गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
११८ गरीबदास जी की बानी
कोटि कटक करहूँ पैमाला । जम किकर का तोड़ूँ जाला ॥
चौदह कोट बाँध जम लाऊँ । धरमराय कूँ त्रास दिखाऊँ ॥
चौदह भुवन दुहाई गाजै । जिस कूँ सुन जम किकर भाजै ॥
भक्ति बीज जो होवै हंसा । कोटिन जीव उधारै बंसा ॥
उधरैं हंस पार हो जाहीं । भवसागर में बहुर न आहीं ॥
॥ साखी ॥
सब्द हमारा मानि है, जाके हिरदय हेत ।
अमर लोक पहुँचावहूँ, रूप धरत है सेत ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मराया । हम संखौं हंसा पद परसाया ॥
जिन लीन्हा हमरा परवाना । सो हंसा हम किये अमाना१ ॥
अमृत पान अमी रस चोखा । पीवो हंसा नाहीं धोखा ॥
या रस की जो लगै खुमारी । गगन मँडल में सुन्न अधारी ॥
झरै अमी रस अमृत धारा । जानैगा कोइ पीवनहारा ॥
हंस परेवा२ अमृत पीवै । संखौं कल्प जुगै जुग जीवै ॥
टूटै बंधन होत खुलासा । गरीबदास पद हंस निवासा ॥
( २ )
सेत सिंघासन सेतहि अंगा । सेत छत्र जाको सेतहि रंगा ॥
सेत खवास सेत ही चौंरा । सेतै पुहुप लेत ही भौंरा ॥
सेतै नाद सेत ही तूरा । सेत सिंघासन नाचै हूरा३ ॥
सेतै नदी सेत ही बिरछा । सेतै चंदन मस्तक चरचा४ ॥
सेत सरोवर सेतहि हंसा । सेतै जा का सब कुल बंसा ॥
सेतै मंदिर चंदर जोती । सेतै मानिक मुक्ता मोती ॥
सेतै मुकुट सेत ही थाना । सेत धुजा औ सेत निसाना ॥
गरीबदास वह धाम हमारा । सुर नर मुनि जन करो बिचारा ॥
(१) निश्चिन्त । (२) कबूतर । (३) अप्सरा । (४) लगाया ।
रमैनी ११६
( ३ )
बिनहीं पंथ पंथ है भाई । बिन चरनों चालै सो जाई ॥
बिनहीं देह धरै जहँ ध्याना। देह न गेह१ न पिंड न प्राना ॥
पिंड ब्रह्मांड बाक नहिं बानी । मन बुधि सेती अगम निसानी ॥
अलिफ इलाम२ गाम नहिं गेहा । गगन मँडल में जुरा सनेहा ॥
एता ईलम३ जो दिखलावै । सो सतगुरु साँचा कहलावै ॥
गरीबदास मन धरै न धीरं । अधर धार पंथ बाट कबीरं ॥६॥
( ४ )
रूप न रेख भेष नहिं बाना । आसन असल लना४ अस्थाना ॥
अकल अभूनी५ गम नहिं मोरी । हे सतगुरु कहँ पाऊँ डोरी ॥
ऊँचा धाम गाम नहि कोई । बिना चरन जहँ चलना होई ॥
अचरज लीला अगम अपारा । कैसे पाऊँ पंथ तुम्हारा ॥
सुरत निरत का सार सनेसा६ । उतरै हंसा पार हमेसा ॥
कहै कबीर पुरुष बरियामं७ । गरीबदास इक नौका नामं ॥
( ५ )
आदि सनातन पंथ हमारा । जानत नाहीं यह संसारा ॥
पंथों सेती पंथ अलहदा । भेखों बीच पड़ा है बहदा८ ॥
षट दरसन सब खटपट होई । हमरा पंथ न पावै कोई ॥
हिन्दू तुरक कदर नहिं जाने । रोजा ग्यारस करै धिक ता नेह९ ॥
दोनों दोन यकौ न आसा । वे पूरब वे पच्छिम निवासा ॥
दुहूँ दोन का छोड़ा लेखा । उत्तर दखिनन में हम देखा ॥
गरीबदास हम निःचै जाना । चारो खूँट दसो दिस ध्याना ॥
( ६ )
कैसे हिंदू तुरक कहाया । सबही एकै द्वारे आया ॥ १ ॥
(१) घर । (२) अल्लाह में अलिफ और लाम दो हर्फ़ हैं—अलाम के अर्थ सर्वज्ञ
के भी हैं । (३) विद्या । (४) लामकान । (५) तुच्छ बुद्धि । (६) सँदेसा । (७) श्रेष्ठ ।
(८) बाद बिबाद । (६) मुसलमान रोजा रखते हैं और हिन्दू एकादशी का व्रत सो दोनों
को धिक्कार है।
१२० गरीबदास जी की बानी
कैसे ब्राह्मन कैसे सूद्रं । एकै हाड़ चाम तन गूदं ॥ २ ॥
एकै बिंद एक भग द्वारा । एकै सब घट बोलनहारा ॥ ३ ॥
कौम छत्तीस एकही जाती । ब्रह्म बीज सबकी उतपाती ॥ ४ ॥
एकै कुल एकै परिवारा । ब्रह्म बीज का सकल पसारा ॥ ५ ॥
ऊँच नीच इस बिध है लोई । कमे कुकर्म कहावै दोई ॥ ६ ॥
गरीबदास जिन नाम पिछाना । ऊँच नीच पद ये परमाना ॥७॥
॥ आरती ॥
अदली आरत अदल समोई । निरभय पद में मिलना होई ॥टेक
दिल का दीप पवन की बाती । चित का चंदन पाँचो पाती ॥
तत का तिलक ध्यान की धोती । मन की माला अजपा जोती ॥
नूर के दीप नूर के चौरा । नूर के पुहुप नूर के भौंरा ॥
नूर की झाँझ नूर की झालर१ । नूर के संख नूर की टालर२ ॥
नूर की साँझी३ नूर की सेवा । नूर के सेवक नूर के देवा ॥
आदि पुरुष अदली अनुरागी । सुन संपुट में सेवा लागी ॥
खोजो कमल सुरति की डोरी । अगर दीप में खेलो होरी ॥
निरभय पद में निरत समानी । दासगरीब दरस दरबानी ॥
( २ )
अदली आरत अदल उजारा । सत्त पुरुष दीजो दीदारा ॥टेक
कैसे कर छूटै चौरासी । जूनी संकट बहुत तिरासी ॥
जुगन जुगन हम कहते आये । भवसागर से जीव छुटाये ॥
कर बिस्वास स्वास कूँ पेखो । या तन में मन मूरत देखो ॥
स्वासा पार सु भेद हमारा । जो खोजे सो उतरे पारा ॥
स्वासा पार सु आदि निसानी । जो खोजै सो होय दरबानी ॥
हर दम नाम सुहंगम सोई । आवा गमन बहुर ना होई ॥
(१) बिजय घंट । (२) ताल । (३) रंग या फूल पत्ती की चित्रकारी जो ठाकुरजी के
सामने बनाई जाती है ।
अब तो चढ़े नाम के छाजैं१। गगन मँडल में नौबत बाजै ॥
अगर अलेल सब्द सहदानी। दासगरीब बिहंगम बानी ॥
( ३ )
अदली आरत अदल बखाना। कोली बुन बिहंगम ताना ॥टेक
ज्ञान का राछ२ ध्यान की तुरिया। नाम का धागा निःचै जुरिया ॥
प्रेम की पान३ कमल की खाड़ी४। सुरत का सूत बुनें निज गाढ़ी ॥
नूर की नाल५ फिरैं दिन राती। जा कोली कूँ काल न खाती ॥
कल का खूँटा धरनी६ गाड़ा। गहिर गभीना७ ताना गाड़ा ॥
निरत की नली बुन जो कोई। सो तो कोली अविचल होई ॥
रेजा८ राजिक का बुन दीजै। ऐसे सतगुरु साहब रीझै ॥
दासगरीब सोई सत कोली। ताना बुनिहै अरस अमोली ॥
( ४ )
अदली आरत अदल अजूनी। नाम बिना है काया सूनी॥टेक
झूठी काया खाल लुहारा। इला पिंगला सुखमन द्वारा ॥
किरतघनी९ भूले नर लोई। जा घट निःचा नाम न होई ॥
सो नर कीट पतंग भुवंगा१०। चौरासी में धरिहैं अंगा ॥
उद्भिज११ खानी भुगतै प्रानी। समझै नहीं सब्द सहदानी ॥
हम हैं सब्द सब्द हम माहीं। हम से भिन्न और कछु नाहीं ॥
पाप पुन्न दो बीज बनाया। सब्द भेद कोउ बिरले पाया ॥
सब्दै सर्ब लोक में गाजै। सब्द वजीर सब्द है राजै ॥
सब्दै स्थावर जंगम जोगी। दास गरीब सब्द रस भोगी ॥
( ५ )
अदली आरत अदल जमाना। जम जोरा मेटौं तलब्राना ॥टेक
धरमराय पर हमरी धाई१२। नौबत नाम चढ़े ले भाई ॥
(१) छज्जा । (२) एक आला कपड़ा बुनने का जो कंघी की सूरत का होता है ।
(३) माड़ी । (४) गड़हा जिसमें पैर लटका कर बैठते हैं । (५) ढरकी । (६) जमीन ।
(७) गभिन । (८) कपड़ा । (९) नाशुकरा । (१०) साँप । (११) बनस्पति । (१२) धावा ।
१२२ गरीबदास जी की बानी
चित्रगुप्त१ के कागज चीरौं । जुगन जुगन मेटौं तसकीरौं ॥
अदली ज्ञान अदल इक रासा२ । सुन कर हंसन३ पावैं त्रासा ॥
इजराईल४ जुसा बरदाना। धरमराय का है तलबाना ॥
मेटौं तलब करौं तागीरा५ । भेंटे दास गरीब कबीरा ॥
( ६ )
अदली आरत अदल पठाऊँ । जुगन जुगन का लेखा पाऊँ॥टेक
जा दिन नहिं थे पिंड न प्राना । पानी पवन जिमीं असमान॥
कच्छ मच्छ कूरम नहिं काया । चंद सूर नहिं दीप बनाया ॥
सेस महेस गनेस न ब्रह्मा । नारद सारद ना बिसकर्मा ॥
सिध चोरासी ना तेंतीसौ । नौ औतार नहीं चौबीसौ ॥
पाँच तत्त नाहीं गुन तीना । नाद बिंद नाहीं घट सीना ॥
चित्रगुप्त६ नहिं किर्तुम बाजी । धरमराय नहिं पंडित काजी ॥
धुँधूकार अनंत जुग बीते । जा दिन कागद कोउ के चीते७ ॥
जा दिन थे हम तखत खवासा । तन के पाजी सेवक दासा ॥
संख जुगन परलूँ परवाना । सत्तपुरुष के संग रहाना ॥
दास गरीब कबीर का चेरा । सत्तलोक अमरापुर डेरा ॥
( ७ )
ऐसी आरत अपरम्पारा । थाके ब्रह्मा बेद उचारा ॥टेक
अनंत कोट जाके संभू ध्यानी । ब्रह्मा संख बेद पढ़ैं बानी ॥
इंद्र अनंत मेघ रस माला । सब्द अतीत वृद्ध नहिं बाला ॥
चंद सूर जाके अनंत चिरागा । सब्द अतीत अजब रँग बागा॥
सात समुद्र जाके अंजन नैना । सब्द अतीत अजब रँग बैना ॥
अनंत कोट जाके बाजे बाजैं । पूरन ब्रह्म अमरपुर छाजैं ॥
तीस कोट रामा औतारी । सीता संग रहंती नारी ॥
(१) जमपुरी में कर्मों का लेखा रखने वाला देवता । (२) एक रस । (३) जीव ।
(४) जान निकालने वाले फ़िरिश्ते का नाम । (५) तंगो । (६) कर्मों का लेखा रखने वाले
देवता । (७) तब तक कर्मों का हिसाब किसी का नहीं खुला था ।
तीन पदम जाके भगवाना। सप्त नील¹ कन्हवा² सँग जाना ॥
तीस कोट सीता सँग चेरी। सप्त नील राधा दें फेरी ॥
(जाके) अर्ध रूप पै सकल पसारा। ऐसा पूरन ब्रह्म हमारा ॥
दास गरीब कहै नर लोई। यह पद चीन्है बिरला कोई ॥
॥ दोहा ॥
सतबादी सब संग हैं, आप आपने धाम।
आजिज³ की अरदास⁴ है, सकल संत परनाम ॥
॥ राग कल्यान ॥
सेस सहस मुख गावै, साधो सेस सहस मुख गावै ॥टेक॥
ब्रह्मा बिस्नु महेसर थाके, नारद नाद बजावै।
सनक सनंदन ध्यान धरत हैं, दृष्ट मुष्ट नहिं आवै ॥ १ ॥
लघु दीरघ कछु कहा न जाई, जो पावै सो पावै।
जी⁵ जूनी कूँ कैसे दरसै, गौरज सीस चढ़ावै ॥ २ ॥
ब्रह्म रंध्र का घाट जहाँ है, उलट खेचरी⁶ लावै।
सहस कमल दल झिलमिल रंगा, चोखा फूल चुवावै ॥ ३ ॥
गंगा जमना मद्ध सरसुती, चरन कमल से आवै।
परबी कोटि परम पद माहीं, सुख के सागर न्हावै ॥ ४ ॥
सुरत निरत मन पौन पदारथ, चारो तत्त मिलावै।
आकासै उड़ चलै बिहंगम, गगन मँडल कूँ धावै ॥ ५ ॥
मोर मुकुट पीताँबर राजै, कोटि कला छबि छावै।
अबरन बरन तासु के नाहीं, बिचरत हैं निरदावै ॥ ६ ॥
बिनही चरनों चलै चिदानंद, बिन मुख बैन सुनावै।
गरीबदास यह अकथ कहानी, ज्यूँ गूँगा गुड़ खावै ॥ ७ ॥
कबहुँ न होवे मैला नाम धन, कबहुँ न होवे मैला।
चेतन होकर जड़ कूँ पूजै, मूरख मूढ़र बैला ॥ १ ॥
(१) नील = एक सौ खरब । (२) कन्हैया या कृष्ण । (३) आधीन । (४) अर्जदाश्त,
प्रार्थना । (५) जीव । (६) नाम एक मुद्रा का ।
१२४ गरीबदास जी की बानी
जिस दगड़े पंडित उठ चालै, पीछे पड़ गया गैला१ ।
औघट घाटी पंथ बिकट है, जहाँ हमारी सैला ॥ २ ॥
बिनय बंदगी म्हेसा२ कीजै, बोक३ बनै के खैला४ ।
कूकर सूकर खर कीजैगा, छ्वाँड़ सकल बद फैला५ ॥ ३ ॥
घरही कोस पचास परत हैं, ज्यूँ तेली के बैला ।
पीसत भाँग तमाखू पीवै, मूरख मुख सूँ मैला ॥ ४ ॥
सहस इक्कीसौ छःसै दम है, निस बासर तूँ लैला६ ।
गरीबदास सुन पार उतर गये, अनहद नाद घुरैला७ ॥ ५ ॥
( ३ )
घट ही में चंद चकोरा, साधो घट ही चंद चकोरा ॥टेक॥
दामिन दमकै घनहर८ गरजै, बोलै दादुर मोरा ।
सतगुरु गस्ती गस्त फिरावै, फिरता ज्ञान ढँढोरा ॥ १ ॥
अदली राज अदल बादसाही, पाँच पचीसो चोरा ।
चीन्हो सब्द सिंध घर कीजै, होना गारतगोरा ॥ २ ॥
त्रिकुटी महल में आसन मारो, जहँ न चलै जम जोरा ।
दास गरीब भक्ति को कीजो, हुआ जात है भोरा६ ॥ ३ ॥
( ४ )
घट से दरस जहूरा, साधो घट से दरस जहूरा ॥टेक॥
कायर कीर उलट कर भागे, पहुँचेगा कोइ सूरा ।
गगन मँडल में अनहद बाजै, भनकैं झीने तूरा१० ॥ १ ॥
त्रिकुटी महल में ध्यान समोवो, झिलमिल झिलमिल नूरा ।
अगर दीप में आसन मारो, मिट गई जम की घूरा११ ॥ २ ॥
संख पदम जहँ परघट देखे, मुरसिद मिलिया पूरा ।
दास गरीब अटल जागीरा, काढ़ कौन कसूरा ॥ ३ ॥
(१) जिस रास्ते पर पंडित चलते हैं उसी पर सब चलने लगते हैं। (२) हमेशा ।
(३) भारी बकरा । (४) साँड़ । (५) कुकर्म । (६) लेता है । (७) जिसकी अन्तर में धुन
हो रही है । (८) बादल । (६) सबेरा । (१०) तुरही । (११) टेढ़ी निगाह ।
राग बिजोग १२५
( ५ )
जो सूते सो जना बिगूते१, जागे सोई जगे हैं ॥टेक॥
सूरे तेई नगर पहुँचे, कायर उलट भगे हैं।
नौवें द्वारे दरस दरीबा२, दसमें ध्यान लगे हैं ॥ १ ॥
सुन्न सहर में हुई सगाई, हमरे हंस मँगे हैं।
निरगुन नाम निरालंब चीन्हो, हमरे साध सगे हैं ॥ २ ॥
बिन मुख बानी सतगुरु गावै, नाहीं दस्त३ पगे४ हैं।
दास गरीब अमर पुर डेरे, सत्त के दाग दगे हैं ॥ ३ ॥
( ६ )
नाम निरंजन नीका, साधो नाम निरंजन नीका ॥टेक॥
तीरथ बरत थोथरे५ लागैं, जप तप संजम फीका ॥ १ ॥
भजन बंदगी पार उतारै, समरथ जीवन जी का ॥ २ ॥
करम कांड ब्योहार करत है, नाम अभय पद टीका ॥ ३ ॥
कहा भयो छत्र की छाँह चलैया, राज पाट दिहली का ॥ ४ ॥
नाम सहित बेवतन भला है, दर दर माँगे भीखा ॥ ५ ॥
आदि अनादि भक्ति है नौधा६, सुनो हमारी सीखा ॥ ६ ॥
गरीबदास सतगुरु की सरनै, गगन मँडल में दीखा ॥ ७ ॥
॥ राग बिजोग ॥
सुनियो संत सुजान, दिया मैं हेला रे ॥टेक॥
और जनम बहुतेरे होंगे, मानुष जनम दुहेला७ रे ॥ १ ॥
तू जकिहै८ मैं लसकर जोरों, चलना तुझे अकेला रे ॥ २ ॥
अरब खरब लग माया जोरी, संग न चलसी धेला रे ॥ ३ ॥
या तो मेरी सत की निबरिया, सतगुरु पार पहेला रे ॥ ४ ॥
दास गरीब कहै रे संतो, सब्द गुरू चित चेला रे ॥ ५ ॥
(१) बिगड़े। (२) हाट। (३) हाथ। (४) पाँव। (५) थोथे। (६) नौ प्रकार की।
(७) कठिन। (८) बिचारता है।
१७
१२६ गरीबदास जी की बानी
( २ )
सुनिये संत सुजान, गरब नहिं करना रे ॥ टेक ॥
चार दिनाँ की चिहर¹ बनी है, आखिर तोकूँ मरना रे ॥ १ ॥
तूँ जाने मेरि ऐसी निभेगी, हर दम लेखा भरना रे ॥ २ ॥
खाय ले पी ले बिलस ले हंसा, जोड़ जोड़ नहि धरना रे ॥ ३ ॥
दास गरीब सकल में साहब, नहीं किसी सूं अड़ना रे ॥ ४ ॥
॥ राग परज ॥
राम न जाना रे, मूढ़ नर राम न जाना रे ॥टेक॥
जल की बुंद महल रचा, यह सकल जहाना रे।
जठर अगिन सूं राखिया, तेरा पिंड अरु प्राना रे ॥ १ ॥
जहँ तो कूँ भोजन दिया, अमृत रस खाना रे।
गरभ बास तें काढ़ि कै, नर बाहर आना रे ॥ २ ॥
लीला अगम अगाध है, सूरत बिध नाना रे।
मात पिता सुत बंधवा, क्या देख भुलाना रे ॥ ३ ॥
इनमें तेरा को नहीं, क्यों भया दिवाना रे।
जा तन चंदन लेपते, ले धरे मसाना रे ॥ ४ ॥
सूवे सेंभल सेइया, तर देख लुभाना रे।
चंच² मार ब्याकुल भया, बहुतै पछताना रे ॥ ५ ॥
मानसरोवर कमल दल, घर दूर पयाना रे।
गये रसातल राह को, पढ़ पोथी पाना³ रे ॥ ६ ॥
सतगुरु संत सेये नहीं, पूजे पाषाना रे।
मरकव भये कुम्हार के⁴, फिर सूकर स्वाना रे ॥ ७ ॥
पंथ पुरातम⁵ बूझि है, कोई संत सुजाना रे।
स्वासा पारस नाम है, नाभी अस्थाना रे ॥ ८ ॥
(१) जिन्दगी । (२) चोंच । (३) पन्ना । (४) कुम्हार के चढ़ने का जानवर यानी गधा ।
(५) प्राचीन ।
राग परज १२७
हिरदय में हरि पाइये, त्रिकुटी परवाना रे।
गगन मँडल में गुमठ१ है, जहँ धसा निसाना रे॥ ९ ॥
हाजिर नाजिर है धनी, साहब दिल दाना रे।
पलकों चौंरा२ कीजिये, तापर कुरबाना रे॥१०॥
मन पवन सुरत से अगम है, कह निरत बयाना रे।
जैसे उलट अकास कूँ, धरिहै धुन ध्याना रे॥११॥
आसन बंध अडोल मन, जो पर्दहि समाना रे।
गरीबदास यूँ पाइये, पिव पुरुष पुराना रे॥१२॥
( २ )
लेखा लीजै रे, धनी के लेखा लीजै३ रे॥टेक॥
हाट पटन सब लुट गये, कहु अब क्या कीजै रे।
पूँजी माल गँवाइया, फिर कौन पतीजै रे॥ १ ॥
मैं गाफिल भूला फिरूँ, गढ़ हंस चढ़ीजै रे।
चाकर चोर अनादि का, सिर बोझा दीजै रे॥ २ ॥
सीस काट हाजिर करै, जब सतगुरु रीझै रे।
अमी महारस नाम है, अमृत पय पीजै रे॥ ३ ॥
गगन मँडल भाठी भरै, कमला दल भींजै रे।
सब्द अनाहद घोर है, चल हंस सुनीजै रे॥ ४ ॥
पूँजी साहूकार की, यह हर दम छीजै रे।
गरीबदास दूने करै, सो साह कहीजै रे॥ ५ ॥
( ३ )
लेखा देना रे, धनी का लेखा देना रे॥ टेक ॥
रागी राग उचारहीं, गावत मुख बैना रे।
हस्ती घोड़े पालकी, छाँड़ी सब सैना रे॥ १ ॥
रोकड़ धरी ढकी रही, सब जेवर गहना रे।
(१) गुम्बज। (२) चँवर। (३) ईश्वर के यहां हिसाब लिया जायगा।
१२८ गरीबदास जी की बानी
फूँक दिया मैदान में, कुछ लेन न देना रे ॥ २ ॥
मुगदर मारै सीस में, जम किंकर दहना रे।
उतर चला तागीर१ हो, ज्यूँ मरदक सहना२ रे ॥ ३ ॥
फूला सो कुम्हलात है, चुनिया सो ढहना३ रे।
चित्रगुप्त लेखा लिया, जब कागद पहना४ रे ॥ ४ ॥
चलिये अब दीवान में, सतगुरु से कहना रे।
मुसकिल से आसान हो, ज्यूँ बहुर मरै ना रे ॥ ५ ॥
बोया अपना सब लुनै५, पकरैं हम अहना६ रे।
चरन कमल के ध्यान से, छूटै सब फैना७ रे ॥ ६ ॥
परानन्दनी८ संग है, जाके कमधैना९ रे।
गरीबदास फिर आवही, जो अजर जरै ना रे ॥ ७ ॥
( ४ )
भजन कर राम दुहाई रे ॥ टेक ॥
जनम अमोला तुझ दिया, नर देही पाई रे।
देही कूँ या ललचहीं, सुर नर मुनि भाई रे ॥ १ ॥
सनकादिक नारद रटैं, चहुँ बेदा गाई रे।
भक्ति करै भवजल तरै, सतगुरु सरनाई रे ॥ २ ॥
मिरगा१० कठिन कठोर है, कहो कहाँ दहकाई११ रे।
कस्तूरी है नाभ में, बाहर भरमाई रे ॥ ३ ॥
राजा बूड़े मान में, पंडित चतुराई रे।
ज्ञान गली में बंक१२ है, तन धूर मिलाई रे ॥ ४ ॥
उस साहब कूँ याद कर, जिन सौंज१३ बनाई रे।
देखत ही हो जात है, परबत से राई रे ॥ ५ ॥
(१) तंग । (२) मसल मशहूर है “उतरा शहना मर्दक नाम”। (३) जो घर चुना
या बनाया जाता है वह कोई दिन गिर जायगा । (४) लंबा चौड़ा । (५) काटै। (६) लोहा ।
(७) फन्दा । (८) परम आनन्द या रस की खान । (६) कामधेनु । (१०) मन । (११)
धोखा खाया । (१२) टेढ़ाई, पेच । (१३) साज ।
राग मंगल १२६
कंचन काया छार१ होय, तन ठोंक जराई रे ।
मूरख भोंदू बावरे, क्या मुकत कराई रे ॥ ६ ॥
चमरा२ जुलहा३ तर गये, और छीपा४ नाई५ रे ।
गनिका चढ़ी बिमान में६, सुर्गापुर जाई रे ॥ ७ ॥
स्योरी भिलनी तर गई, और सदन कसाई रे ।
नीच तरे तो सूँ कहूँ, नर मूढ़ अन्याई रे ॥ ८ ॥
सब्द हमारा साँच है, और ऊँट की बाई रे७ ।
धूँएँ के से धौलहर, तिहुँ८ लोक चलाई रे ॥ ६ ॥
कलविष कसमल सब कटै, तन कंचन काई रे ।
गरीबदास निज नाम है, नित परबी न्हाई रे ॥ १० ॥
राग मंगल
लगन लगी सतलोक, अमरपुर चालिये ।
सुन्न मँडल सतलोक, दीप घर बालिये ॥ टेक ॥
जोगिया नाद बजाय, रहा है ओलने९ ।
सत्तलोक के अंक, लिखे हैं चोलने ॥ १ ॥
हम बिभिचारिन, चोरि जारि बहुतै किये ।
मेहरबान महबूब, तुम्हीं अनगिन दिये१० ॥ २ ॥
होते कीट पतंग, संग किस बिध लिये ।
कपै जोरा काल, सही जुग जुग जिये ॥ ३ ॥
अकल उदासी राग, अमर११ में बोलता ।
सुरत निरत भइ नेस१२, पवन नहिं डोलता ॥ ४ ॥
मन राते सतलोक, सिंध में गैब है ।
उलट मिले अनुराग, तहाँ नहिं ऐब है ॥ ५ ॥
(१) राख । (२) रैदास जी । (३) कबीर साहब । (४) नामदेव । (५) सेना भक्त ।
(६) नोट पृष्ठ २१ देखो । (७) सब्द के सिवाय सब पसारा ऊँट की बाव अर्थात् मिथ्या
है । (८) तीनों । (९) परदे में । (१०) तुम्हारी अपार छिमा और दया हुई । (११)
सत्तलोक । (१२) नेष्ठा ।
१३० गरीबदास जी की बानी
निरगुन झड़१ का भेद, भँवर कोई जानसी ।
दास गरीब समाध, अमरपुर ठानसी ॥ ६ ॥
( २ )
दीन के दयाल, भक्ति बिर्द२ दीजिये ।
खानाजाद गुलाम, अपन कर लीजिये ॥ १ ॥
खानाजाद गुलाम, तुम्हारा है सही ।
मेहरवान महबूब, जुगन जुग पत रही ॥ २ ॥
बाँदी-जाम३ गुलाम, गुलाम गुलाम है।
खड़ा रहै दरबार, सु आठो जाम है ॥ ३ ॥
सेवक तलबदार४, दर तुम्हरे कूकहीं ।
औगुन अनँत अपार, परी मोहि चूक हीं ॥ ४ ॥
मैं घर का बन्दाजादा, अरज मोरि मानिये ।
कहता दास गरीब, अपन कर जानिये ॥ ५ ॥
( ३ )
धन सतगुरु बरियाम५, अटल बर हम बरी ।
दुलहिन के बड़ भाग, सुहागिन धन घरी ॥ टेक ॥
चलो सखी सतलोक, सेहरा गाइये ।
मोतियन थाल भराय, सु चौक पुराइये ॥ १ ॥
हलदवान६ हित कीन, बीन जहाँ बाजहीं ।
धन सतगुरु उपदेस, दिहाड़ा७ आजहीं ॥ २ ॥
दुलहिन धोये देह, सु मंगल गावहीं ।
सत्त पुरुष के धाम, सु चौर दुरावहीं ॥ ३ ॥
ढुरै सुहंगम चौर, सु चौरी८ गाइये ।
ब्रह्मा कथते बेद, लाड़ी परनाइये६ ॥ ४ ॥
(१) झाड़, फुलवारी । (२) साख । (३) लौंडी-बच्चा । (४) तनखाह पानेवाले । (५)
बरीयान-श्रेष्ठ । (६) हल्दीहाथ की रसम । (७) दिन । (८) मंडप की गीत । (६) दुलहिन
को ब्याहिये ।
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राग मंगल १३१
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संकर साहा सोध१, समागम कीजिये ।
बिसुन बिसंभर रोप, अटल बर दीजिये ॥ ५ ॥
नारद पूरे नाद, सकल सुर आवहीं।
सुन्न मंडल सतलोक, अगम घर छावहीं ॥ ६ ॥
जहाँ सेत धजा फहराहिं, अरस२ तंबू तना।
अनहद नाद अगाध, लाये नूरी बना३ ॥ ७ ॥
नाद तूर डफ झाँझ, संख मुरली बजै।
मिरदंग झालर भेरि, अजब तुरही सजै ॥ ८ ॥
रंग महल में रास, बिलास अपार है।
चलो सखी उस धाम, सु कंत हमार है ॥ ६ ॥
दस परकार अपार, अजब धुन ध्यान है।
दूलह बर बरियाम, पिया निःकाम है ॥१०॥
बिखम दुहेली४ बाट, पंथ नहि पाइये।
सुन्न मंडल सतलोक, कौन बिध जाइये ॥११॥
सुन्न मंडल सतलोक, दुलहिनी दूर है।
सब्द अतीत५ पिछान, नूर भरपूर है ॥१२॥
नूर रहा भरपूर, दिवाना देस है।
दुलहिन दास गरीब, तखत जिस पेस है ॥१३॥
( ४ )
अवगत अपरंपार, पार नहि पावै हो ।
नाद बिंद का जीव, भरम डहकावै हो ॥टेक॥
मन मनसा नहिं ठौर, ध्यान कहा धरिये हो ।
का सूँ करूँ फरियाद, कहो क्या करिये हो ॥ १ ॥
तज दुरमत का संग, रंग नहिं लागै हो ।
कोट जनम का स्वान६, हाड़ नहिं छाँड़ै हो ॥ २ ॥
[Footnotes]
(१) लगन सोधना। (२) अर्श = सहसदल कमल । (३) दुलहा। (४) कठिन।
(५) निर्माया। (६) कुत्ता।
१३२ गरीबदास जी की बानी
बिषै हलाहल खाय, जगत सब धूता१ हो ।
ज्यूँ हिरना के संग, सिकारी कूता२ हो ॥ ३ ॥
कौवा तजै न बीठ३, हंस कस होई हो ।
अंध गुरू का चेल, खेल सब खोई हो ॥ ४ ॥
बैठा मंझ मँजार४, मूसटे५ खाई हो ।
बाहर किसा६ अचार७, बूड़ी पंडिताई हो ॥ ५ ॥
बक मीनी८ का ध्यान, नहीं नर धरिये हो ।
भौसागर में आन, बहुर क्यूँ परिये हो ॥ ६ ॥
पारस पद कूँ परस, सुरत ठहरावो हो ।
निरत निरन्तर लाय, अगमपुर जावो हो ॥ ७ ॥
जहँ झिलमिल झिलमिल होय, अजब खिलखाना८ हो ।
कहता दास गरीब, सुदेस दिवाना हो ॥ ८ ॥
( ५ )
रतनागर१० सुख सागर, हंसा चाल रे ।
जहँ पारस पदम अनंत, अमीते११ माल रे ॥ १ ॥
रतन सिंध वैराग रे, मुक्ते११ माल हैं।
हीरे मोती मुक्ते, लालों पाल११ हैं ॥ २ ॥
कामधेनु कलबृच्छ१२, चिंतामनि चीन्ह रे ।
लोचन खुलहिं अनंत, अरस दुरबीन रे ॥ ३ ॥
खुलिहैं अंध कपाट, लगै जो चाचरी१३ ।
सिम्भुद्वार१४ दुरबीन, तहाँ पद बाँच री ॥ ४ ॥
बंका हीरा देखि, सुरत हैरान है।
सेत धजा फहराहिं, अमरपुर थान है ॥ ५ ॥
(१) धूर्त, कपटी । (२) कुत्ता । (३) विष्टा । (४) बिल्ली । ५) चूहे । (६) कैसा । (७)
आचार, नेम धरम । (८) बकुला और मछली । (६) खिलवत खाना = एकान्त में मिलने
का स्थान । (१०) सुन्न सरोवर । (११) बहुत । (१२) कल्प वृक्ष । (१३) नाम एक मुद्रा
का । (१४) शिव-नेत्र या तीसरा तिल ।
मान सरोवर परबी, हर दम लीजिये।
झिरै गऊमुख गंग, तहाँ सिर दीजिये ॥ ६ ॥
पलकों चौर दुराहिं, नयन पट बीच है।
गरीबदास गुलजारा, परमल¹ सींच है॥७॥
॥ राग बँगला ॥
बँगला खूब बना है जोर, जामें सूरज चंद कड़ोर ॥टेक॥
या बँगले के द्वादस दर हैं, मध्य पवन परवाना।
नाम भजै तो जुग जुग तेरा, नातर होत बिराना ॥ १ ॥
पाँच तत्त औ तीन गुणन का, बँगला अधिक बनाया।
या बँगले में साहब बैठा, सतगुरु भेद लखाया ॥ २ ॥
रोम रोम तारागन दमकै, कली कली दर चंदा।
सूरज मुखी सबत्तर² साजै, बाँधा परमानन्दा ॥ ३ ॥
बँगले में बैकुंठ बनाया, सप्तपुरी सैलाना।
भुवन चतुरदस लोक बिराजैं, कारीगर करवाना ॥ ४ ॥
या बँगले में जाप होत है, ररङ्कार धुन सेसा।
सुर नर मुनि जन माला फेरैं, ब्रह्मा बिस्नु महेसा ॥ ५ ॥
गन गंधर्प गलतान ध्यान में, तेंतिस कोटि बिराजैं।
सुर निःतन्ती बीना सुनिये, अनहद नादू बाजैं ॥ ६ ॥
इला पिंगला पेंग परी है, सुखमन झूल झुलन्ती।
सुरत सनेही सब्द सुनत है, राग होत निःतन्ती ॥ ७ ॥
पाँच पचीसो मगन भये हैं, देखो परमानंदा।
मन चंचल निःचल भया हंसा, मिले परम सुख सिंधा ॥ ८ ॥
नभ की डोर गगन सूँ बाँधै, तौ इहाँ रहने पावै।
दसो दिसा से पवन झकोरै, काहे दोस लगावै ॥ ६ ॥
(१) निर्मल, सुगंधित। (२) सब जगह।
१८
१३४ गरीबदास जी की बानी
आठो बखत अल्हैया¹ बाजै, होता सब्द टँकोरा ।
गरीबदास यूँ ध्यान लगावै, जैसे चंद चकोरा ॥१०॥
( २ )
बँगला सोई सत्त परवान, तामें पारब्रह्म का ध्यान ॥टेक॥
साढ़े तीन करोड़ बृच्छ² हैं, या बँगले के पासा ।
सालेमार सरीर सरोवर, नौ लख बाग खुलासा ॥ १ ॥
या बँगले के आगे कूआ, उरध-मुखी महमंता ।
मनुवा माली वारे ढारै, आठो बखत चलंता ॥ २ ॥
इला पिंगला मद्ध सुखमना, ता पर एक सुराही ।
अमी महारस छाक परी है, पीवत होय रुसनाई ॥ ३ ॥
रोसन तकिये रास होत है, बाजे बजैं अपारा ।
पाँचौं इन्द्री अस्थिर होई, घूमै मन मतवारा ॥ ४ ॥
संखौं कमल कलस की नाईं, सेत भमर झनकारैं ।
कोयल मोर पपीहा बोलैं, दादुर अधिक गुंजारैं ॥ ५ ॥
बीना ताल पर पखावज बाजै, गावै गंधर्प रागी ।
सिव की तहाँ समाध लगी है, चीन्ह पड़ी बड़ भागी ॥ ६ ॥
ध्रू प्रहलाद और नाम³ कबीरा, नारद सुकदे व्यासा ।
गोरख दत्त भये गलताना, देखा अजब तमासा ॥ ७ ॥
ब्रह्मा बिस्नु महेसर सेसा, ररंकार धुन होई ।
गुफ⁴ बीरज⁵ यह मंत्र जो दीन्हा, राख सब्द कूँ गोई⁴ ॥ ८ ॥
मान सरोवर ऊपर बँगला, जहँ हंस परमहंस खेलै ।
गरीबदास भवसागर सेती, पूरा सतगुरु बेलै⁶ ॥ ६ ॥
( ३ )
बँगला सोई सत्त निज सार, जा में पारब्रह्म दीदार ॥टेक॥
(१) एक रागिनी का नाम । यहां अनहद धुन से मतलब है । (२) रोम (रोआँ) की
गिनती शास्त्रों में साढ़े तीन करोड़ लिखी है । (३) नाम देव । (४) गुप्त । (५) बीज मंत्र
ओंकार शब्द का नाम है । (६) उबारै ।
राग बँगला १३५
दिल अंदर दीदार होत है, बाहर भीतर सोई।
तिरबेनी असनान कीजिये, मल मुत्तर सब धोई ॥ १ ॥
बँगले आगे संख फुहारा, फूटैं सहसर१ धारा।
दिब्य दृष्ट तो देखत है सो, हर दम बारम्बारा ॥ २ ॥
गंगा जमुना मद्ध सुरसती, पट्टन घाट फुहारा।
कालिन्द्री काया परछाली२, धन बड़ भाग हमारा ॥ ३ ॥
इंदरदौन३ महोधध३ बाजै, रतनागर४ लहराई।
जगन्नाथ जगदीश बिराजै, देखो क्यूँ ना भाई ॥ ४ ॥
हरद्वार हरि पैड़ी न्हाये, बद्रीनाथ बिलासा।
द्वारावती५ दरस नित होई, कर बृन्दावन बासा ॥ ५ ॥
लोहागिर३ पुष्कर३ पद परसे, गया३ पिंड परधाना।
अठसठ तीरथ हैं तन माहीं, मोच्छ मुक्त भये प्राना ॥ ६ ॥
कासी औ कांती६ काया में, मोच्छ दायका माया।
अकल अजोध्या आदि अनादं, सप्त पुरी दरसाया ॥ ७ ॥
अवन्तिकापुरी६ अरथ के माहीं, सुरत निरत से जानी।
गरीबदास साहब का बँगला, अजर अमर परवानी ॥ ८ ॥
( ४ )
बँगला खूब बना प्राचीन, जा में अरस७ कला दुरबीन ॥टेक॥
बँगले आगे ज्योढ़ी लागी, पलकों दी चिक बंधा।
छानबे कोटी मेघ माल८ है, सब्द सिंध गरजंदा ॥ १ ॥
बँगले आगे नग सरवर९ है, तेंतिस कोट तपंता१०।
सहस अठासी मुनिन्दर बैठे, सोहं जाप जपंता ॥ २ ॥
बँगले आगे बाट११ बिहंगम, दो दर हैं भितरी के।
(१) हजार । (२) धोई । (३) तीर्थों के नाम । (४) समुद्र जिसमें मोती पैदा होता
है । (५) द्वारिका । (६) तीर्थों के नाम । (७) सहसदलकँवल । (८) बादलों का समूह ।
(९) रत्न का सागर । (१०) जहाँ तेंतीस कोट देवता तपस्या करते हैं। (११) रास्ता ।
१३६ गरीबदास जी की बानी
ब्रह्म रंध्र१ का घाट जहाँ है, साधू चढ़ै सु देखे ॥ ३ ॥
बँगले आगे नटवा२ नाचै, ताहि लखै नहि कोई ।
पड़ै गगन से धरती ऊपर, खंड बिहंड न होई ॥ ४ ॥
बँगले भीतर रतन अमोली, सेत पीत नहिं जरदा ।
बिनहीं चरनों चलै चिदानंद, चसमों आगे फिरदा ॥ ५ ॥
रिग जजु साम अथर्वन चारो, बँगले माहिं बिराजैं ।
सुखम३ बेद से तारी लागी, अनहद नौबत बाजैं ॥ ६ ॥
आसन पदम लगाय रहा है, हाथ कमंडल डंडा ।
ब्रह्मा आदि अनादं बैठे, चार बेद धुन खंडा ॥ ७ ॥
सुखम बेद से सुरत लगावै, सो सुरती महँ अंगा ।
गरीबदास बाहर क्यूँ भरमै, घटही अंदर गङ्गो ॥ ८ ॥
( ५ )
बँगला खूब बना है बेस४, यामें ररङ्कार धुन सेस ॥टेक॥
रोम रोम में नाम चलत है, अजपा तारा लागी ।
सुरत निरत पर अनहद बाजै, सुनते हैं अनुरागी ॥ १ ॥
मूल चक्र का घाट बाँध कर, सुखमन पवन अरोधै ।
परथम आदि गनेस मनावै, नाभि कमल कूँ सोधै ॥ २ ॥
बङ्क नाल का घाट बिकट है, जहाँ खेचरी लावै ।
अमी महारस अमृत पीवै, अजर अमर हो जावै ॥ ३ ॥
दहिने गङ्गा बायें जमुना, मद्ध सुरसती धारा ।
उलटा मीन चढ़ै सरवर में, ऐसा खेल हमारा ॥ ४ ॥
हाथ न पैर पिंड नहि प्राना, सुन सरवर में खेलै ।
बाँस बल्ली नौका नहिं लागै, (तौ) कैसे भौंरा पेलै ॥ ५ ॥
दूरबीन ऐनक अनुसरी, पवन पिंड भर गोला ।
सुरत निरत की सुरङ्ग लगावै, दरसै रतन अमोला ॥ ६ ॥
(१) शिवनेत्र, तीसरा तिल । (२) मन । (३) सूक्ष्म । (४) उत्तम ।
राग बँगला १३७
कोट कोट दामिन दमकाहीं, गरजै सिंध समूचा।
सीलवंत सैलानी जोगी, मिलै काछ का सूचा१ ॥ ७ ॥
संखौं पदम झिलमिलै जोती, अगम पंथ बैराटा।
गरीबदास सतगुरु के सारै२, उतरै औघट घाटा ॥ ८ ॥
(६)
बँगला अजब बना है खूब, जामें पार ब्रह्म महबूब ॥टेक॥
आगे नौलख पातुर नाचैं, ब्रह्मानंद रिझावैं।
तेज पुंज की सुंदर नारी, अनहद मंगल गावैं ॥ १ ॥
पीतंबर फहरात तासु कै, सूहे३ बस्तर साजैं।
एक कान्ह औ नौलख गोपी, बँगले माहिं बिराजैं ॥ २ ॥
चंद सूर दो अधर चिरागा, हुकमी पौन औ पानी।
सकल संत औ सकल साहबी, बङ्गले माहिं बिनानी ॥ ३ ॥
पाँचो तत्त खवास खड़े हैं, हाजिर नाजिर जाके।
तिरलोकी का राज रसातल, क्या कोड़ी धज लाखै४ ॥ ४ ॥
सब रतनन का रतन नाम है, नाम रतन कूँ जानै।
इन्द्र का राज काग की बिष्टा, जासे उलटा तानै ॥ ५ ॥
हीरा मोती जबाहिर ताईं, पारस पल्ले न बाँधै।
सब्द सिध चिंतामन साहब, सुरत गगन कूँ साधै ॥ ६ ॥
चिंतामन पारस परमेसर, हिरदे माहिं बिराजै।
गरीबदास ताही कूँ सेवै, जाका अविचल राजै ॥ ७ ॥
(७)
बँगला खूब बना है ऐन५।
जामें कलबिरछा६ काम धैन ॥ टेक ॥
गंगा कोट त्रिवेनी संगम, कासी गया प्रयागा।
(१) लँ गोट का पक्का। (२) सहायता से, सहारे। (३) लाल। (४) पारब्रह्म की शोभा
के आगे तीन लोक का राज जहन्नुम के बराबर और करोड़ों की सम्पत गई है। कोड़ी-
धज = कोटिध्वज (देखो नोट पृष्ठ ७७)। (५) सुन्दर। (६) कल्पवृक्ष।