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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

६६ गरीबदास जी की बानी
ऐसी जरना चाहिये ज्यों पारस के होय ।
लोहे से सोना करै कह न सुनावै कोय ॥३४॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों पृथ्वी-पति इन्द्र ।
मोती मुक्ता होत है बूँदै स्वाँत समुन्द्र ॥३५॥
जरना बिन जोगी अफल बस्तु न लागै हाथ ।
बिन जरना क्या पाइये भाट बकै पर-बात१ ॥३६॥
कथनी से क्या होत है करनी कारन मूल ।
करनी कर जरना जरै लगै पान फल फूल ॥३७॥
कथनी में कुछ है नहीं करनी में रँग लाग ।
करनी कर जरना जरै सो जोगी बड़ भाग ॥३८॥
अनंत कोटि धुन होत है अनंत कोटि झनकार ।
एती सुन जरना जरै सो जोगी करतार ॥३६॥
अनंत कोटि धुन होत है अनंत कोटि छबि रंग ।
एती लख जरना जरै सो साधू सब्द बिहंग ॥४०॥
अनंत कोटि बाजे बजैं अनंत कोटि रबि तेज ।
एती लख जरना जरै सो साधू परसै सेज ॥४१॥
साहब से परचै भये दुनिया बीच अधीन ।
एती लख जरना जरै सो साधू परबीन ॥४२॥
साहब से परचै भये उस दरबार अबाद् ।
इहाँ न परगट होत हैं परम सनेही साध ॥४३॥
काँछ बाँछ परबन्ध है सतबादी नर सूर ।
साहब के दरबार में जिन्ह मुख रहता नूर ॥४४॥
काँछ बाँछ को कस रहे सतबादी नर एक ।
साँईं के दरबार में रहै जिन्हों की टेक ॥४५॥
(१) दूसरों के गुन । (२) इच्छा ।