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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 186 में से

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पृष्ठ 67

बिचार का अंग ५६
इजै बिजै थे पौरिया बिसुन पौर दरबान ।
बिन बिचार राकस भये बड़ कलंक है मान१ ॥१६॥
रावन सिव का तप किया दीन्हे सीस चढ़ाय ।
दस मस्तक बीसो भुजा जो दीन्हे सो पाय२ ॥१७॥
घूमते घूमते द्वारिका में पहुँचे जहाँ छप्पन करोड़ यादवों के लड़के खेल रहे थे। लड़कों
ने कलोल में श्रीकृष्ण के पुत्र परम सुन्दर शाम्ब को स्त्री का रूप बना कर उसके पेट पर
एक तवा बाँध दिया जिसमें गर्भवती मालूम हो, फिर ऋषि के सन्मुख ला कर कहा कि
यह स्त्री गर्भवती है लज्जा से बोलती नहीं पर जानना चाहती है कि इस गर्भ से पुत्र
होगा या कन्या । दुर्वासा ध्यान से असल बात समझ गये और क्रोध में आकर शाप
दिया कि इस गर्भ से लोहे का मूसर उत्पन्न होगा जो सारे यादवों के बंश का नाश
करेगा। यह सुन कर लड़के घबरा गये और जो शाम्ब के पेट का कपड़ा खोला तो तवे
के बदले उसमें से लोहे का मूसर गिर पड़ा। जब यह समाचार श्रीकृष्ण को मिला उस
समय यह यादवों की सभा के बीच में बैठे हुए थे। यादवों ने सलाह करके मूसर को
लोहार से रेतवा कर समुद्र में डलवा दिया और एक छोटा सा टुकड़ा जो नहीं रेता गया
उसको भी समुद्र में डलवा दिया। कितने दिन पीछे समुद्र की लहरों से वह रेत
किनारे लगकर जम आई और पटेरा (सरपत) रूप हो गई और इसी को ले ले कर
प्रभास क्षेत्र से लौटती बेरा यादव लोग नशे की हालत में आपस में लड़ कट मरे ।
लोहे के बचे हुए टुकड़े को एक मछली लील गई थी जब वह जाल में फँसी तो वह लोहा
एक ब्याध के हाथ लगा और उसने उस टुकड़े की अपने तीर की गाँसी बनाई। यादवों
के संहार के बाद पीपल के पेड़ के नीचे पैर पर पैर रक्खे श्रीकृष्णचन्द्र बैठे थे, दूर से
उनके चरण की चमक को मृगा के कान समझ कर बहेलिया ने तीर मारा जिससे उनका
शरीर छूट गया।
(१) बैकुंठ में भगवान के पार्षद जय, विजय द्वारपाल पहरा दे रहे थे, कि ब्रह्मा
के मानसिक पुत्र सनक, सनन्दन, सनत्कुमार चारो ऋषि जिन की सदा पाँच बरस
की अवस्था रहती है भगवान के दर्शन को आये। दोनों द्वारपालों ने उनको
लड़का समझकर बेत से रोक दिया । ऋषियों को इस अपमान पर क्रोध आया और
शाप दिया कि तुम दोनों पृथ्वी पर जा कर राक्षस योनि को प्राप्त हो । इसी बीच में
बिष्णु भगवान मुसकाते हुए वहाँ आ पहुँचे । ऋषि लोग उनको देख कर अपने शाप
पर लज्जित हुए और कहा कि तीन जन्म में तुम दोनों का उद्धार हो जायगा । भगवान
बोले कि यह हमारी इच्छा से हुआ और ऋषियों को आदर पूर्वक महल में ले गये ।
फिर यही दोनों द्वारपाल पहिले जन्म में हिरण्यकश्यिप और हिरण्याक्ष, दूसरे जन्म
में रावण और कुम्भकर्ण और तीसरे जन्म में शिशुपाल और दन्तवक्र हुए, तिस के बाद
बैकुंठ को गये ।
(२) रावण ने शिव जी की भारी तपस्या की और कितनी ही बार अपने मस्तकों
को काट काट कर शिव जी के प्रसन्न करने को अग्नि कुंड में होम कर दिया इसी से