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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

६२ गरीबदास जी की बानी
पुत्र बहत्तर बाक छल नर से नारी कीन्ह ।
मान डिंभ छूटा नहीं ततबेता मतहीन ॥२३॥
भृगू भरम में बह गये कीन्हा नहीं बिचार ।
त्रिभुवन नाथ बिसंभरै लात घात करतार१ ॥२४॥
बिन बिचार तन क्या धरे कुटिलाई बस प्रान ।
नाहीं सुरत सरीर की ता घट कैसा ज्ञान ॥२५॥
गोपी लुट गईं कृस्न की अर्जुन सरिखे संग ।
लख संधानी बान कर जीते भारी जंग२ ॥२६॥
काबा गोपी लूटिया अर्जुन चले न बान ।
होनी होय सो होत है समझ बूझ यह ज्ञान२ ॥२७॥
रहने दीजिये और मुझे राजा के पास जिस की रानी बन कर साठ बरस साथ रही
फिर न ले चलिये ।
(१) एक समय देवताओं में यह विचार होने लगा कि ब्रह्मा बिश्नु और
महादेव में कौन बड़ा है इसे परीक्षा लेने को सब देवता और ऋषियों ने भृगुजी
को भेजा । भृगुजी पहले अपने पिता ब्रह्मा के सामने आये और प्रणाम नहीं किया
जिस पर ब्रह्मा को ऐसा क्रोध आया कि शाप देना चाहा पर मुर्ख लड़का समझ कर
रुक गये । फिर भृगु जी कैलाश में महादेव जी के पास गये शिव उनको देख कर बड़े
आदर से भेटने को चले कि भृगु ने पीछे हट कर कहा कि खबरदार हम को छुओ
नहीं क्योंकि अशुद्ध चिता-भस्म और मुंडमाल धारण किये हो । यह सुन कर
महादेव जी क्रोध में भर त्रिशूल लेकर भृगुजी को मारने दौड़े भृगुजी भागते भागते
बैकुण्ठ में जा घुसे तब बचे । बैकुण्ठ में पहुँचने पर भृगु ने बिश्नु को सुख सय्या पर
सोता पाया जिस पर उन्हों ने बड़े जोर से बिश्नु की छाती में लात मारी । बिश्नु
महाराज चौंक पड़े और भृगु के चरण पकड़ कर सुहराने लगे और बोले कि कहाँ
बज्र से अधिक कठोर मेरा हृदय और कहाँ पुष्प से भी कोमल आपका चरणारबिन्द
इससे मेरे जगाने में आपको बड़ा कष्ट हुआ क्षमा कीजिये । भृगुजी ने शरमा कर सिर
नीचा कर लिया । फिर देवताओं की सभा में जाकर खबर दी कि तीनों देवताओं में
बिश्नु सब से बड़े हैं क्योंकि वही शान्त हैं ।
(२) जब कृष्ण भगवान का इस संसार से कूच करने का समय आया तो
अर्जुन से कहा कि आज के सातवें दिन द्वारिका को समुद्र डुबा लेगा इस लिये तुम
हमारी स्त्रियों को माल असबाब समेत हस्तिनापुर को ले जाओ तुम उनकी रक्षा करने
की सामर्थ्य रखते हो । यह सुन कर अर्जुन सब स्त्रियों को लेकर रवाना हुए रास्ते में
काबा अर्थात् भीलों ने लूटने को घेरा । अर्जुन ने डाकुओं के मारने को अपना गांडीव
धनुष चलाना चाहा परन्तु चलाने की कौन कहे उसको चढ़ा भी न सके, वह सामर्थ्य और
बल श्रीकृष्णचन्द्र के साथ ही गुप्त हो गये और जिस अर्जुन ने अठारह अक्षौहिणी दल