिल में राखी काढी मन की बंक४ ॥३४॥
निःचा ऊपर नाम का कहा ज्ञान कहा ध्यान।
निःचा खेत निपाइया काँकर बोई जान५ ॥३५॥
काम लुब्ध पाखंड रचा धरे बिसंभर रूप।
ऐसा निःचा चाहिये मारे राजा भूप ॥३६॥
गगड़ गड़गड़ान्यो खम्भ फाट्यो चरचराय निकस्यो नरनाहर को रूप अति भयानौ
है। ककट कटकटावै दाढ़ै इशन लपलपावै जीभ अधर फरफरावै मौछ व्योम व्याप्त
मानो