गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिचार का अंग ५७
साहब सेती दोसती सन्तों सेती प्यार ।
तिन्ह को संका है नहीं धरमराय दरबार ॥३८॥
॥ बिचार का अंग ॥
ज्ञान बिचार न ऊपजै क्या मुख बोलै राम ।
संख बजावै बादई रते न निरगुन नाम ॥ १ ॥
ज्ञान बिचार बिबेक बिन क्यों दम तोरै स्वाँस ।
कहा होत हरि नाम सूँ जो दिल ना बिस्वास ॥ २ ॥
ज्ञान बिचार बिबेक बिन क्यों भौंकत है स्वान ।
दस योजन जल में रहै भीजत ना पाखान ॥ ३ ॥
ज्ञान बिचार बिबेक बिन क्यों रेंकत खर गीध ।
कहा होत हरि नाम सूँ जो मन नाहीं सीध ॥ ४ ॥
समझ बिचारे बोलना समझ बिचारे चाल ।
समझ बिचारे जागना समझ बिचारे ख्याल ॥ ५ ॥
करै बिचारै समझ कर खोज बूझ का खेल ।
बिना मथे निकसै नहीं है तिल अंदर तेल ॥ ६ ॥
जैसे तिल में तेल है यौं काया मध राम ।
कोल्हू में डारे बिना तत्त नहीं सहकाम ॥ ७ ॥
बिचार नाम है समझ का समझ न परी परख ।
अकलमंद एकै घना बिना अकल क्या लख ॥ ८ ॥
बिना बिचारे क्या लहै कस्तूरी भटकंत ।
बिन बूझे नहिं पाइये गाँव डगर मग पंथ ॥ ६ ॥
ज्ञान सफा के चौक में जहाँ बिचार बिबेक ।
कुटिलाई जिव बहुत हैं निरमल अंगा एक ॥१०॥
बिना बिचारे भरम है सुरपति सारखा होय ।
गौतम रिषि गुरुवा बड़े जा की पत्नी जोय१ ॥११॥
(१) बिना विचार के इन्द्र सरीखा दूषित हो जाता है जिसने अहिल्या के संग
प्रसङ्ग किया ।