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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

जरना का अङ्ग ६३
॥ जरना १ का अंग ॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों पृथिवी तत थीर ।
खोदे से कसकै नहीं ऐसा बज्र सरीर ॥ १ ॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों अप २ तेज अनूप ।
न्हावै धोवै थूक दे तामस नहीं सरूप ॥ २ ॥
ऐसी जरना चाहिये पवन तत्त परमान ।
कुटिल बचन कोई कहै मानै नहीं अमान ॥ ३ ॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों अगिन तत्त में होय ।
जो कुछ परै सो सब जरै बुरा न बाचै कोय ॥ ४ ॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों गगन तत्त गलतान ।
बुरा भला बाचै नहीं ता में सकल समान ॥ ५ ॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों तरवर ३ के तीर ।
काटै चीरै काठ को तौ भी मन है धीर ॥ ६ ॥
बृच्छ नदी अरु साध जन तीनों एक सुभाव ।
जल न्हावै फल बृच्छ दे साध लखावै नाँव ॥ ७ ॥
ऐसी जरना चाहिये ज्यों घनहर ४ जल मेह ।
सबही ऊपर बरसता ना दिल दोष सनेह ॥ ८ ॥
दीठी अनदीठी करैं जिन की लूँ मैं दाद ५ ।
सँग से कभी न बिच्छरूँ खेलूँ आदि अनाद ॥ ९ ॥
दीठी अनदीठी करैं जिन की लूँ मैं दाद ।
सँग से कभी न बिच्छरूँ परम सनेही साध ॥ १० ॥
दीठी अनदीठी करैं जिनकी लूँ मैं दाद ।
सँग से कभी न बिच्छरूँ हर दम नाम अराध ॥ ११ ॥
महाभारत में उसी धनुष बाण से सबको जीता था उनके देखते देखते काबों ने सब
स्त्रियों को लूट लिया ।
(१) सहना, आपा घालना, लगन । (२) जल । (३) पेड़ । (४) गहरा बादल ।
(५) न्याय, बख्शिश ।