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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 186 में से

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पृष्ठ 63

साँच का अंग ५५
महाभारत के जंग में पाँच उबारे पंड ।
जुगन जुगन की भक्तनी घंटा लै रख अंड १ ॥२४॥
साँचों के संगति रहै झूठों सेतीं दूर ।
परमेसुर करुना मई रहै सकल घट पूर ॥२५॥
बालमीक आये सुपच बजा पाँच-जन नाद ।
पंडों जग असुमेध में एकै पाया साध२ ॥२६॥
(१) भगवंत ने अरुही चिड़िया की प्रार्थना पर महाभारत के मैदान में उसके अंडों
की रक्षा के लिये हाथी का घंटा गिरा कर उन को ढाँक कर बचा दिया । (२) पांडवों के
राजसूय यज्ञ में यद्यपि पृथ्वी भर के सब ऋषीश्वर और मुनीश्वर और योगीश्वर आदि
उपस्थित थे पर श्रीक्रुशन का पंचजन्य शंख जो चिन्ह यज्ञ के सुफल होने का है नहीं बजा ।
राजा युधिष्ठिर ने कारण पूछा तो श्रीक्रुशन ने उत्तर दिया कि यह सब जो जमा हुए हैं
अहंकारी हैं इनमें कोई सच्चा भक्त नहीं है, जाओ बाल्मीकि नामक स्वपच अर्थात् डोम
को जो सच्चा भक्त और महात्मा है आदर सहित बुला लाओ तब यज्ञ सुफल होगा ।
यह सुनकर भीमसेन स्वपच को बुलाने को भेजे गये । भीमसेन ने अहंकार से स्वपच से
कहा कि चल तुझे राजा ने याद किया है । स्वपच ने जवाब दिया कि मैं पूजा पर बैठा
हूँ जरा माला मेरी खूँटी से उतार कर मुझे दे दीजिये तो जाप करके तुर्त चला आऊँ ।
भीमसेन ने कुभाव से माला को खूँटी से उतार कर देना चाहा पर यद्यपि उनको अस्सी
हजार हाथी का बल था उस माला को न उठा सके, फिर भी अहङ्कार न छूटा और नाक
भौँ चढ़ा कर बोले कि तूही उठ कर लेले मुझे देर होती है । जब भीमसेन लौट कर गये तो
श्रीक्रुशन से कहा कि महाराज स्वपच थोड़ी देर में हाजिर होता है । श्रीक्रुशन हँस कर
युधिष्ठिर से बोले कि आप खुद जाकर बुला लाइये । जब राजा युधिष्ठिर स्वपच के घर
पहुँचे तो उसे खिचड़ी पकाते पाया, बड़ी आधीनता से प्रार्थना की कि यज्ञ में सुशोभित
होकर उसे सुफल कीजिये । स्वपच बोला कि मैं तो नीच डोम यज्ञ में बैठने योग्य नहीं
हूँ पर राजा की आज्ञा सिर आँखों पर धरता हूँ जरा खिचड़ी खा लूँ । राजा ने जवाब
दिया सब काम से निपट लीजिये मुझे जल्दी नहीं है । स्वपच ने हाँडी से थोड़ी खिचड़ी
निकाल कर राजा के सामने धरी, राजा ने यह कह कर कि धन्य भाग उसके जिसे भक्तों
का प्रसाद मिले पूरे भाव से हाथ फैलाया परन्तु स्वपच ने अपना हाथ खींच लिया कि
ऐसा नहीं हो सकता और उठकर राजा के साथ हो लिया । जब यज्ञ में पहुँचा तो श्रीक्रुशन
ने पांडवों की स्त्री द्रोपदी से उत्तम उत्तम प्रकार के भोजन बनवा रक्खे थे जिसे थालों में
रुकमिणी जी ने सजाकर स्वपच के सामने धरा । स्वपच मीठे सलोने खट्टे इत्यादि सब
प्रकार के भोजन एक साथ सान कर मुंह में भरने लगा । यह तमाशा देख कर द्रोपदी के
जी में आया कि आखिर डोम मेरे पकाये हुए उत्तम खानों का स्वाद क्या जाने । इस
खयाल के उपजते ही स्वपच ने हाथ खींच लिया और पंचजन्य शंख जो उसके आते ही
बजने लगा था एक बारगी बन्द हो गया तब लोग फिर श्रीक्रुशन के समीप आये । श्रीक्रुशन
बोले कि द्रोपदी से पूछो कि उसके जी में क्या खयाल गुजरा । द्रोपदी बड़ी लज्जित