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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 186 में से

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पृष्ठ 68

६० गरीबदास जी की बानी
लंक राज रावन किया खोया बिना बिचार ।
पलक बीच परलय भये लंका के सरदार१ ॥१८॥
सीता सतवन्ती सही रामचन्द्र की नार ।
रावन दानै छल लई बिनही ज्ञान बिचार१ ॥१९॥
पारासर सेवन करै कुटिल कला घट माहिं ।
कन्या सूं संगम किया ज्ञान बिचारा नाहिं२ ॥२०॥
उद्दालक के नासकेत गये फूल बनराय ।
पिता बचन जब मेटिया तौ जम नगरी जाय३ ॥२१॥
रामचन्द्र जी जब उसके सिर काटते थे तो तुर्त दूसरे सिर उनकी जगह निकल आते थे ।
इससे यह सिद्ध हुआ कि जो दे सो पावे ।
(१) जब श्रीरामचन्द्र मारीच राक्षस को जो मृग का रूप धारण करके प्रगट हुआ
था मारने गये और लक्ष्मण जी भी जिनको रामचन्द्र सीता जी की रक्षा के लिए छोड़
गये थे सीता जी के कटु बचन से रामचन्द्र जी की खोज में चले तो उन्होंने सीता के
चारो ओर एक लकीर खींच दी कि उसके बाहर कदापि पग न धरैं । सीता जी को अकेली
पाकर रावण यती का भेष धर कर भीख माँगने आया । सीता जी ने देखा और भीतर
से भीख देना चाहा तब यती रूपी रावण बोला कि मेरे गुरु ने बँधी भिक्षा लेने का
निषेध किया है। सीता जी धर्म लोप से डर कर भिक्षा देने लकीर के बाहर निकलीं
कि रावण ने तुर्त सीता सती को दान करते हर लिया । इसी अत्याचार के प्रभाव से
रावण ने लंका को जलवाया और आप मिट्टी में मिल गया ।
(२) पाराशर ऋषि ने मच्छोदरी से नाव में भोग किया (यह कन्या उन्हीं के
बीज से मछली के पेट से पैदा हुई थी जो बीज गंगा में नहाते वक्त ऋषि जी का किसी
समय में गिर गया था और एक मछली ने खा लिया था) उस मच्छोदरी ने कहा
अभी दिन है लोग देखते हैं तब ऋषि ने अपनी सिद्ध शक्ति से अँधेरा कर दिया आकाश
में बादल आ गये । फिर स्त्री ने कहा मेरे बदन से मच्छी की बदबू आती है ऋषि ने
बदबू को बदल के खुश्बू कर दिया । नतीजा इस संगत का यह हुआ कि व्यास जी उस
मच्छोदरी से पैदा हुए ।
(३) उद्दालक ऋषि के पुत्र नासकेत जी के पिता ने आज्ञा दी कि पूजा के लिये
पुष्प जल्द लाओ । नासकेत फूल लेने बन को गये पर देर लग गई और ऋषि जी
की पूजा का समय निकल गया । जब नासकेत जी लौट कर आये तो पिता क्रोध
से बोले कि क्या तुम यमपुरी होकर आये जो इतनी देर लगाई । यह सुन कर
नासकेत पिता को पुष्प इत्यादिक देकर प्रणाम कर यमपुरी को चले गये और अपने
तपोबल से उसी देह से लौट आये । उद्दालक ऋषि ने यह देख कर पुत्र को गले से
लगा लिया कि उसकी योग सिद्धि पूर्व जन्म की है और अपने बेबिचारे बचन पर
बहुत पछतावा किया ।