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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 186 में से

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पृष्ठ 66

५८ गरीबदास जी की बानी
बिना बिचारे बिचरता बैरागी सुकदेव ।
सप्त पुरी में गमन कर ढूँढ़े जनक बिदेह¹ ॥१२॥
गोरखनाथ सुनाथ है जंतर मंतर जोग ।
सतगुरु मिले कबीर से काटे दीरघ रोग² ॥१३॥
गँधरपसेन गदहा भया पुत्तर पिता सराप ।
बिना बिचारे पैठ माँ सुना उरबासी लाप³ ॥१४॥
जादो गये बिचार बिन भरमे छप्पन क्रोड़ ।
दुर्बासा से छल किया लागी मोटी खोड़⁴ ॥१५॥
(१) शुकदेव जी के पिता व्यास जी ने उनको बहुत समझाया कि घर के त्याग
करने से कुछ परमार्थ का काम नहीं बनता पर शुकदेव जी के मन में यह बात न बैठती थी
सातो पुरी इत्यादि की यात्रा करते ही रहे तब व्यासजी ने थक कर उनसे कहा कि
एक बेर राजा जनक से मिल लो फिर जो जी में आवे सो करो । शुकदेव जी राजी हुए
और राजा जनक के पास गये । राजा जनक को राज्य कार्य में फँसा हुआ देख कर इन
के मन से उनकी महिमा जाती रही । जब जनक ने पूछा कि कैसे आये तो उत्तर दिया
कि पिता जी से आपके ज्ञानी और विदेह होने की महिमा सुनी थी सो देख लिया और
हम तो बन में एकान्त वास करेंगे । इस पर राजा जनक ने अपने तपोबल से ऐसा
चमत्कार किया कि राज्य भवन में जहाँ वह बैठे थे बड़े जोर से आग लग गई । राजा
जनक निश्चिन्त बैठे अपना काम करते रहे परन्तु शुकदेव जी अपनी कोपीन और
कमंडल सम्हाल कर भागने लगे । इस पर राजा हँसे और कहा कि इसी को त्याग
कहते हो ! मेरा सब महल और माल जल रहा है सो मुझे फिकर नहीं है और तुम एक
लँगौटी के बचाने में बेचैन हो गये, याद रक्खो कि जितना तुम को अपनी लँगौटी
और कमण्डल का बन्धन है उतना मुझे अपने सकल राज का नहीं है । त्याग मन में
होता है तन से नहीं, जब तुम्हारे संग तन, दसों इन्द्री, मन और पंच भूत का कुटुम्ब
लगा है तो बाहरी कुटुम्ब के त्याग से क्या होता है । शुकदेव जी यह सुन कर बहुत
लज्जित हुए और फिर बन बास का ख्याल छोड़ दिया । (२) गोरखनाथ जी कबीर साहब
का नाम सुन कर उनकी परीक्षा के अभिप्राय से काशी में आये और आकाश में त्रिशूल
पर आसन मार कर बैठे और कबीर साहब को आवाज दी कि यहीं आवो तो वार्तालाप
करें । कबीर साहब ने जवाब दिया कि आप बड़े सिद्ध हैं मैं तो महा अधम हूँ क्योंकर
आप तक पहुँच सकता हूँ । फिर कबीर साहब ने सत्यलोक में जो पिण्ड और ब्रह्मांड के
परे है आसन लगाकर गोरखनाथ को दया से दर्शन दिये । गोरखनाथ चकित हो गये
और कबीर साहब के पूरे सतगुरु होने के कायल होकर चरणों पर गिरे यह कबीर
गोरख की गोष्ठी में प्रसिद्ध कथा है ।
(३) राजा गन्धर्पसेन को उरबसी अप्सरा का गान सुनकर मोहित होने से गदहे
का चोला धारण करना पड़ा। (४) खोड़ = बड़ा अपराध—एक समय दुर्बासा ऋषि