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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 186 में से

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पृष्ठ 69

विचार का अंग ६१
नारद मुनि निरगुन कला ततबेता१ तिहुँ लोक।
नर सेतीं नारी भया यह हीना बड़ धोख२॥२२॥
(१) तत्व ज्ञानी।
(२) एक समय नारद मुनि ने बैकुंठ में जाकर भगवान से कहा कि
महाराज अब मैंने आपकी माया को जीत लिया। भगवान मुस्कुरा कर बोले कि
आप बड़े ज्ञानी हैं आप के लिये माया को जीत लेना क्या बड़ी बात है, इस पर
नारद मुनि फूले न समाये। थोड़ी देर पीछे भगवान ने मुनि जी से कहा कि आज
कान्यकुब्ज देश के राजा से मिलने को हम जाते हैं आप का जी चाहे तो हमारे
साथ गरुड़ पर आप भी सवार हो लीजिये। यह सुन कर नारद भी भगवान के
साथ चले। कान्यकुब्ज देश की सीमा पर बन में एक सुन्दर ताल देख पड़ा नारद
जी की इच्छा से विष्णु भगवान वहाँ उतरे और कहा कि आप का चित्त चाहे तो
झटपट स्नान पूजा कर लीजिये। नारद जी स्नान के लिये नदी में धंसे जब डुबकी
लगा कर उछले तो स्त्री हो गये और इस बीच में बिष्णु गरुड़ पर चढ़ कर बैकुंठ को
लौट आये। नारद जी स्त्री वेष में बिचारने लगे कि मैं सुन्दर युवा स्त्री हूँ मेरे योग्य
पति भी मिलना चाहिये। इतने में वहाँ का राजा शिकार खेलता हुआ पहुँचा और स्त्री
पर मोहित होकर पूछा कि तुम किस की कन्या हो और इस बन में क्या करने आईं।
स्त्री बोली कि मैं कुछ नहीं कह सकती आप को जो उचित जान पड़ै सो कीजिये। राजा
उस सुन्दरी को घोड़े पर बैठा कर अपने राजभवन में लाये और अपनी पटरानी
बनाया और दोनों बड़े प्रेम से रहने लगे। समय पाकर रानी को १२ पुत्र और १२
कन्या उत्पन्न हुईं फिर उनके बिवाह होकर १२ पतोहू और बारह दामाद घर आये
और पोते और नातियों की नई टकसार खुली। अब तो रानी को बड़ा अहंकार हुआ
कि मेरे बराबर संसार में कौन भाग्यवान हो सकता है। इस तरह रानी-रूप नारद के
साठ बरस बीते। उस समय एक दूसरे देश के राजा ने उस पर चढ़ाई की और युद्ध
में रानी के बारहों पुत्र मारे गये। रात को जब लड़ाई बन्द हुई रानी अपने पति को
लेकर लड़कों के छिन्न भिन्न मृतक शरीर उठा लाई और अति विलाप करने लगी
कि मुझ सी दुखिया अभागी संसार में दूसरी न होगी। गर्व-प्रहारी भगवान को यह
दीन दशा नारद की देख कर दया आई और ब्राह्मण का रूप धर कर प्रगट हुए और
रानी को समझाया कि इस रोने पीटने से क्या मिलेगा तुम्हारे पुत्र प्यासे मारे गये हैं
इससे जल्द स्नान कर के उनको तिलांजलि दो जिसमें उनकी प्यास बुझै मंत्र हम
पढ़ देंगे। ऐसा सुन कर रानी झटपट उसी ताल में स्नान को धँसी जब गोता लगा
कर पानी के ऊपर सिर निकाला तो जटा लटकाये मूँछ बढ़ाये नारद का रूप हो गई
और भौंचक्की होकर इधर उधर देखने लगी। भगवान भी अपना रूप धारण करके
नारद से बोले कि मुनिजी देखते क्या हो जल्द अपनी लँगोटी पहिन कर तुम्बा उठाओ
और मेरे साथ चलो राजा से मिलने को देर होती है। नारदजी दौड़ कर भगवान
के चरणों पर गिरे और कहा कि धन्य आपकी माया वह आप ही के आधीन है
और मैं आप की शरण हूँ। भगवान मुस्कुरा कर बोले कि आप यह कैसी बहकी
बातें करते हो अभी तो आपने छिन भर हुआ गोता लगाया था। नारद बोले कि अब
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