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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

इकतीसवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप सद्गुरु अच्युत ! तुम्हें नमस्कार है। तुम देहधारी होते हुए भी देहातीत हो। गुणों में रहते
हुए भी निर्गुणत्व से विचरण करते हो। तुम्हें देह के प्रति ममता नहीं है। बचपन में तुमने विष प्राशन किया था;
पूतना का प्रत्यक्ष शोषण किया था और दावाग्नि का प्राशन किया था। तुम वैकुण्ठ के सिंहासन को सुशोभित
करते हो, तुम्हें देहाभिमान नहीं है। स्वयं गोपालकों के साथ रहकर उनके साथ कबड्डी खेलते हो। कर्मशील
ब्राह्मण कर्म के बल पर तुम तक पहुँचने के लिये सदा छुआछूत का आश्रय लेते हैं और तुम ग्वालों के बेटों के
साथ मिल-जुल कर खाना खाते थे। जिसे दुराचार कहते हैं, वह व्यभिचार कर गोपियों का उद्धार किया। तुम्हारा
यह चरित्र वेदशास्त्रों को भी अगम्य है। घर में सोलह हजार स्त्रियाँ और एक लाख साठ हजार बच्चे खेलते हुए
भी, तुम्हें बाल ब्रह्मचारी के रूप में सनत्कुमार वंदन करते हैं। तुम्हारे ब्रह्मचर्य की महत्ता को शुक नारद भी मान्य
करते हैं और मारुति भी चरणों पर लोटते हैं। तुम ऐसे निष्ठावान ब्रह्मचारी हो। व्रतबंध होने के पूर्व ही तुमने
ग्वालों की लड़कियों का भोग किया, तुम निश्चय ही ऊर्ध्वरेता हो, तुम्हें भीष्म भी वन्दन करते हैं। नौ लाख गौवों
की रस्सी से भी तुम नहीं बँध सके लेकिन श्रद्धा के बल पर रासक्रीड़ा में तुम्हें गोपियों ने बाँध लिया। तुम उनकी
इच्छानुसार क्रीड़ा कर रहे थे। छह महीने तक तुमने उनके साथ क्रीड़ा की। इस प्रकार काम को स्पर्श किये बिना
तुम स्त्रियों का काम पूरा कर रहे थे। विधि वेदार्थ को लज्जित कर तुमने सारी गोपियों को तारा। गोपियों को
अद्भुत प्रेम से तारा; वेणुगीत से गौओं का उद्धार किया और श्रीकृष्ण ! निजयोग सामर्थ्य से समस्त ग्वालों का
तारा। दुष्ट बुद्धि कंस और अपराधी व्याध को भी तारा। श्रीकृष्ण ! तुम संसार की सीमा होते हुए भी कृपालु हो।
कृष्ण की बात नहीं काट सकता था इसलिये यम भी गुरु के पुत्र को वापस ले आया। जो कलिकाल से भी कभी
हार नहीं मानता, उस श्रीकृष्ण ने क्या देह त्याग कर दिया ? देव निजधाम जाते हैं यह अध्याय भागवत का कलश
है। इसका गहन अभिप्राय शुकदेव परीक्षित को बताते हैं। कलश के ऊपर कोई चीज नहीं चढ़ायी जाती। उसी
प्रकार भगवान निजधाम जाने के बाद निरूपण कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसीलिये उसे कलश कहते हैं।
वेदशास्त्रों का रहस्य यही है कि अहँभाव नहीं होना चाहिये। श्रीकृष्ण का निजधामगमन ब्रह्मादि देवताओं के
लिये भी अतर्क्य है। फिर भी जनार्दन की कृपा होने के कारण एकनाथ उसका विशद वर्णन करके बताएगा।
दारुक द्वारका जाने के बाद श्रीकृष्ण निजधाम के लिये निकल पड़े। उस समय उनका निर्वाणकाल का दर्शन लेने
के लिये समस्त देवतागण वहाँ आये। उसी अर्थ का निरूपण श्रीशुक्राचार्य बता रहे हैं और श्रोता परीक्षित भी
कृष्ण का निर्वाण सुनने के लिये सावधान होकर बैठा है।
श्रीशुक उवाच
अथ तत्रागमद् ब्रह्मा भवान्या च समं भवः ।
महेन्द्रप्रमुखा देवा मुनयः सप्रजेश्वराः ॥ १ ॥
पितरः सिद्धगन्धर्वा विद्याधरमहोरगाः ।
चारणा यक्षरक्षांसि किन्नराप्सरसो द्विजाः ॥ २ ॥

८३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
जो व्यास का प्राण है, योगियों का मुकुटमणि है, वह श्रीशुक स्वयं श्रीकृष्ण के निर्वाण का निरूपण कर रहे
हैं। शुक्राचार्य कहते हैं, हे परीक्षित्! श्रीकृष्ण ने निजधाम के लिये प्रस्थान किया उस समय सारे देवतागण
विमानों में बैठकर अत्यन्त तीव्रता से वहाँ आये। ब्रह्मदेव द्रुत गति से आये। शंकर भी पार्वती को लेकर आये।
इन्द्रप्रमुख सारे देवतागण अपने गणों के साथ वहाँ आये। सनकादिक मुनियों की पंक्तियाँ तथा दक्ष आदि प्रजापति
भी वहाँ आये। अर्यमादि आदि पितर आये और कपिलादि महासिद्ध भी दौड़ते हुए आये। गन्धर्व और विद्याधर
आये। यक्ष, चारण, किन्नर तथा विभीषणादि बड़े-बड़े राक्षस भी श्रीकृष्ण को देखने के लिये दौड़ते हुए आये।
श्रीकृष्ण को देखने के लिये पाताल से नाग भी आये; जिन्हें 'महोरग' अर्थात् प्रचण्ड सर्प कहते हैं, वे भी शीघ्रता
से आये। दत्तात्रेय आदि द्विज आये। नारद भी कौतुक देखने आये। उसी प्रकार गरुड़ आदि पक्षी भी तत्परता से
एकत्र हो गये। रंभा, उर्वशी, मेनका आदि अष्टनायिका अप्सरा भी कृष्णदर्शन के हेतु वहाँ एकत्र हो गयीं।
कृष्णस्वरूप देखने की लालसा से देवताओं का समूचा समुदाय वहाँ एकत्र हो गया।
द्रष्टुकामा भगवतो निर्याणं परमोत्सुकाः ।
गायन्तश्च गृणन्तश्च शौरेः कर्माणि जन्म च ॥ ३ ॥
कृष्ण को देखने के लिये दृष्टि आतुरता से दौड़ रही थी। सर्वत्र गड़बड़ी मच गयी। कृष्णरूप की माधुरी
इतनी विलक्षण थी। अब पुनः कृष्ण का दर्शन कैसे होगा ? इसलिये कृष्ण का निर्वाण काल का दर्शन लेने के लिये
सारे देवतागण अत्यन्त आतुरता से वहाँ आये हुए थे। घनश्याम जैसी सुन्दर मूर्ति तो सौन्दर्य की पराकाष्ठा थी। उस
कृष्ण के निजधाम जाने पर फिर हमें दर्शन कब मिलेगा ? देवताओं को श्रीकृष्ण दर्शन की लालसा लगी हुई थी।
इसीलिए वे अत्यन्त शीघ्रता से दर्शन के लिये आये थे। कोई श्रीकृष्ण के कार्यों का वर्णन कर रहा था, तो कोई
उसके चरित्र के गीत गा रहा था, इस प्रकार सभी उनके दर्शन के लिये अत्यन्त आतुरता से आये थे।
ववृषुः पुष्पवर्षाणि विमानावलिभिर्नभः ।
कुर्वन्तः संकुलं राजन् भक्त्या परमया युताः ॥ ४ ॥
आकाश में चारों ओर विमानों की भीड़ लगी हुई थी। उनमें बैठे देवताओं ने श्रीकृष्ण को देखते ही उनकी
जय-जयकार की। श्रीकृष्ण को देखकर उनका अन्तःकरण भक्ति से आर्द्र हो उठा और उन सबने मिलकर
अनवरत पुष्पवृष्टि की। कृष्ण के चारों ओर फूलों का ढेर लग गया। उस समय साँवले सलोने श्रीकृष्ण की शोभा
अत्यन्त न्यारी लग रही थी।
भगवान् पितामहं वीक्ष्य विभूतीरात्मनोविभुः ।
संयोज्यात्मनि चात्मानं पद्मनेत्रे न्यमीलयत् ॥ ५ ॥
समस्त देवतागण तीव्र गति से वहाँ एकत्र हो गये। तब सामने ही खड़ा ब्रह्मदेव श्रीकृष्ण को दिखायी पड़ा
और अपनी ही जैसी विभूति शंकर को भी श्रीकृष्ण ने देखा। उसी प्रकार इन्द्रादि देवतागण, जो उनकी अपनी ही
विभूतियाँ थीं उन्हें देखकर श्रीकृष्ण ने अपनी पद्मपत्र जैसी पलकें सहज ही बन्द कर लीं। आँखें खोलीं, बन्द
कीं, लेकिन उसमें कोई परिवर्तन नहीं दिखायी दिया। वह आत्मस्वरूप से परिपूर्ण आत्मा ही था; फिर कृष्ण ने
आँखें क्यों बन्द कर ली थीं ? देवताओं का समुदाय देखकर कृष्ण ने कुछ बोले बिना आँखें बन्द कर लीं, उसका
कारण सुनिये। श्रीकृष्ण जब द्वारका में थे, उस समय बड़े-बड़े देवतागण प्रार्थना करने आये थे। उन्होंने देवकी

इकतीसवाँ अध्याय ८३१
पुत्र श्रीकृष्ण से आदरपूर्वक बिनती की थी कि हम दासों की ओर कृपा की दृष्टि से देखें (अर्थात् हमारा रक्षण
करें) समस्त देवताओं का समुदाय, स्वर्लोकादि लोकपाल ये सब तुम्हारे दास हैं इसलिये निजधाम जाते समय
एक बार हमारे यहाँ आकर हमारे आश्रम को पवित्र करें। उन सब देवताओं को श्रीकृष्ण ने अपने मुख से बताया
था कि यादवकुल का क्षय होने के बाद, अन्त में मैं इस मार्ग से अवश्य आऊँगा। श्रीकृष्ण का भाषण सुनकर सारे
देवताओं को अत्यन्त आनन्द हुआ था; वे समझ गये कि श्रीकृष्ण हमारे वश में हैं, इसीलिये उन्होंने हमारा वचन
अस्वीकार नहीं किया। उस दिन का स्मरण कर इस मौके का लाभ उठाने के लिये देवताओं का समुदाय यहाँ
आया था। उनका वह अभिमान उतर जाने के लिये ही श्रीकृष्ण ने आँखें बन्द कर ली थीं। देवताओं का समुदाय
बहुत बड़ा है, मैं किसके-किसके यहाँ जाऊँ? उनको छकाने के लिये ही भगवान ने आँखें बन्द कर समाधि
लगाने का अभिनय किया। कृष्ण परिपूर्ण परब्रह्म ही था। उसके लिये न समाधि है, न व्युत्थान है। उसने समाधि
लगाने का केवल अभिनय किया। योगियों को स्वच्छंद मृत्यु रहती है लेकिन श्रीकृष्ण की स्थिति वैसी भी नहीं
थी। शंकरादि देवताओं को भी उसकी गति अतर्क्य थी। वही स्थिति शुक्राचार्य परीक्षित को बताते हैं।
लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमङ्गलम्।
योगधारणयाऽऽग्नेय्यादग्ध्वा धामाविशत् स्वकम्॥ ६॥
जो योगी लोग कलिकाल को भी जीत कर इच्छा मृत्यु प्राप्त करते हैं, वे पूर्णरूप से अग्निधारणा कर,
अपना देह जलाकर स्वरूप में मिल जाते हैं। जैसे घृत पिघलता है, उसी प्रकार जो सगुण है वह निर्गुणत्व प्राप्त
करता है। इसी को 'योगाग्निधारण' कहते हैं। कृष्ण देह दहन कदापि नहीं होगा। श्रीकृष्ण का स्वरूप परिपूर्ण
था। वह योगधारणा क्यों करेगा? उसका देह लीलाविग्रही था। तो फिर दहन किसका किया जाय? उसे आँखों से
देखना ही पर्याप्त है, ध्यान वहीं लग जाता है। मन उसी में लगा रहता है। कृष्ण का सौन्दर्य परिपूर्ण तथा संसार
को मोहित करने वाला है। जिसके सौन्दर्य का दर्शन कर मदन स्वयं गर्भ में आ गये थे, चैतन्यघन श्रीकृष्ण के
चरणों को देखकर लक्ष्मी भी मोहित हो गयी थीं। योगी सदा जिसका ध्यान करते रहते हैं, शंकर आदि भी
जिसका नित्य चिंतन करते हैं; ऐसे सर्व-मंगल का जो अधिष्ठान है, वही चैतन्यघन श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्ण स्वयं
आत्माराम होने के कारण वह संसार को भी आराम ही दिलाने वाला है। वह लीलाविग्रही घनश्याम ध्यानगम्य
और चिद्रूप है। जमे हुए घृत की जैसे मूर्ति बनायी जाय, उसी प्रकार चैतन्य में ढली हुई कृष्णमूर्ति स्वलीला से
बनी हुई थी। इसीलिये जब उस देह ने दावाग्नि प्राशन किया, तो उस पर कालिया सर्प के विष का असर नहीं
हुआ क्योंकि वह देह था ही नहीं। फिर उसे मृत्यु कैसे आयेगा? कृष्ण जिसके हृदय में प्रकट होता है, वह देह में
होते हुए भी विदेही हो जाता है, ऐसे उस कृष्ण में देहत्व कैसे होगा? कृष्ण का देह नष्ट नहीं हुआ; दर्पण का
प्रतिबिम्ब जिस प्रकार स्वयं में विलीन हो जाता है, उसी प्रकार जो भास था वह मूल स्वरूप में मिल गया।
जिसका नामस्मरण करते ही भक्तों का जन्म-मरण समाप्त हो जाता है, वह कृष्ण ही यदि मर जायेगा तो भक्तों
का उद्धार कौन करेगा? आत्ममाया की लीला से कृष्ण, कृष्ण के रूप में प्रकट हुआ था, वह लीला छोड़कर
निजरूप में निजत्व में स्थिर हो गया। कृष्ण देह को न ले गया, न छोड़ गया। उसने लीला से ही उसे भक्तों के
ध्यान में रखा और स्वयं निजधाम चला गया। जैसी भक्त की श्रद्धा होती है, वैसा ही भगवान होता है। इसलिये
देखो! वह भक्त के ध्यान में ही अपना देह स्थापित कर, निजधाम न जाकर ही चला गया। कृष्ण की मूर्ति यद्यपि
सगुण साकार थी, लेकिन उस देह का दहन होना सम्भव नहीं था क्योंकि सारा संसार ही श्रीकृष्ण के आश्रय में

८३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
होने के कारण, यदि कृष्ण के देह का दहन होता तो सारे संसार का ही दहन हो जाता। जिसने अपनी माँ को
बचपन में, पेट में अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड का दर्शन कराया था, उस कृष्ण के देह का दहन हो जाने पर संसार की
बात करना ही सम्भव नहीं होगा। श्रीकृष्ण का देह विदेहरूप था, उसका दहन कैसे होता ? कृष्ण का रहना और
जाना अकेले कृष्ण ही जानें। उसके सम्बन्ध में वेद की वाचा भी मौन हो जाती है। उसका ज्ञान यहाँ नहीं चल
पाता। कृष्ण की यह अगम्य गति ब्रह्मदेव और शंकर के भी समझ में नहीं आती। उनका विचार था कि श्रीकृष्ण
हमारे साथ चलेंगे। इसी विचार से देवताओं का समुदाय आनन्दित हुआ और उन्होंने बड़े आनन्दोत्सव का
आयोजन किया।
दिवि दुन्दुभयोनेदुः पेतुः सुमनसश्च खात्।
सत्यं धर्मो धृतिर्भूमेः कीर्तिः श्रीश्चानु तं ययुः ॥७॥
देव अत्यन्त आनन्दित हुए, उन्होंने दुन्दुभी बजाना शुरू किया और आकाश से श्रीकृष्ण पर दिव्य पुष्पों की
वर्षा की। वैकुण्ठ तथा स्वर्ग से श्रीकृष्ण मृत्युलोक में सम्पत्ति ले आये थे, वह अब हमें वापस मिल जायेगी यह
सोच कर देवतागण हर्षित हो गये और वे कृष्ण पर बार-बार पुष्पवृष्टि करने लगे, किन्तु शंकरादि देवतागण जब
ध्यानपूर्वक श्रीकृष्ण की ओर देख रहे थे तभी अतर्क्य गति से श्रीकृष्ण निजधाम चले गये। कैसे गये, किसी को
मालूम नहीं हुआ। हम सब माया के नियंता हैं, सर्वद्रष्टा तथा सर्वज्ञाता हैं ऐसा देवताओं को अभिमान था, किन्तु
श्रीकृष्ण ने उन सबको लज्जित कर दिया। कृष्ण की गति अतर्क्य थी, वह ब्रह्मदेव और शंकर की भी समझ में
नहीं आयी इसलिये वे चकित रह गये। अन्य सारे देवता भी आश्चर्य करने लगे। देवतागण आश्चर्य कर रहे हैं,
तभी सत्य, धर्म, धृति और कीर्ति ये देवता भी लक्ष्मी के साथ पृथ्वी छोड़कर कृष्ण की ओर देखकर चल दीं।
सत्य, धर्म, श्री, धृति और कीर्ति इनकी श्रीकृष्ण चरणों के पास बस्ती थी, इसलिये वे भी पृथ्वी छोड़कर तत्काल
कृष्ण के साथ चल दीं। लेकिन हे परीक्षित ! शायद तुम सोचोगे कि क्या सत्य, धर्म, श्री, धृति और कीर्ति ये सभी
पृथ्वी छोड़ कर चली गयीं ? उसके बारे में भी सुनो। हे कुरुश्रेष्ठ! मेरा विचार है कि जिनके हृदय में श्रीकृष्ण की
मूर्ति अंकित रहती है, वहाँ सत्य, धर्म, श्री, धृति और कीर्ति का साम्राज्य रहता है। केवल भक्तों का अनुग्रही
श्रीकृष्ण स्वयं लीलाविग्रही (अर्थात् स्वेच्छा से, विग्रह अर्थात् देह धारण करने वाला) कृष्ण की गति ब्रह्मादि
देवताओं की भी समझ में नहीं आयी।
देवादयो ब्रह्ममुख्या न विशन्तं स्वधामनि।
अविज्ञातगतिं कृष्णं ददृशुश्चातिविस्मिताः ॥८॥
इन्द्र, बृहस्पति और मुख्य रूप से ब्रह्मदेव इन सभी देवताओं को भ्रम में डालकर श्रीकृष्ण ने निजधाम में
प्रवेश किया। हरि की यह महिमा अतर्क्य है। श्रीकृष्ण की अतर्क्य गति, देवताओं को भी अपने सामर्थ्य से नहीं
मालूम हुई इसलिये वे मन ही मन विस्मित होकर अपने-अपने गंतव्य स्थल की ओर चल पड़े। वे इस बात से
चकित थे कि कृष्ण की गति अलक्ष्य है। वह समझ में आने लायक नहीं है। शंकर के लिये भी वह अतर्क्य है।
कृष्ण की ऐसी अतर्क्य गति, जो देवताओं को दैवी शक्ति के रहते भी समझ में नहीं आयी, वही शुक्राचार्य दृष्टांत
देकर परीक्षित को समझा रहे हैं।
सौदामन्या यथाऽऽकाशे यान्त्याहित्वाभ्रमण्डलम्।
गतिर्न लक्ष्यते मर्त्यै स्तथा कृष्णस्य दैवतैः ॥ ९ ॥

इकतीसवाँ अध्याय ८३३
मेघमण्डल में बिजली कड़कती है, लेकिन वह कहाँ से आती है और कहाँ जाती है, यह जिस प्रकार
पृथ्वी पर के लोगों को नहीं मालूम होता; उसी प्रकार कृष्ण की अवतार शक्ति भी देवताओं को नहीं मालूम हुई।
वैकुण्ठ से आना और वापस जाना यह कृष्ण को सम्भव ही नहीं है क्योंकि वह सदा-सर्वदा परिपूर्ण भरा ही हुआ
है। आकाश में बस्ती करने के लिये जिस प्रकार खाली मकान नहीं मिलेगा, उसी प्रकार श्रीकृष्ण परमात्मा सर्वत्र
व्याप्त होने के कारण उसे दूसरी ओर जाने के लिये कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार श्रीकृष्ण निजधाम गया।
उसकी महिमा अत्यन्त अद्भुत है। कृष्ण की महत्ता अतर्क्य होने के कारण उसके सम्बन्ध में तर्क नहीं चलता
यह सोचकर देवतागण अपने-अपने गंतव्य स्थान की ओर चल दिये।
ब्रह्मरुद्रायस्ते तु दृष्ट्वा योगगतिं हरेः।
विस्मितास्तां प्रशंसन्तः स्वं स्वं लोकं ययुस्तदा ॥ १० ॥
"हम अपने सामर्थ्य से माया के नियंता हैं। योग की दुर्गम गति हमें मालूम है, हम त्रिभुवन में सर्वद्रष्टा
अर्थात् सर्वज्ञ हैं।" इस प्रकार का अहंकार देवताओं में था। कृष्ण की गति देखकर उनकी जानकारी पानी पानी
हो गयी। लज्जा से अहंकार चूर-चूर हो गया। तब उन्होंने कृष्ण की स्तुति करना प्रारम्भ किया। शंकर पाँच मुखों
से स्तुति करने लगा। ब्रह्मदेव चार मुखों से कीर्ति का वर्णन करने लगा। कृष्ण की अगम्य गति देखकर समस्त
देवतागण आश्चर्यचकित रह गये। श्रीकृष्ण की स्तुति करके देवताओं को संतोष ही नहीं हो रहा था। वे उसी
प्रकार उनकी कीर्ति का वर्णन करते-करते अपने-अपने लोक चले गये। पहले कृष्ण की जो गति बतायी थी उसी
को अत्यन्त प्रेमपूर्वक, स्पष्ट करके श्रीशुकाचार्य पुनः परीक्षित को सुनाते हैं।
राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहा मायाविडम्बनमवेहि यथा नटस्य।
सृष्ट्वाऽऽत्मनेदमनुविश्य विहृत्य चान्ते संहृत्य चात्ममहिमोपरतः स आस्ते ॥ ११ ॥
राजा परीक्षित! सुनो। श्रीकृष्ण इन सारे कारणों का कारण था। वह माया की भी चेतनाशक्ति था। जिसे
व्यक्तित्व नहीं है और वर्ण नहीं है, जिसे रूप नहीं है और गुण भी नहीं है, उस श्रीकृष्ण ने अपनी लीला से ही
यदुवंश में अवतार लिया था। जो सारे वंश का मूल पुरुष, जो गोत्रों का गोत्रज, जो सारे जातियों की जाति, वही
यह श्रीकृष्ण स्वयं सबका आदिस्थान है। यदुवंश में उसका जन्म, अथवा गोवर्धन पर्वत उठाना आदि कर्म, उसी
प्रकार स्वकुल का क्षय, अथवा स्वयं का निर्वाण, यह सारा योगमाया का खेल है। उसी की सत्ता से उसने मत्स्य
कूर्मादि अवतार लिये। अन्त में उसी सत्ता से वह श्वेतवराह भी बना। श्रीकृष्ण की यह योग्यता अतर्क्य है।
श्रीकृष्ण केवल अवतार ही नहीं, अपितु वह तो चित्स्वरूप पूर्णब्रह्म है। उसका चरित्र अत्यन्त अतर्क्य, वह
ब्रह्मदेव, शंकर आदि के भी समझ में नहीं आता। जिस प्रकार दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, उसी प्रकार
यदुवंश में कृष्ण का जन्म हुआ। दर्पण में जिस प्रकार व्यक्ति के हाव-भाव दिखायी देते हैं, वैसे ही श्रीकृष्ण के
कर्म थे। हाथ से दर्पण गिरा दें तो जिस प्रकार सामने का प्रतिबिम्ब नष्ट हो जाता है; उसी प्रकार कृष्ण का निधन
मिथ्या और मायिक है। जिस प्रकार बहुरूपिया अनेक प्रकार के वेश धारण करता है और फिर उसे उतार देता है,
लेकिन बहुरूपिया नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार श्रीकृष्ण का अवतार था। यदुवंश में कृष्ण का जन्म हुआ था, फिर
भी वह सारे कर्मों से अलिप्त ही था। सृष्टि, स्थिति और अन्त होने पर भी वह नित्यमुक्त ही था। उसमें परम
अद्भुत ऐसे क्या होगा? किसी से किसी भी प्रकार की सहायता लिये बिना कृष्ण स्वयं ही सृष्टि की उत्पत्ति
करता है; उसका उचित प्रतिपालन करता है और फिर उसका संहार कर स्वयं शेष रहता है। कृष्ण उत्पत्ति,

८३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्थिति और लय करता है, उसकी यह महत्ता संसार में प्रत्यक्ष दिखायी देती है। कृष्ण सारे कर्म करके भी सदा
अविकारी रहता है। कभी भी विकारी नहीं होता। वह प्रत्येक प्राणिमात्र का अंतर्यामी है। संसार के सारे कर्मों का
कर्ता होते हुए भी वह अकर्ता और स्वस्वरूप से विदेही ही था। ऐसे श्रीकृष्ण की महिमा अगाध है। शिव, इन्द्र
और ब्रह्मदेव भी उसकी थाह नहीं पा सकते। उसका देह ही विदेह रूप था। उसी योग से वह निजधाम गया,
इसी अवतार में कृष्ण ने देह में विदेह कर्म दिखला दिया। यह तुम्हें पहले बता ही दिया है और भी बताता हूँ,
सुनो। उसने सात दिन तक अपने हाथ पर गोवर्धन पर्वत उठाकर इन्द्र का घमण्ड चूर कर दिया था। स्वयं
दावाग्नि प्राशन कर अग्नि को लज्जित किया और रासक्रीड़ा करके मदन का गर्व भी शान्त कर दिया। समुद्र को
पीछे हटा कर अपनी द्वारका नगरी बसायी और निद्रा भंग किये बिना सारी मथुरा द्वारका ले आये। सब्जी का पत्ता
खिलाकर सारे ऋषियों को तृप्त किया और अपने अंतर्यामी होने का लक्षण दिखला दिया। इसी देह से वह बछड़े
और उसका पालन करने वाला गोपाल बना और ब्रह्मदेव को लज्जित कर उसका अहंकार नष्ट किया।
मर्त्येन यो गुरुसुतं यमलोकनीतं त्वां चानयच्छरणदः परमास्त्रदग्धम्।
जिग्येऽन्तकान्तकमपीशमसावनीशः किं स्वावने स्वरनयन्मृगयुं सदेहम्॥ १२॥
श्रीकृष्ण ने इसी देह से यमलोक जाकर यम का निग्रह कर मृत गुरुपुत्र को वापस लाया। उत्तरा के गर्भ में
ब्रह्मास्त्र की महाशक्ति से तुम जल रहे थे, ऐसी स्थिति में श्रीकृष्ण ने अपने चक्र से तुम्हारा संरक्षण किया।
तुम्हारा संरक्षण करने का कारण यही था कि तुम्हारी माँ उसकी शरण में चली गयी और कृष्ण शरणागत की रक्षा
करने वाला है तथा भक्तों का संकट दूर करने वाला है। द्वारका में अर्जुन ने यादवों के सामने प्रतिज्ञा की थी कि
षष्ठी के दिन द्विज के पुत्र का मैं संरक्षण करूँगा। लेकिन वह लड़का उसी रात सदेह अदृश्य हो गया। तब उस
ब्राह्मण ने अर्जुन की भर्त्सना की। इससे अर्जुन को लज्जित होना पड़ा। इससे कृष्ण के मन में दया का उदय हुआ
और वह भक्त की सहायता के लिये आ पहुँचा। अर्जुन को लेकर कृष्ण रथ में बैठा और क्षीरसागर की ओर चल
पड़ा। वहाँ नारायण के पास उस ब्राह्मण का पुत्र था, उसे द्वारका लाया। इस प्रकार श्रीकृष्ण भक्त का संकट स्वयं
दूर करते थे। श्रीकृष्ण प्रताप की महिमा अलौकिक है और भी सुनो। बाणासुर की सहायता करने शंकर युद्ध
करने आया, उस समय कृष्ण ने नंदी, भृंगी, वीरभद्र तथा कार्तिक स्वामी आदि के साथ शंकर को पराजित
किया। उग्र से भी उग्र, भयंकर से भी भयंकर कालाग्निरुद्र को पराजित कर बाणासुर की भुजाओं का भार कम
कर दिया। कृष्ण का वचन भी अगाध है। जिसने महान अपराध किया था, उस जरा व्याध को अपने वचन पर
दृढ़ रह कर देह के साथ स्वर्ग भेज दिया। इतना सामर्थ्य जिस श्रीकृष्ण के पास था, क्या वह अपना देह बचाने में
असमर्थ था ? लेकिन उसके देह में देहत्व था ही नहीं। वह निजात्म रूप से निजधाम गया। इतना सामर्थ्य होते
हुए वह निजधाम क्यों गया ? उसी देह से इस लोक में रहने में क्या उसे किसी का भय था ? ऐसा विकल्प
तुम्हारे मन में शंका उत्पन्न कर सकता है। तो सुनो। श्रीकृष्ण के मन में लोकाभिमान जरा भी नहीं था। उसकी
स्थिति स्वेच्छा की थी। (अर्थात् अन्य जीवों की तरह कर्म परतंत्र नहीं था।)
तथाप्यशेषस्थितिसम्भवाप्ययेष्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक्।
नैच्छत् प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं मर्त्येन किं स्वस्थगतिं प्रदर्शयन्॥ १३॥
माया तथा उसके सत्त्वादि तीनों गुणों का कारण स्वयं श्रीकृष्ण हैं। अनादित्व के कारण उसका कोई कारण
नहीं है। अनंतकोटि ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति, स्थिति और लय करके भी वह अलिप्त ही रहता है। श्रीकृष्ण में अनेक

इकतीसवाँ अध्याय ८३५
अद्भुत सामर्थ्य थे। संसार में जो बड़ी-बड़ी शक्तियाँ हैं, उनमें श्रीकृष्ण की शक्ति के अंश से ही सामर्थ्य प्राप्त
हुआ है। उसका देह विदेहस्थिति का होने के कारण ही वह अपनी इच्छा से निजधाम गया। श्रीकृष्ण के मन में
इहलोक की आसक्ति नहीं थी और वैसे निजधाम के प्रति भी आतुरता नहीं थी। इसी देह से इस लोक में रहना
भी उसे उपयुक्त नहीं लगा क्योंकि उसने सोचा कि मेरे देह की अगम्य स्थिति को देखकर साधकों की स्थिति
बिगड़ जायेगी। मेरा देह चैतन्यघन होने के कारण उसे विषय की बाधा नहीं होती, यह देखकर साधक भी
देहसाधना करने लगेंगे। वायु का पूर्ण निरोध कर अपना देह अमर कर, मेरी तरह विषय सेवन करने का उन्हें
मोह होगा और देहाभिमान भी बढ़ेगा और ऐसा देहाभिमान बढ़ने पर उनका निजात्मज्ञान नष्ट हो जायेगा। इस
विचार से श्रीकृष्ण विदेहरूप से निजधाम चले गये। मेरे आत्मज्ञान का आकलन तो नहीं होगा लेकिन योगी लोग
मेरी तरह विषयसेवन अवश्य करने लगेंगे। इसीलिये वह निजधाम चला गया। जिसके देह का दर्शन करने से मन
अंतर्बाह्य तृप्त हो जाता है, वह देह ही मिथ्या है यह दिखाकर वह निजधाम चला गया। इस प्रकार देहाभिमान
छोड़ने के लिये ही कृष्ण ने निजधाम का गमन किया। उस कृपा सागर ने साधक जनों को तारने के लिये ही यह
दीक्षा दी। यहाँ तक वैराग्य की स्थिति दृढ़ हो और देहाभिमान के प्रति विरक्ति उत्पन्न कर आत्मज्ञान साध्य किया
जाय यही दीक्षा श्रीकृष्ण ने दी। इसके अतिरिक्त, श्रीकृष्ण ने जिस देह से अनेक लीलायें कीं लेकिन उस देह के
कर्म से ज्ञाता को दोष नहीं लगता, यह भी उन्होंने प्रकट किया। जय मिले या पराजय, किसी भी स्थिति में ज्ञाता
का मन मलिन नहीं होता। जिसे पुरुषों का और स्त्रियों का भास भी मिथ्या लगता है, वह व्यभिचार में भी
निरन्तर ब्रह्मचारी ही है। स्त्री बच्चों के साथ गृहस्थी करते हुए भी कोई नित्य संन्यासी हो सकता है यह लक्षण
भी श्रीकृष्ण ने अपने अवतार में दिखला दिया। मूलरूप में ग्वाला, लेकिन शीघ्र ही मथुरा में पूर्ण स्वामित्व प्राप्त
हुआ और अन्त में स्वयं सेवक ही बना लेकिन पूर्णत्व में बाधा नहीं आयी। एक के घर जूठन उठायी, एक के
घोड़ों को नहलाया-धुलाया फिर भी पूर्णत्व में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आयी। किसी को उसके मृत पुत्र
लौटाये; किसी के पूरे कुल का ही नाश कर दिया लेकिन इन दोनों कृतियों में उसका ज्ञान मलिन नहीं हुआ यह
भी दिखा दिया। एक का पूर्ण समर्थक बना तो दूसरे का कट्टर शत्रु बन गया लेकिन चराचर में स्थापित ऐक्य
रत्तीभर भी कम नहीं हुआ। जिसके चरणों पर गिरते ही उनका उद्धार हो गया, वह स्वयं भी किसी के चरणों पर
मस्तक रखता है। उसके ज्ञान का महत्त्व किन शब्दों में वर्णन किया जाय? परस्पर विरुद्ध कृतियों में भी उसके
ज्ञान में कमी नहीं आयी। अन्य ज्ञातागण अपना ज्ञान शब्दों में व्यक्त करते हैं किन्तु कृष्ण की बात वैसी नहीं थी।
उसने उसके अनुसार आचरण कर मार्ग दिखला दिया। ज्ञान के अत्यन्त गूढ़ लक्षण श्रीकृष्ण ने अपने आचरण में
दिखला दिये, फिर भी पूर्णत्व के कारण अपने में कोई कमी नहीं आने दी। जिस देह की इतनी ख्याति है, जिस
देह के कारण ही दीनजनों का उद्धार होता है, जिस देह को देव, दानव और मानव भी वन्दन करते हैं और जिस
देह की कीर्ति त्रैलोक्य वर्णन करता है, उस देह का निःशेष अभिमान त्याग कर, अपनी मूर्ति स्वभक्तों के ध्यान में
रखकर श्रीकृष्ण निजधाम चला गया। श्रीकृष्ण देह को ले भी नहीं गये और छोड़ भी नहीं गये। वह लीला विग्रह
से समस्त विश्व में व्याप्त होकर, वह लीलादेह अपने भक्तों के ध्यान में प्रतिष्ठित किया और स्वयं निजात्म योग
से निजधाम चला गया।
य एतां प्रातरुत्थाय कृष्णस्य पदवीं पराम्।
प्रयतः कीर्तयेद् भक्त्या तामेवाप्नोत्यनुत्तमाम्॥ १४॥
श्रीकृष्ण अवतार के अन्त में कृष्ण की जो परमगति हुई, वह सर्वोत्तम योगस्थिति है। वह देवश्रेष्ठों को भी

८३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अतर्क्य है। उस गति से ऊँची कोई गति ही नहीं है। इसीलिये ज्ञाता वेदशास्त्र में उसे 'परा पदवी' कहते हैं। कृष्ण
की इस 'परमपदवी' का जो कोई भक्तियुक्त भावना से, शुद्ध अंतःकरण से, नित्य नियमपूर्वक प्रातःकाल पठन
करेगा; भक्तियुक्त हृदयकमल में जो इन श्लोकों की जपमाल करेगा और नित्य नियमपूर्वक प्रातःकाल जिह्वाग्र पर
रखेगा, जो प्राण रहने तक इस नियम को भंग नहीं करेगा, वह उत्तमत्व प्राप्त करेगा। कृष्ण की इस उपाधि का
गायन करने से चारों मुक्तियाँ चरण छुएँगी। उनकी भी उपेक्षा कर वह स्वयं कृष्ण उपाधि तक निश्चित रूप से
पहुँचेगा। ये चौदह श्लोक वास्तव में चौदह विद्याओं का जन्मस्थान है। उनका जो प्रातःकाल पठन करेगा, वह
पूर्ण रूप से कृष्ण उपाधि तक पहुँचेगा। ये चौदह श्लोक भुवनों का जीवन है। उनका नियमपूर्वक पठन करने से
कृष्ण की पूर्ण उपाधि अवश्य प्राप्त होगी। ये चौदह श्लोक चौदह पदों का गयावर्जन है। उनका नियमपूर्वक पठन
करने से विष्णुपद पर पिण्डदान करने का फल प्राप्त होता है। (जीव को शिवपद का समाधान प्राप्त होता है) ये
चौदह श्लोक चौदह इन्द्रों के जीवों का जीवन है। उनका नियम से पठन करने से हम इन्द्रों के भी इन्द्र बन जाते
हैं। ये चौदह श्लोक वास्तव में चौदह काण्डों का पूर्ण वेद ही है। उसका नियमपूर्वक पठन करने से वेद पठन का
समाधान प्राप्त होता है। इनका नियमपूर्वक पाठ करने से संसार के गुण, कर्म, वर्ण आदि का निराकरण होकर
पूर्ण ब्रह्म प्राप्त होता है। प्रातःकाल इसका नियमपूर्वक पठन करने से परिपूर्ण ब्रह्म प्राप्त होगा और जो इसका
त्रिकाल पाठ करेगा वह तो अपने ही देह से कृष्णस्वरूप बन जायेगा और जो इसके पठन के अलावा इसके अर्थ
पर विचार करेगा वह स्वयं श्रीकृष्ण ही हो जायेगा। श्रीकृष्ण की उपाधि उसकी दासी बनकर रहेगी। कृष्ण
उपाधि (अर्थात् कृष्ण का निर्वाण वृत्तांत) के श्रवण, पठन और अर्थ से भी साधकों को पूर्ण ब्रह्म प्राप्त होता है,
यही परमार्थ सिद्धि का गूढ़ निरूपण है। इसमें अधिक साधना की भी आवश्यकता नहीं है, अनायास ही ब्रह्मज्ञान
की प्राप्ति होती है। श्रद्धा से तथा नियमपूर्वक पठन करने से कृष्ण की पूर्ण उपाधि प्राप्त होती है। तक्षक के भय
से मुक्त होने के लिये तथा देह में रहकर विदेहता प्राप्त करने के लिये यह अत्यन्त सरल उपाय है ऐसा शुक्राचार्य
ने परम कृपा से परीक्षित को बताया। जो नियमपूर्वक इसका पठन करेगा उसे पूर्णब्रह्म की प्राप्ति होगी, ऐसी
शुक्राचार्य की पूर्ण प्रतिज्ञा है। इतना सुलभ उपाय होते हुए जो उस पर श्रद्धा नहीं रखेगा वह अविद्या का घरजमाई
होकर रहेगा और उसका संसार डूब जायेगा। वह अविद्या का गुलाम, विषयों में पला हुआ श्वान सदा अहंकार
के गड्ढे में बैठकर भौंकता रहेगा। उन मूर्खों की बात न करो। इससे मिला हुआ आनन्द कम हो जायेगा। कहने
का तात्पर्य यह है कि इन श्लोकों के पठन से परब्रह्म की भेंट होती है। कृष्ण की इस निजानंद उपाधि का वर्णन
करने में मैं दीन असमर्थ हूँ। लेकिन जनार्दन ने कृपापूर्वक यह निरूपण मुझसे कराया। एका (जनार्दन) की शरण
में है। श्रीकृष्ण उपाधि का निरूपण इस एकादश स्कंध का कलश है। उसे व्यासजी ने पूर्ण कराया। यह निरूपण
समाप्त हुआ यह जनार्दन की पूर्ण कृपा है। इस प्रकार श्रीकृष्ण निजधाम चले गये। वहाँ का वृत्तांत शुक्राचार्य
परीक्षित को बताते हैं।
दारुको द्वारकामेत्य वसुदेवोग्रसेनयोः।
पतित्वा चरणावस्रैर्न्यषिञ्चत् कृष्णविच्युतः ॥ १५ ॥
दारुक ने द्वारका की ओर देखा तो वह प्राणहीन प्रेत की तरह अथवा पदच्युत राजा की तरह कलाहीन
दिखायी देने लगी। रस निचोड़ने के बाद जिस प्रकार ऊख दिखायी देता है; अथवा जिस प्रकार दाना के बिना
भूसा दिखायी देता है, उसी प्रकार कृष्ण के बिना द्वारका भी चारों ओर से उदास दिखायी देने लगी। दारुक

इकतीसवाँ अध्याय ८३७
राजमहल में पहुँचा, उस समय वसुदेव और उग्रसेन को देखते ही उसकी आँखों से आँसू झरने लगे। उसके हृदय
का बाँध टूट गया और उसने चीख कर उनके पैर पकड़ लिये। कृष्ण के वियोग से दारुक के अश्रु संतप्त हो उठे
थे। उन आँसुओं से वसुदेव के पैर भी जलने लगे। वह पेट-फाड़ कर रोने लगा। उस दुःख से उसका हृदय
फटना चाहता था। उसकी जिह्वा सूखने लगी थी, गला भर आया था, मुँह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे। दुःख
में व्याकुल दारुक की यह अवस्था देखकर द्वारका के सारे लोगों के तो प्राण ही सूख गये। देवकी और रोहिणी
भी घबरायी हुई वहाँ आयीं और वहाँ का कोलाहल देखकर कृष्ण की स्त्रियाँ भी वहाँ आ पहुँचीं। रनिवास की
सारी स्त्रियाँ और पुरुष दौड़ते हुए वहाँ आ पहुँचे और सभामण्डप में एकत्र हो गये। देखा तो दारुक फूट-फूटकर
रो रहा है। सभी का हृदय बैठ गया। फूट-फूट कर रोने से उसकी साँस रूक जा रही थी। कृष्ण के वियोग की
वार्ता बताते हुए वह बेहोश होकर गिर पड़ा। तब वसुदेव और उग्रसेन ने उसके पास जाकर उसे सांत्वना दी और
क्या हुआ है इसके बारे में उत्कंठा व्यक्त की। तब दारुक बताने लगा।
कथयामास निधनं वृष्णीनां कृत्स्नशो नृप।
तच्छ्रुत्वोद्विग्नहृदया जनाः शोकविमूर्च्छिताः ॥ १६॥
दारुक ने कहा, पहले आप सब लोग अर्जुन को लेकर भागिये। यहाँ एक भी क्षण के लिये न रुकिये। सारे
यादव मर गये हैं। यादवों ने प्रभास क्षेत्र में जाकर यथाविधि तीर्थविधि किया। ब्राह्मणों को दान दिया। भोजन
कराया और फिर मद्यपान प्रारम्भ किया। मद्य से उन्माद उत्पन्न हुआ और यादवों के मित्र, भाई आदि में परस्पर
युद्ध होकर सारे कुल का अन्त हो गया। यादव किसी भी शस्त्र से न मरते लेकिन वहाँ एक अपूर्व चमत्कार हुआ
और वह यह कि वे सब एरिका से मारे गये। बलराम ने देह त्याग किया; श्रीकृष्ण निजधाम गये, और आप सब
एक क्षण के लिये भी द्वारका में न रहें यह कहने के लिये मुझे यहाँ भेजा है। श्रीकृष्ण ने द्वारका छोड़ी अब समुद्र
उसे तत्काल डुबो देगा। इसलिये कृष्ण ने ही आपको यहाँ से तुरन्त जाने के लिये कहा है। दारुक का यह भाषण
सुनते ही द्वारका में हाहाकार मच गया। उग्रसेन सिर पीटने लगा और वसुदेव भी सिर पीटने लगा। कोई हाथ पर
हाथ रगड़ने लगा, कोई छटपटाने लगा, कोई चीख-चीख कर रोने लगा तो कोई बेहोश होकर जमीन पर गिर
पड़ा। रोते-रोते किसी का गला सूखने लगा, कोई फूट-फूटकर रोने लगा; किसी का कलेजा फटने-फटने को हो
आया, सभी का दुःख चरमसीमा पर पहुँच गया। कोई जोर-जोर से रो रहा था, कोई छाती पीट रहा था, कोई
कान और बाल खींच रहा था तो कोई दुःख में पागल हो गया था। कोई जोर से चिल्लाने लगा, तो कोई मुँह के
बल गिरने लगा, कोई मछली की तरह तड़पने लगा। नर नारी हो हल्ला करने लगे, घर-घर शंख ध्वनि होने
लगी, सबका दुःख एक जैसा था, फिर कौन किसे सांत्वना देता? देवकी और रोहिणी बेहोश होकर जमीन पर
गिर पड़ीं। फिर उठकर जोर-जोर से विलाप करने लगीं। देवकी कहने लगी, हे कृष्ण! हमारे विश्रामदाता! हे
कान्हा! क्यों रूठे हो? तुम्हारे पैरों पर गिरती हूँ। तुम मेरे सहकारी हो, यहाँ मुझे अँधेरे में छोड़कर तुम कहाँ चले
गये? कंस और केशी को जीत कर हमें कारावास से बाहर निकाला और अन्त में मुझे यहाँ छोड़कर मेरे साथ
ठगी की? मृत पुत्रों को भी तुम वापस ले आये और मुझे सुखी किया और अन्त में मुझे यहाँ छोड़ दिया? तुम
इतने निष्ठुर कैसे हो गये? मेरे पुत्र कृष्णराया! कान्हा! शीघ्र आओ। क्या मैंने तुम्हें दूध नहीं पिलाया इसलिये
रूठ गये हो? तुमने जिसका स्तनपान किया, वह यशोदा ही दीन हो गयी है। तुम्हारा मुख देखे बिना उसके प्राण
भी कैसे बचेंगे? कृष्ण! आओ बेटा! दौड़कर आओ। चारों हाथों से मुझे आलिंगन दो। अरे! मैं तुम्हारे मुख का

८३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
चुम्बन लूँगी। तुम्हारे बिना मैं अत्यन्त दीन हो गयी हूँ। हे मेरे श्यामसुन्दर ! हे सुकुमार ! हे कमलाक्ष ! हे चतुर्भुज !
हे शारंगधर ! हे उदार श्रीकृष्ण ! मैं क्या करूँ ? कृष्णा, तुम्हारे बिना मैं अन्धी हो गयी हूँ! हे वनमाली ! मेरी उँगली
पकड़ने दौड़ते हुए आओ। मुझ अन्धी की वह लाठी था। उसे बैकुण्ठ में कौन छोड़ आया ? अब मैं अपना रास्ता
कैसे पार करूँ ? हे जगजेठी कृष्ण ! पुत्र, नाती, पौत्र आदि पूरे वंश की ही होली जल गयी ? यादवों के कुल में
कोई नहीं बचा ? कहते हुए वे वक्ष पीटने लगी। देवकी का रुदन सुनकर वसुदेव, उग्रसेन आदि सारे लोग रोते-
चिल्लाते प्रभास की ओर चल पड़े।
तत्र स्म त्वरिता जग्मुः कृष्णविश्लेषविह्वलाः ।
व्यसवः शेरते यत्र ज्ञातयो घ्नन्त आननम् ॥ १७॥
स्त्रियाँ, पुरुष, सुहृदजन आदि सभी एकत्र होकर रोते-चिल्लाते प्रभास की ओर चल पड़े। उनके चीख,
कोलाहल से वातावरण गूँज उठा। स्त्रियों ने तो आकाश-पाताल एक कर दिया। कृष्ण के वियोग में विह्वल सभी
लोग चल पड़े। यादव रण में जहाँ निर्जीव पड़े थे, वहाँ सभी लोग रोते-चिल्लाते जा पहुँचे।
देवकी रोहिणी चैव वसुदेवस्तथा सुतौ ।
कृष्णरामावपश्यन्तः शोकार्ता विजहुः स्मृतिम् ॥ १८॥
प्राणांश्च विजहुस्तत्र भगवद्विरहातुराः ।
उपगुह्यपतींस्तात चितामारुरुहुः स्त्रियः ॥ १९॥
देवकी और रोहिणी, वसुदेव और उग्रसेन ये दोनों, समरांगण में जहाँ यादव मृत पड़े थे वह स्थल देखने
पहुँचे। देखा तो वहाँ यादव वीरों की पंक्तियाँ महानिद्रा ले रही थीं। किन्तु उनमें बलराम और कृष्ण ये उनके पुत्र
नहीं दिखायी दिये। तब कृष्ण के विरह में शोकाकुल होकर उनका दुःख का आवेग नहीं थम पा रहा था। चारों
वहीं दहाड़ मारकर मूर्च्छित होकर गिर पड़े। निवर्तमान राम-कृष्ण का मुख भी हमें नहीं दिखायी दे रहा, इससे
उनके दुःख की पराकाष्ठा हो गयी और इसमें उनके प्राण भी निकल गये। सारे यादवों की पत्नियाँ अपने-अपने
पति का प्रेत लेकर सती होने के लिये चिता पर चढ़ गयीं। यादवों की स्त्रियाँ असंख्य थीं। उसमें कौन किस तरह
सती चली गयीं, उस अग्नि प्रवेश का शुक्राचार्य वर्णन करते हैं।
रामपत्न्यश्च तद्देहमुपगुह्याग्निमाविशन् ।
वसुदेवपत्न्यस्तद्गात्रं प्रद्युम्नादीन् हरेःस्नुषाः ।
कृष्णपत्न्योऽविशन्नग्निं रुक्मिण्याद्यास्तदात्मिकाः ॥ २०॥
रेवतीप्रमुख बलराम की स्त्रियों ने अपने पति का मन में ध्यान कर अग्नि में प्रवेश किया। देवकी और
रोहिणी तो वहाँ पहले से ही मृत पड़ी थीं। वसुदेव की जो शेष स्त्रियाँ थीं, उन्होंने भी अपने पति का देह ले कर
सहगमन किया। प्रद्युम्न के साथ महासाध्वी रती ने सहगमन किया और सांवा के साथ दुर्योधन की कन्या रूपवती
ने सहगमन किया। उसी प्रकार अनिरुद्ध के साथ रोचना और उरवा ने अग्निप्रवेश किया। इस प्रकार कृष्ण की
सभी बहुओं और यादवों की नायिकाओं ने अग्नि में प्रवेश किया। लेकिन श्रीकृष्ण की स्त्रियों ने जो अग्नि प्रवेश
किया, उसकी कृति अलौकिक थी। उन स्त्रियों में सभी सतियों में शिरोमणि जगन्माता रुक्मिणी प्रमुख थी। कृष्ण
का निर्वाण सुनने के बाद वह तत्क्षण तद्रूप हो गयी; ज्वाला जिस प्रकार अग्नि से जाकर मिलती है उसी प्रकार

इकतीसवाँ अध्याय ८३९
वह कृष्णत्व में लीन हो गयी। कृष्ण चला गया यह मालूम होते ही रुक्मिणी तटस्थ हो गयी और देह की खोल
त्याग कर कृष्णस्वरूप में मिलकर तद्रूप हो गयी। उसके देह का दहन करने के लिये देह बचा ही नहीं था। जिस
प्रकार कृष्ण स्वयंभू परिपूर्ण थे। वैसी ही वह भी थी। उन दोनों की गति एक जैसी थी। रुक्मिणी की तरह ही
सात अन्य पटरानियाँ थीं, वे तथा सोलह हजार स्त्रियाँ, इन्होंने भी तादात्म्य भाव से अग्नि में प्रवेश किया।
जिन्होंने कृष्णमुख का सुख भोगा, उनकी इससे कम गति हुई यह कहने में भी पाप लगेगा क्योंकि कृष्ण के
अंगसंग से ही वे ज्ञानस्वरूप हो गयी थीं। वाणी से 'कृष्ण कृष्ण' कहकर स्मरण करने से ही जब कोई पूर्ण
कृष्णस्वरूप हो जाता है तो फिर जिसने कृष्ण के साथ प्रत्यक्ष उपभोग किया, उसकी योग्यता कभी कम नहीं
होगी। जिसे कृष्ण का अंगसंग प्राप्त होगा, उसका वासनात्मक लिंगदेह भंग हो जायगा और अविनाशी की उपाधि
प्राप्त होकर, भोग भोगते हुए भी उसका कृष्ण के साथ तादात्म्य स्थापित रहेगा। जिसके ध्यान में श्रीकृष्ण की
मूर्ति रहती है, उसे चारों मुक्तियाँ वन्दन करती है। फिर जिसने स्वयं ही कृष्ण का उपभोग किया, उन्हें दूसरी गति
कभी नहीं प्राप्त होगी। इहलोक में जिसे कृष्ण का साथ होता है, उन्हें परलोक में दूसरी गति प्राप्त होगी ऐसा
कहने से ज्ञाता लोग रुष्ट हो जायेंगे। अतः उन्हें पूर्णत्व के कारण पूर्णस्वरूप की ही प्राप्ति होगी। जो लड़खड़ाकर
गंगा में गिरता है उसका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है; लेकिन जो विधियुक्त स्नान करता है उसका पाप क्यों नहीं
नष्ट होगा ? उसी प्रकार कृष्ण से व्यभिचार संगति करने से जब असंख्य गोपियों का उद्धार हुआ तो फिर उसकी
शादीशुदा स्त्रियों को दूसरी गति कैसे प्राप्त होगी ? अधिक क्या कहें, कृष्ण के पादस्पर्श से, अंगस्पर्श से जब
गोकुल वृन्दावन के तृण, वल्ली, मृग, पाषाण, गौएँ, गोपियाँ और ग्वाला लोग तर गये तो फिर कृष्ण की स्त्रियों
को अन्य गति कैसे मिलेगी ? इसलिये, किसी भी ढंग से क्यों न हो लेकिन जिसका कृष्ण से संग हुआ उनका हे
परीक्षित, कुरुराज अवश्य उद्धार हुआ।
अर्जुनः प्रेयसः सख्युः कृष्णस्य विरहातुरः।
आत्मानं सान्त्वयामास कृष्णगीतैः सदुक्तिभिः ॥ २१ ॥
जिसका रथ श्रीकृष्ण स्वयं हाँक रहा था, जिसका वह सारथी बना था, ऐसा वह प्रिय सखा अर्जुन तो
कृष्ण के विरह से अत्यन्त उद्विग्न हो गया था। इतने में उसे कृष्ण ने गीता में कही हुई सुदुक्ति का स्मरण हो
आया। फिर उसने अपने मन को किस प्रकार समझाया, जरा सुनिये। कृष्ण मेरे मन का मन है, कृष्ण मेरी बुद्धि
का अधिष्ठान है, कृष्ण प्रकाश से ज्ञान प्रकाशित होता है फिर उसमें और मुझमें भिन्नत्व कहाँ रह गया ?
कृष्णप्रभा से आँखें देखने का काम करती हैं, कृष्ण की अवधान शक्ति से कान सुनने का कार्य करते हैं, कृष्ण
की अनुवाद शक्ति से वाणी बोलती है, ऐसा होते हुए उसमें और मुझमें अन्तर है, यह मानना व्यर्थ है। कृष्ण ही
हृदय में रहने वाला अव्यंग आत्मा है, कृष्ण ही मेरे अंग का अवयव है; ऐसे उस कृष्ण का और मेरा वियोग
हुआ यह मानना भी केवल मिथ्या और मायाजनित है। कृष्ण मेरे जीव का जीवन है, कृष्ण मुझमें अंतर्बाह्य
व्याप्त है, कृष्ण का वियोग मानने वाला मेरा मन भी श्रीकृष्ण में ही लीन हो गया है। भिन्न-भिन्न प्राणियों के
जो आकार हैं, उनमें कृष्ण ऐक्यरूप से विद्यमान है। विषम में भी सम रहने वाला जो श्रीपति है उससे वियोग
कभी नहीं होगा। घर मिट्टी से भिन्न नहीं होता। तंतु का त्याग कर वस्त्र को अलग नहीं किया जा सकता। उसी
प्रकार मैं अर्जुन श्रीकृष्ण से बिलकुल अलग नहीं हूँ। जब मैं श्रीकृष्ण से वियोग की बात करता हूँ, उस समय
भी श्रीकृष्ण वहाँ उपस्थित रहता है। अतः जिसे लोग सच्चा वियोग कहते हैं, वह भ्रम के कारण तथा

८४० श्रीमद् एकनाथी भागवत

मूर्खतावश है। नित्य सर्वगत, परिपूर्ण तथा अखण्ड दण्डायमान श्रीकृष्ण में और मुझमें कोई अन्तर नहीं है। 'न
जायते म्रियते' अर्थात् जो जन्म भी नहीं लेता और मरता भी नहीं, ऐसा अपने सम्बन्ध में श्रीकृष्ण ने स्वयं ही
कहा है। उन श्रीकृष्ण को जन्म और मरण है ऐसा मूर्ख लोग ही स्वीकार करेंगे। 'मैं अक्षर और परब्रह्म' हूँ,
ऐसा स्वयं पुरुषोत्तम ने ही कहा है। क्षर और अक्षर इनसे भी परे रहने वाला 'उत्तम पुरुष' श्रीकृष्ण, उसे भ्रांत
लोग अपने मनोधर्म के अनुसार जन्म-मरण के फेरे हैं ऐसी कल्पना करते हैं। उस कृष्ण में और मुझमें कल्पांत
में भी भिन्नता नहीं है। इस प्रकार गीतार्थ का स्मरण करते ही उसे अपने पूर्णत्व की प्रतीति होती है। मैं अजन्मा,
आद्य, अचल, नित्य, निर्मल तथा आत्मस्वरूप हूँ। मेरे स्वरूप में कभी कोई परिवर्तन नहीं है। त्रैलोक्य मेरा ही
खेल है। संसार को नियमों का बोध कराने वाला वेद मेरे ही श्वासोच्छ्वास से निकला हुआ बोध है। आनन्द
का परमानन्द और स्वानंद का कंद मैं स्वयं हूँ। उदक के रूप में मैं ही हूँ तथा प्रकृति पुरुषों का जनक हूँ। मेरे
ही स्वरूप के आधार पर मैं ही कृष्ण रूप में अवतार लेकर, अपनी ही लीला से नाना प्रकार के चरित्रों का
आचरण कर अन्त में स्वस्वरूप में समाविष्ट हो गया। मेरे निजस्वरूप के ही बल पर मैंने कृष्णरूप से क्रीड़ा
की और अन्त में अपने में ही आपनिष्ठा से एकरूप होकर स्वयं में ही मिल गया। एक नर और एक नारायण,
वे परस्पर अभिन्न ही थे इसीलिये अर्जुन अपने को पूर्ण स्वरूप में देखने लगा। वह कृपासागर कितना कृपालु
है। युद्ध के समय उसने अर्जुन को उपदेश किया; लेकिन उस समय उसकी जो समाधि लगी, वह सचमुच
कल्पांत में नहीं टूट पाएगी। वास्तव में देखा जाय तो वह स्थान भी बहुत पवित्र था एकांत में नहीं था। वहाँ
असंख्य रथों की घड़घड़ाहट चल रही थी और शस्त्रों की खनखनाहट हो रही थी। किन्तु वैसे स्थान पर भी
निर्दोष परमानिष्ठा मन पर अंकित कर दी। समाधि भी ऐसी लगी कि महायुद्ध में भी नहीं टूटी। अन्त में वह
बोध कृष्ण के निर्वाण प्रसंग में पूर्णरूप से प्रकट हुआ। जिसे श्रीकृष्ण ने स्वयं गीता का उपदेश किया, वह उस
पर प्रभावकारी नहीं हुआ यह कहने से वाणी को दोष लगेगा। वह वाणी गलित कुष्ठ से झड़ जायेगी, उसमें
विकल्प के कीड़े लगेंगे। कृष्णोक्ति से बोध नहीं हुआ यह कहने वाली जीभ ही झड़ कर गिर जायेगी। गीता के
उपदेश से पूर्णत्व नहीं आता, यह कहते समय वाणी की देवता सरस्वती थर-थर काँपने लगेगी। फिर दूसरों की
क्या कथा कहें? जो गीता सुनता है, देखता है और पठन करता है, जिसे गीता का केवल स्मरण होता है उसे
भी पूर्णत्व प्राप्त होता है; फिर जिसे प्रत्यक्ष उपदेश हुआ था, उसे पूर्णत्व क्यों नहीं आयेगा? गीतार्थ का पूर्णत्व
या तो उसका वक्ता श्रीकृष्ण जानता है या फिर उसका श्रोता अर्जुन जानता है क्योंकि उसका रहस्य उसके ही
अंतःकरण में अंकित था। वेदार्थ का सारांश निकालकर श्रीकृष्ण ने गीता प्रकट की। उसका रहस्य जानने पर
मोक्ष अनायास ही प्राप्त होता है। वेदान्त परदेशी हो गया था। उसे गीतार्थ ने आश्रय प्रदान किया। उसी के बल
पर वह सबका मन जीत कर समर्थ हो गया। वेदों का जन्म कृष्ण के श्वासोश्वास से हुआ; लेकिन गीता प्रत्यक्ष
उसके मुख से प्रकट हुई। इसीलिये गीता का अर्थ अगाध है। उसके ही योग से वेद सशक्त हुए। वेद ने
ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य इन तीन वर्णों को अपनाया था और शूद्र तथा स्त्रियों को दूर ढकेल दिया था। उनके कानों
को भी वह स्पर्श नहीं करता था। यह वेद में कमी थी। वेद की यह न्यूनता दूर करने के लिये श्रीकृष्ण ने गीता
का आविर्भाव किया। गीता के श्रवण से और पठन से सभी का उद्धार होता है। अर्जुन से प्रेम के कारण
श्रीकृष्ण ने गीतार्थ प्रकट किया। उस गीता के श्रवण से और पठन से जड़-जीवों का उद्धार होता है। सारांश,
गीता की महिमा महान है। उस गीतार्थ से ही अर्जुन ने अपनी सांत्वना कर ली और पहले की तरह देहभाव
स्थिर कर स्वस्थचित्त हो गया।

इकतीसवाँ अध्याय ८४१
बन्धूनां नष्टगोत्राणामर्जुनः साम्परायिकम्।
हतानां कारयामास यथावदनुपूर्वशः ॥ २२॥
सभी यादव अपने कुल के साथ मर गये। उनकी उत्तर क्रिया करने के लिये भी कोई गोत्रज शेष नहीं
बचा। वज्र नाम का अनिरुद्ध का पुत्र* द्वारका में रहता था इसलिये वह सारा उत्तर कार्य अर्जुन को करना पड़ा।
मैं अब निष्कर्म ब्रह्मस्वरूप हो गया हूँ, अतः मैं यह अंत्यकर्म नहीं करूँगा ऐसी ज्ञानगर्व की अकड़ अर्जुन में नहीं
थी। 'कर्मण्यकर्म यः पश्येत्' अर्थात् कर्म में जो अकर्म देखता है वह बुद्धिमान और योगी है (गीता अ ४/१८)
यह गीता का गूढ़ रहस्य अर्जुन के अंतःकरण में अंकित था। इसलिये उसने उन सबका अंत्यकर्म शान्त मन से
किया। पहले वरिष्ठों का दहन किया, फिर कनिष्ठों का किया। उसी क्रम में सबका पिण्डदान कर सबका तिल
तर्पण भी किया। इस पर सारी उत्तर क्रिया करके अर्जुन द्वारका लौटा। तो वहाँ दूसरा ही अरिष्ट सामने खड़ा था।
समुद्र अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा था।
द्वारकां हरिणा त्यक्तां समुद्रोऽप्लावयत् क्षणात्।
वर्जयित्वा महाराज श्रीमद्भगवदालयम् ॥ २३ ॥
नित्यं संनिहितस्तत्र भगवान् मधुसूदनः।
स्मृत्याशेषाशुभहरं सर्वमङ्गलमङ्गलम् ॥ २४॥
कृष्ण के द्वारका छोड़कर जाते ही समुद्र ने क्षणभर का भी विलम्ब न कर द्वारका क्षणभर में डुबो दी। तब
सभी लोग हाहाकार करते हुए भागने लगे। समुद्र ने पूरी द्वारका डुबोयी लेकिन भगवान का स्थान छोड़ दिया
क्योंकि पाताल से वह कुशनिर्दलन करने आया था। भगवान का स्थान समुद्र ने नहीं डुबोया क्योंकि वहाँ श्रीकृष्ण
का संनिधान नित्य नूतन स्फूर्ति का स्रोत रहता है। जिसका स्मरण करते ही महापातकों का नाश होता है और जो
सर्वमंगल का अधिष्ठान है, वह श्रीहरि का स्थान बना हुआ है। उस द्वारका में अभी भी श्रीकृष्ण की पूजा होती
है। हे महाराज परीक्षित! वह अधोक्षज का जागृत स्थल है।
स्त्रीबालवृद्धानादाय हतशेषान् धनंजयः।
इन्द्रप्रस्थं समावेश्य वज्रं तत्राभ्यषेचयत् ॥ २५॥
इस प्रकार द्वारका के डूबने के बाद शेष बचे छोटे-छोटे बालक, वृद्ध, स्त्री, पुरुष तथा स्त्रियों को साथ
लेकर अर्जुन इन्द्रप्रस्थ जाने के लिये तैयार हुआ। जो यादव प्रभास तक गये थे वे सभी मर गये। वज्रादिक जो
शेष बचे थे उनको लेकर अर्जुन निकल पड़ा। इस प्रकार उन सबको लेकर अर्जुन इन्द्रप्रस्थ आया और
यादववंश के राजकर्ता के रूप में उसने वज्र का राज्याभिषेक किया। अनिरुद्ध का पुत्र वज्र यही यादववंश के
राज्य का उत्तराधिकारी था, इसलिये उसका राज्याभिषेक कर वीर अर्जुन तत्काल धर्मराज के पास जाने के
तैयार हुआ।
श्रुत्वा सुहृद्वधं राजन्नर्जुनात्ते पितामहाः।
त्वां तु वंशधरं कृत्वा जग्मुः सर्वे महापथम् ॥ २६ ॥
अर्जुन ने श्रीकृष्ण के निजधाम जाने का समाचार युधिष्ठिर को सुनाया। फिर परीक्षित, तुम्हें राजपाट देकर

  • अनिरुद्ध को रुक्मिणी की नतिनी से हुआ पुत्र; यादवी के बाद अर्जुन उसे इन्द्रप्रस्थ ले गये और उसे राजगद्दी पर बिठाया।

८४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वे तत्काल निर्वाण के पथ पर चल पड़े। श्रीकृष्ण निजधाम गये यह सुनते ही कुंती ने वहीं प्राण त्याग दिये और
द्रौपदी सहित पाँचों पाण्डव महापंथ पर चल पड़े।
य एतद् देवदेवस्य विष्णोः कर्माणि जन्म च।
कीर्तयेच्छ्रद्धया मर्त्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २७॥
ऐसा वह देवाधिदेव सर्वेश्वर, उसके मत्स्यकूर्मादि अवतार और जन्मकर्मादि नाना चरित्रों का जो गायन
करते हैं, वे अत्यन्त पवित्र और पुण्यराशि हैं। उस चरित्र का श्रद्धापूर्वक गायन करने से प्रयागादि सारे तीर्थों को
उसके योग से पवित्रता प्राप्त होगी। हे परीक्षित्! श्रद्धायुक्त हरिकीर्तन करने से, उससे अधिक पवित्र कुछ है ही
नहीं। वह श्रद्धा कैसी होती है, यह पूछो तो जिस प्रकार धन का लोभी धन के पास चिपक कर बैठता है, अथवा
चींटा को जिस प्रकार गुड़ से प्रेम होता है, वैसा ही प्रेम कीर्तन में होना चाहिये। अनेक दिन कष्ट करने के बाद
बाँझ स्त्री को जब बच्चा पैदा होता है तो उसे जिस प्रकार उसके प्रति अत्यन्त ममत्त्व होता है, उसी प्रकार कीर्तन
के प्रति प्रेम होना चाहिये। हे परीक्षित्! हरिकीर्तन के वैभव से बेहोश होकर श्रीहरि का चरित्र भक्तिभाव से गाने
के लिये जो पतंग की तरह दौड़कर आता है उसका नाम 'श्रद्धा' है। ऐसी श्रद्धासम्पत्ति से युक्त होकर भगवान की
गुणानुवाद कीर्ति का वर्णन करने पर, हे राजश्रेष्ठ! उस श्रद्धावान को 'परमप्राप्ति' होती है, यह निश्चित रूप से
जान लो। परमेश्वर ने यद्यपि अपनी लीला से नाना प्रकार के अवतार लिये हैं, फिर भी उनमें श्रीराम और
श्रीकृष्ण इनके चरित्र अत्यन्त गम्भीर और पवित्र हैं। कृष्ण की चोटी का गीतों में वर्णन करने से सुवर्णचोरी का
पाप धुल जाता है। कृष्ण के व्यभिचार का वर्णन करने से गुरुपत्नीगमन का पाप भी नष्ट हो जाता है। पूतना के
दुग्धप्राशन का चरित्र पढ़ने से, श्रद्धालु पुरुष के सुरापानादि दोष दूर हो जाते हैं। रावण राक्षस कुल का था किन्तु
वह शुद्ध ब्राह्मण जाति का था। वह नित्य वेदपाठ करता था क्योंकि वह ब्रह्मदेव का पोता है। श्रीराम ने उसके पूरे
कुल का नाश किया। उस चरित्र का पठन करने से ब्रह्म हत्या का लय होता है। श्रीकृष्ण धर्म का सहायक था।
इसलिये उसने पाण्डवों का संरक्षण किया। उस महाभारत के श्रवण से मृत ब्राह्मण जीवित हो उठे। जनमेजय ने
अठारह ब्रह्महत्याएँ की थीं। उसे महाभारत के अठारह पर्व सुनाकर मृत अठारह ब्राह्मणों को जीवित किया। कृष्ण
की यह कीर्ति अत्यन्त पावन है। श्रीराम और श्रीकृष्ण की कीर्ति सुनने पर बेचारे महापातक हैं ही कितने?
श्रद्धापूर्वक कीर्ति का गायन करने से चारों मुक्तियाँ चरण स्पर्श करती हैं। श्रद्धा के वैभव से तथा प्यार से श्रीकृष्ण
के चरित्र का गायन करने से देह को होते हुए ही वे सायुज्य स्थिति तक पहुँचते हैं। जिसके हृदय में और मुख में
हरिकीर्तन रहता है वह भले ही देह में विचरण करता दिखायी देता हो लेकिन वह देह में नहीं बल्कि हरि के
पास रहता है और हरि भी पूर्ण रूप से उसके हृदय में रहता है। वह भी हरि में ही रहता है और हरि भी उसमें
अन्तर्बाह्य रहता है। हे परीक्षित्! इस प्रकार 'कीर्तिवंत' अर्थात् कीर्ति गाने वाले संसार में विचरण कर रहे हैं।
अतः इस मृत्युलोक में हरिकीर्तन से अधिक सरल कोई अन्य साधन नहीं है। जो हरिकीर्तन में रममाण होते हैं वे
देहबंधन का स्पर्श भी नहीं करते। कृष्ण के कीर्तन से अंतःकरण एक बार शुद्ध और स्वच्छ होने पर वह कल्पांत
में भी मलिन नहीं होता। देह अवश्य कर्म करता है लेकिन उससे अंतर की स्थिति मलिन नहीं होती। आकाश
बारिश से नहीं भींगता; अथवा कुण्ड के जल का सूर्य का प्रतिबिम्ब उससे गीला नहीं होता। उसी प्रकार
हरिकीर्ति-कीर्तन के घोष से जिसकी निष्कामदशा उज्ज्वल होती है, वे देहकर्म में विचरण करते हुए भी देह की
मलिनता से अलिप्त रहते हैं। अपने भक्तों का शरीर कर्म पुरुषोत्तम स्वयं चलाता है, इसलिये भक्तों को अच्छे-बुरे
कर्मों की बाधा नहीं होती। वास्तव में भक्तों के और अभक्तों के कर्म भगवान ही करता है; फिर भक्तों की ही

स्थिति अलिप्त क्यों रहती है? और अभक्त ही अत्यन्त बद्ध क्यों होते हैं? तो कृष्णकीर्ति का कीर्तन करने में
भक्तों का देहाभिमान नष्ट होता है, इसलिये वे अलिप्त रहते हैं और अभक्तों को अहंभाव होने के कारण बन्धन
प्राप्त होता है। हे परीक्षित! यह स्थिति माँगने से नहीं मिलती। बिलकुल इच्छापूर्वक श्रीकृष्ण कीर्ति गाने से अपने
आप ही अंकित हो जाती है। श्रीकृष्ण कीर्ति के कीर्तन से और पठन से सन्तुष्ट होकर श्रीकृष्ण ने अनेक लोगों
का संसार धारण छुड़ा दिया है। कृष्ण कीर्ति के कीर्तन में रुचि अहंकार का कारावास तोड़ देती है और असीम
रुचि से कीर्ति गाने से जीव का जीवन बंध टूट जाता है। इस प्रकार कृष्ण की कीर्ति का कीर्तन कर भक्तों को
'कृष्ण की उपाधि' प्राप्त कर लेनी चाहिये। संसार का उद्धार करने के लिये ही श्रीकृष्ण ने अपनी कीर्ति का
प्रसार किया है। ऐसा यह परमामृत का सार श्रीकृष्ण का चरित्र जन्म से अन्त तक परम अद्भुत है।
इत्थं हरेर्भगवतो रुचिरावतारवीर्याणि बालचरितानि च शान्तमानि।
अन्यत्र चेह च श्रुतानि गृणन् मनुष्यो भक्तिं परां परमहंसगतौ लभेत ॥ २८ ॥
ज्ञानधन श्रीकृष्ण का चरित्र जन्म से ही पावन है। जिसके संग से ग्वालों जैसे अज्ञानी जनों का उद्धार हुआ,
जिसके साथ व्यभिचार करने से कितनी ही गोपियों का उद्धार हुआ; क्योंकि उन्होंने कृष्ण की श्यामसुन्दर मूर्ति
देखकर मन में दृढ़ अभिलाषा रखी थी। कृष्ण की सुन्दर मूर्ति देखकर गौएँ भी सम्मोहित हो जाती थीं और
तटस्थ खड़ी रहती थीं। इस प्रकार कृष्ण की संगति से पशुओं का भी उद्धार हो गया। फिर गोपियों का उद्धार
क्यों नहीं होगा? वृन्दावन के तृण तथा पाषाण का (तृणजीव और पाषाण रूप के जीव) भी कृष्ण की संगति से
उद्धार हुआ, ऐसा वह श्रीकृष्ण ज्ञान का साक्षात पुतला था। स्तन में विष भर कर पूतना कृष्ण का प्राण हरने
आयी, उसका भी कृष्ण की संगति से उद्धार हो गया। कंस-शिशुपाल आदि का कृष्ण ने द्वेष के ही कारण उद्धार
किया। अंग में चन्दन लगाया इसलिये कुब्जा को तारा मद से उन्मत्त मूढ़ कवलयापीड हाथी मारने के लिये
आया, उसने कृष्ण को जोर से चोट पहुँचायी इसलिये उसे मोक्ष सुलभ कर उसका उद्धार किया। श्रीकृष्ण पर
अरिष्ट लादने के लिये अरिष्टासुर आया था, उसे सींग से पकड़ कर तारा। अघासुर ने श्रीकृष्ण को निगल लिया
था, उसे तत्काल चीर कर उसके दो फाँक कर उसका उद्धार किया। कृष्ण की प्रतीक्षा करते हुए बकासुर यमुना
के जल में ध्यानस्थ बैठा था, उसने कृष्ण को तत्काल निगल लिया। तब उसके दो फाँक कर उसका उद्धार
किया। तृणावर्त कृष्ण को उड़ाने आया था, उसे लट्टू की तरह घुमाकर मारा। ऐसा कृष्ण बैरी को भी अंगसंग से
कृपालु होकर तारता है। गोपालों को चोर चुरा कर ले गये, उस ठग व्योमासुर को मार कर उसका भी उद्धार
किया। श्रीकृष्ण मोक्ष दिलाने में उदार हैं। उसने कंस का केशी नामक घोड़ा मारकर उसे तारा। अखाड़े में मल्लों
का संहार कर मोक्ष की खैरात कर दी। विषैले कालिया सर्प को समाप्त कर दिया। वत्सासुर को वृक्ष पर फेंक
कर मारा। ऐसा श्रीकृष्ण संसार समुद्र की नौका है। वह स्वसंगति से जड़मूढ़ जीवों का उद्धार करता है। जिन्होंने
कृष्ण के साथ खेल खेले थे, जिनके घर का वह पानी पिया था, जिनके घर का मक्खन चुरा कर खाया था, उन
ग्वालिनों का भी उसने उद्धार किया। रुक्मिया की दुर्गत कर उसे तारा, बाणासुर की भुजाएँ तोड़कर उसे तारा।
कुशराक्षस का प्राण लेकर उसे तारा। इस प्रकार श्रीकृष्ण मोक्षदाता है। जिन्होंने श्रीकृष्ण से संबंध किया अथवा
जो मौज में उसे देखने आये उन्हें उसने दर्शन सुख से तृप्त कर लिया। पाण्डवों का पक्ष लेकर उन्हें तारा, बैरियों
को शस्त्राघात से तारा। इस प्रकार कृष्ण ने अपनी संगति से अनेक लोगों का उद्धार किया। वैरियों को द्वेषभाव से
ही तारा; भक्त भक्तिभाव से उसके पास पहुँचे और जीव भाव से अनुसरण करने वाली गोपियों को प्रत्यक्ष संगति
का अनुभव देकर उनका उद्धार किया। संरक्षण कर गौओं को तारा; मुकुट पर मोरपंख लगाकर मयूरों का उद्धार

८४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किया। केशों में फूलों के गुच्छे खोंस कर वृक्षों का उद्धार किया। ऐसा कृष्ण पूर्णब्रह्म होने के कारण सभी दृष्टियों
से तारक ही है। कृष्णावतार पूर्ण ब्रह्म था। उसका लीलाचरित्र ज्ञानप्रधान था। उसमें भी उसका बालचरित्र परम
पावन है। वह सर्वत्र ज्ञानियों के लिये वन्दनीय है। षड्गुणों का वैभव लेकर श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था। यश,
श्री, औदार्य, कीर्ति, ज्ञान और वैराग्य की स्थिति उसके पास अक्षय थी। अन्य अवतारों में ये गुण पूर्ण रूप में नहीं
थे। किन्तु कृष्णावतार परिपूर्ण ब्रह्म होने के कारण ये सारे गुण उसमें पूर्णरूप से प्रकट हुए थे। इसलिये
कृष्णावतार छहों गुणों से सम्पन्न था। इसलिये उसकी संगति से सभी का सदासर्वदा उद्धार हुआ। कृष्ण की संगति
से उद्धार हुआ हो, या कृष्ण की मूरत देखकर लोग तर गये हों इनमें कोई आश्चर्य नहीं है। लेकिन इस
कृष्णकीर्ति का ही गायन कर कितनों का उद्धार हो गया उनकी कोई गिनती नहीं है। अभी भी श्रद्धालु लोगों का
उद्धार हो ही रहा है। इच्छापूर्वक कृष्ण कीर्ति का गायन करने से सद्गति का लाभ होता है; और जिसे परा कहते
हैं, वह चौथी भक्ति घर चल कर आती है। आर्त, जिज्ञासु तथा अर्थार्थी इनकी स्थिति तो सहज रहती ही है,
लेकिन श्रीकृष्ण कीर्ति का स्वयं गायन करने से अखण्ड चौथी भक्ति प्रकट होती है, विषयों के प्रति अपने आप
ही विरक्ति उत्पन्न होती है और शमदम भी सहज ही चरण चूमते हैं। कृष्ण कीर्ति का जो निरन्तर जप करता है,
उसके पास श्रीकृष्ण सदा निवास करते हैं। श्रीकृष्ण की कीर्ति का भक्तिभाव से जप करने से समस्त प्राणिमात्र में
श्रीकृष्ण प्रकट होता है और परमात्म स्थिति के साथ चौथी भक्ति अपने आप हृदय में स्थापित हो जाती है। उस
भक्ति में पूज्य और पूज्यक दोनों श्रीकृष्ण ही रहते हैं। अर्थात् पूजा, अर्चना आदि सारे उपचार भगवान् स्वयं ही
हो जाता है। इत्र, गंध (पुष्प), धूप, दीप आदि सब कुछ श्रीकृष्ण स्वयं ही बन जाता है। स्वयं ही स्वयं को
भजना यही चौथी भक्ति का लक्षण है। चौथी भक्ति का स्वरूप यही है कि भोग्य और भोक्ता श्रीकृष्ण स्वयं ही
होने के कारण भक्त और श्रीकृष्ण में क्षणार्ध के लिये भी अलगाव नहीं होता। उस समय भक्त का देह, घर, द्वार
सब कुछ श्रीकृष्ण ही बन जाता है। जिस स्वरूप में कभी च्युति नहीं है, वह निश्चित रूप से कृष्ण स्वरूप ही
है। कृष्ण की कीर्ति वर्णन करने से भक्त स्वयं तद्रूप होकर रहते हैं। कृष्णकीर्ति का प्रत्येक अक्षर वेदों का
आत्मलिंग है। हे परीक्षित्! कृष्ण चरित्र सभी शास्त्रों का परमसार है। वेदों का जन्मस्थान, सकल शास्त्रों का
समाधान, षड्दर्शनों का ज्ञान अथवा समन्वय यही श्रीकृष्ण का आठवाँ पूर्णावतार है। हरि के ऐसे अनंत अवतार
हुए हैं किन्तु कृष्णावतार यह ज्ञानघन अवतार है। उसका चरित्र अत्यन्त पवित्र तथा भवबंधन नष्ट करने वाला है।
हे नृपनाथ! उस कृष्णकीर्ति का सादर स्मरण करने से संसारबन्धन की सचमुच ही समाप्ति होती है।
श्रीकृष्णकीर्ति के साथ वैभव रहता है, श्रीकृष्ण कीर्ति के पास वैराग्य रहता है; जिनके मन में श्रीकृष्ण की कीर्ति
रहती है वे कलिकाल से भी भयभीत नहीं होते। यदि आलस में भी कृष्णमूर्ति का स्मरण करें तो भी सारे पातक
भस्म हो जाते हैं। कृष्ण की कीर्ति का जो सदासर्वदा गायन करते हैं, उनके पास चारों मुक्तियाँ दासी बनकर रहती
हैं, श्रीकृष्ण कीर्ति का एक अक्षर भी महापातकों की राशि भस्म कर देता है। वह मोक्ष दिलाकर, उदारतापूर्वक
संसार का उद्धार करने वाला है। भगवान ने अनेक अवतार लिये हैं, लेकिन इस अवतार की बात निराली है।
इसकी सारी लीला ज्ञानप्रधान है। इसका रहस्य अगम्य है, वह ब्रह्मादिक देवताओं की भी समझ में आने लायक
नहीं है। जन्म से ही जो कर्म किये, वे सब एक से एक अद्भुत थे। नित्य नया चमत्कार और ब्रह्मसुख का सुकाल
कर दिया। अवतारों में केवल श्रीकृष्ण ही निश्चित पूर्ण ब्रह्मस्वरूप है। उसके ज्ञानधन चरित्र के पठन से लोग
पवित्र होते हैं। इस प्रकार कृष्णकीर्ति पावन है। उसका पठन करने से पाठकों का उद्धार होता है और श्रद्धापूर्वक
श्रवण करने वाले भी संसार सागर तर जाते हैं। कलियुग में लोग मंद बुद्धि होंगे। उसका सुगम रीति से निदान हो

इकतीसवाँ अध्याय
८४५

सके इसलिये कृष्णकीर्तिका विस्तार किया है। ऐसी परमपावन भगवान की कीर्ति का श्रीभागवत में विस्तार से
वर्णन हुआ है। उसमें दशमस्कंध की श्रीकृष्ण की कीर्ति तो अत्यन्त मधुर है। दीनजनों के तरने के लिये श्रीकृष्ण
नित्य नूतन दिन बढ़-चढ़ कर अपनी कीर्ति का प्रसार करते हैं। नट का वेश धारण कर श्रीकृष्ण ने अवतार लिया
था। उसके अनुसार उसने प्रतिदिन नाना प्रकार के चरित्रों का अभिनय किया। उसका बालचरित अत्यन्त मधुर,
सुन्दर और पवित्र है। उसमें अखाड़े में मल्लों का गर्व हरण करने का चरित्र परम पावन है। जरासंध को पराजित
कर, कालयवन का नाश कर श्रीकृष्ण ने अद्भुत चरित्र दिखलाया है। रण में रुक्मिया को दुर्गत कर तथा
शिशुपालादि वीरों का दमन कर कृष्ण ने रुक्मिणी का हरण किया। वह लीला भी परम पावन है। पटरानियों का
विवाह, भौमासुर का संहार, पारिजातक का हरण, सोलह सहस्र स्त्रियों का पाणिग्रहण, समुद्र में द्वारका की बस्ती
बसाकर रातों रात किसी की निद्रा को भंग किये बिना पूरी मथुरा वहाँ ले आये, यह कृष्ण की लीला अघटित ही
हे। बछड़े और गोपाल बनकर उसने अपना पूर्णत्व प्रकट किया, ऐसा कृष्ण पूर्णरूप से अवतारी है, यह
ब्रह्मादिदेवताओं को भी नहीं मालूम हुआ। सब्जी का एक पत्ता खाकर समस्त ऋषि समुदाय का तृप्त किया। ऐसे
ज्ञानप्रधान तथा परमपावन चरित्रों का उसने निर्वाह किया। कृष्ण की ऐसी लीलाएँ अद्भुत हैं। वह पठन करने
वालों को पुनीत करती हैं। वह साद्यंत कथा दशम स्कंध में कही गयी है। एकादश स्कंध उससे अलग है। उसमें
मूल से ही परम पद की प्राप्ति है। ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और मुक्ति इनके बारे में श्रीकृष्ण ने अपने मुख से बताया
है। पहले अध्याय में नारद और वसुदेव का संवाद तथा वैराग्य पूर्णरूप से भरा हुआ है। वही साधकों की
भूमिशुद्धि अर्थात् स्थान का चयन है। उसमें निमिजायंत का सवांद निर्भयस्थान कौन सा है? उत्तम भागवत कौन
है ? माया और उससे तरना, कर्म और ब्रह्म आदि जनक के नौ प्रश्नों के सम्पूर्ण उत्तर, वही जमीन की जुताई है।
प्रश्नोत्तर रूप हल से खेत जोत कर तैयार किया। छठवें अध्याय में देवताओं ने श्रीकृष्ण की प्रार्थना की, उस
समय कृष्ण कुलक्षय के अन्त में निजधाम के लिये प्रयाण करेगा, इस बात को ध्यान में रखकर उद्धव ने जो खेद
प्रकट किया, उसने कल्पनाकाश का निर्दलन कर विकल्प के पत्ते तोड़ दिये। काम और लोभरूपी गुप्त खूँट
भीतर रह गये थे, वे अवरोध उत्पन्न करने लगे। उन्हें तीव्र अनुताप से समूल उखाड़ कर समतल भूमि तैयार की।
क्रोध की मोटी जड़ें थीं उन्हें शान्ति ने समूल उखाड़ दिया। उद्धव स्वरूप चातक का दुःख हरण करने के लिये
श्रीकृष्ण ने कृपारूपी मेघ की जलवृष्टि की। इससे सारा खेत अच्छी तरह गीला हो गया और तत्काल आत्मज्ञान
की वाष्प तैयार हो गयी। फिर पूर्ण ब्रह्मरूपी बीज, व्यर्थ के तन्तु, रस्सी आदि सब छोड़कर केवल कर्णरूपी नली
से श्रीकृष्ण ने स्वयं बोये। इसके उपरान्त यदु अवधूत संवाद के रूप में चौबीस गुरुओं की उपपत्ति सुनायी। यही
उस खेत के चारों ओर खोदा हुआ खंदक है ताकि कोई जानवर खेत में न घुस सके। इसके बाद जब फसल
पकने लगी तब वहाँ फसल का नाश करने वाली चिड़ियों को श्रीकृष्ण ने दसवें अध्याय में भजनरूपी गुलेल से
उड़ा दिया। अर्थात् उन सभी मतों का खण्डन किया। ग्यारहवें अध्याय में मुक्त के हस्त से ज्ञाताओं को तिलगुड़
के साथ ज्वार के भुट्टे, गेहूँ की बालियाँ तथा बजरे का परमल खिलाया। उस वैभव के भोक्ता यहाँ सत्संगति करने
वाले भगद्भक्त हैं, ऐसा बारहवें अध्याय में कृपापूर्वक बतलाया। विषयों की विषयावस्था साधक के चित्त को
बाधक न हो ऐसी कथा तेरहवें अध्याय में सुनायी। इस प्रकार तेरहवें अध्याय में फसल पूरी तरह पक गयी। वही
हंसगीत का निरूपण और समाधि श्रीकृष्ण ने बतायी। उस समाधि में एकत्र फसल साधकों को कैसे प्राप्त हो ?
इसी उद्देश्य से भजनपूर्वक चौदहवाँ अध्याय सुनाया। वह फसल हाथ में आते-आते ऋद्धि-सिद्धि बीच में ही
झपट्टा मार कर ले जाती हैं इसलिये उन्हें टालने का उपाय पन्द्रहवें अध्याय में बताया। वह फसल पूरे त्रिभुवन में

८४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
भी नहीं समा पाती। उसके संग्रह कितने हैं उनके सम्बन्ध में विभूति के रूप में श्रीकृष्ण ने सोलहवें अध्याय में
बताया। इस खेत के अधिकारी यहाँ चार आश्रम और चार वर्ण हैं; अतः सत्रहवें और अठारहवें अध्याय में उनके
विभागों के बारे में बतलाया। उन्नीसवें अध्याय में बताया कि फसल काटकर अनाज प्राप्त करने के लिये जिस
छिलके से अनाज तैयार हुआ है उसे पछोड़ कर अलग करना चाहिये। फिर अनाज के जो दाने अपने हिस्से में
आये हों उन्हें हमें सुरक्षित रखना चाहिये क्योंकि गुणदोषरूपी चोर अनाज चुराकर ले जाते हैं। अनाज सभी को
मिलता है लेकिन चोरों के भय से वे खा नहीं पाते। उन चोरों ने बड़े-बड़े लोगों को हानि पहुँचायी है। इसलिये
उसकी अच्छी तरह सुरक्षा करनी चाहिये। गुणदोषों की बात विचित्र-सी है। वे चोर हमसे मिल-जुल कर, स्नेह
दिखाकर सब कुछ ठग कर ले जाते हैं। एक दाना भी हाथ में नहीं आने देते। गुण-दोष अत्यन्त बलवान हैं,
ज्ञानियों का तो वे निश्चित रूप से छल करते हैं। उन गुणदोषों का जो संहार करता है वही त्रैलोक्य में बलशाली
है। यह उपदेश उद्धव ने सुना तो उसने तत्काल ही कहा, इन चोरों को आश्रय देने वाला तो आपका वेद ही है।
उसी की सहायता से ये गुणदोष बढ़े हैं। तुम्हारा वेद ही खराब है। वही मुख्य चोरों का वाड़ा है। उसी में
गुणदोषों ने आश्रय लिया है। वही हर प्रकार की चिहुल सिखाता है। इस प्रकार गुणदोषों का पालन-पोषण कर
वेद ही सबको लूटता है, ऐसी स्थापना वेद के सम्बन्ध में उद्धव ने की। लेकिन वेद की बात में दुष्टता नहीं है
ऐसा प्रत्येक शब्द में स्पष्ट कर दिया है। वही इक्कीसवाँ अध्याय है। चोर किस मार्ग से आते हैं, किस रास्ते
फसल ले जाते हैं उन रास्तों को ही बन्द करने के लिये तत्व संख्या का विचार बाईसवें अध्याय में बताया।
मुख्यरूप से ज्ञान का संरक्षण करने के लिये दृढ़ शान्ति ही कारण है। उसी भिक्षुगीत का निरूपण श्रीकृष्ण ने
किया। प्रमुख चोर की चुराने की प्रवृत्ति मन में रहती है। इसी मनोजय का लक्षण ही तेईसवें अध्याय का
निरूपण है। चोर जहाँ जन्म लेता है, वह प्रकृति ही झूठी है इसलिये पकी हुई फसल को लूट कर वे
अन्त में उसी में छिप कर बैठ जाते हैं। आदि भी निर्गुण और अहं भी निर्गुण; बीच ही में उत्पन्न प्रकृति के तीन
गुण होते हैं, इसलिये मुख्य फसल को उससे बचाना चाहिये। यही निरूपण चौबीसवें अध्याय में किया गया है।
खेत में फसल पड़ी हो फिर भी पशु, पक्षी अथवा चोर उसमें प्रवेश न कर सकें ऐसी सहज सुरक्षा का उपाय
निर्गुणोक्ति ने पचीसवें अध्याय में बताया। स्त्रीभोग की इच्छा प्रबल होने पर पूरा अनाज नष्ट हो जाता है, जहाँ
राजा पुरूरवा नष्ट हुआ वहाँ औरों की क्या बिसात है? काम की आसक्ति से जो पूर्णरूप से स्त्रियों के मोह जाल
में फँसते हैं उन्हें पश्चात्ताप से छुटकारा मिलता है, इसी का छब्बीसवें अध्याय में निरूपण हुआ है। निरोग फसल
प्राप्त होने पर भी उसकी पाक क्रिया जानना आवश्यक है। इसलिये कर्मयोग का स्वरूप सत्ताईसवें अध्याय में
प्रकट किया गया है। इस प्रकार पूरी फसल हाथ में आने पर भी उसके स्वादिष्ट पकवान की विधि आनी
चाहिये। ऐसे सरस अमृत फलों का वर्णन अट्ठाईसवें अध्याय में किया गया है। वे पकवान इतने मृदु, मधुर और
कुरकुरा होते हैं कि उसके सुवास से ही भोजन करने वाले तृप्त हो जाते हैं और उसका ग्रास मुँह में डालना ही
काफी है, अंतर्बाह्य नित्य तृप्ति ही हाथ लगती है। तब इच्छा के अनुसार भूख शांत होती है, सुख पर भी तृप्ति
सुख का आवरण रहता है अपने माधुर्य के कारण अपूर्व वह अट्ठाईसवाँ अध्याय है। इस अध्याय का माधुर्य इतना
अनूठा है कि उसे चखने के लिये ब्रह्मदेवादि देवता भी छटपटाते रहते हैं। यह भोजन जिसके बिना खाया जाता
है, रसना के बिना उसका माधुर्य चखा जाता है। अदंत के दाँत गिराकर ही स्वयं उसे चखना पड़ता है। श्रीकृष्ण
की कुशलता इसमें है कि उसने उद्धव को थाल बनाया। एकनाथ जनार्दन चरण की मक्खी बनकर उस रस का
आस्वाद ले रही है। जहाँ बड़ों-बड़ों का प्रवेश नहीं हो पाता, वहाँ मक्खी आराम से चली जाती है। सारांश, जो

इकतीसवाँ अध्याय
८४७

सबसे छोटे बन जाते हैं, उन्हें ही भगवद् रस सहज ही चखने को मिलता है। ऐसे अगम्य योग का भण्डार, गूढ़
ज्ञान का गहन ज्ञान, परमसुख का सुखसार, अट्ठाईसवाँ अध्याय है। इस भोजन से जो लोग तृप्त हो गये, वही यह
समर्थ उन्नीसवाँ अध्याय है। उसका निरूपण अत्यन्त अद्भुत है। इस अध्याय का रहस्य यदि मन में बस जाय तो
पूरे भागवत का फल उसके पास दौड़ कर आयेगा। इस अध्याय में साध्य-साधनों की एकात्मता हो गयी है।
इसलिये अहंकार का नाश होकर वह परमानन्द की ढकार दे रहा है। पूरे भोजन की शोभा ताम्बूल और चन्दन है।
वही तीसवाँ और इकतीसवाँ अध्याय है। उसमें कृष्णनिर्वाण का आत्मज्ञान है। इस भोजन से जो तृप्त हो गये उन्हें
ममतापाश कभी बाधक नहीं बनता। इस प्रकार सारे कुल का संहार कर श्रीकृष्ण निजधाम चले गये। जिन्हें पूर्ण
ब्रह्मानुभव प्राप्त हुआ हो, उसमें अब तक ममता नहीं होनी चाहिये; यह प्रतीत कराकर श्रीकृष्ण निजधाम चला
गया। श्रीभागवत एक बड़ा खेत है। इसमें प्रमुख बीज धारण करने वाला है, ब्रह्मदेव ! क्योंकि आदिकल्प में
नारायण से इसे ही पहली बार चतुःश्लोकी भागवत का उपदेश हुआ था। नारद इस खेत का जमींदार है (क्योंकि
उसे ब्रह्मदेव से भागवत का उपदेश प्राप्त हुआ था।) उसने भी अद्भुत ढंग से बीड़ा बोये। उसमें श्री व्यास ने इस
प्रकार के लक्षण जोड़ दिये। इससे फसल बहुत ही अच्छी हुई। उससे स्वानंदबोध परिपक्व हुआ है। शुक वहाँ
रखवालदार बन गये। उन्होंने हरि कथारूपी गोफन फड़का कर पातकरूपी पक्षियों का अस्तित्व ही समाप्त कर
दिया। उद्धव ने एकादश स्कंध में उस फसल की कटाई की और कृष्णोक्ति से पछोड़े हुए स्वच्छ दाने एकत्र
किये। वहाँ नाना प्रकार की युक्ति-प्रयुक्ति से, प्रश्नों की मालिका से स्वादिष्ट पकवान तैयार किये। उनका माधुर्य
नित्य नूतन और अविनाशी है। उसकी वह अविनाशी मिठास एकादश स्कंध में प्रत्यक्ष प्रतीत होती है। इसलिये
उद्धव के ही साथ संसार पर भी उपकार हुआ है। उद्धव की पिछली पंक्ति में श्रवण के संकप लेकर बैठे परीक्षित
शुक के मुख से आत्मज्ञान से तृप्त होकर सन्तुष्ट हुआ। उन्हीं बड़ों की पंक्ति में श्रीधर भावार्थ दीपिका रूप दीपक
हाथ में ले कर पदरूपी पदार्थ दिखाकर आत्मज्ञान से तृप्त हुआ। उसमें देशी भाषा में एकनाथ कृपा की मक्खी
भी भोजन करके तृप्त हुई क्योंकि उसे कहीं भी कोई भी प्रतिबन्ध नहीं है। एकनाथ जनार्दन की दुलारी बिल्ली
है। भावार्थ दीपिका के प्रकाश से उसे यह उत्तम दिखायी पड़ा इसलिये वह थाली में पहुँची। "मियो मियो
कहकर क्या मैं आऊँ यह शब्द सुनते ही सज्जन प्रसन्न हो उठे और उन्होंने कृपाकर शेष प्रसाद देकर मुझे सन्तुष्ट
किया। एका जनार्दन का दास है अतः मैंने नम्रभाव धारण कर बिल्ली का रूप लिया और संतों का उच्छिष्ट
पत्तल चाट कर मैं पूर्णरूप से तृप्त हुआ। जो काया वाचा मन से सद्‌भक्ति से नम्र होता है, नीच के सामने भी नम्र
होता है—वही एकादश स्कंध का अधिकारी है, ऐसा जनार्दन का उपदेश है। जब तक ज्ञान का अभिमान रहता
है, जब तक मान-सम्मान की इच्छा रहती है, तब-तब एकादश स्कंध के ज्ञान से अपरिचय रहेगा ही। पूर्ण
सद्भावना से जब तक समस्त प्राणिमात्र में भगवद्भाव उत्पन्न नहीं हुआ, तब तक एकादश स्कंध का ज्ञान बिलकुल
समझ में नहीं आयेगा। इस प्रकार श्रीभागवतरूपी खेत में परम पवित्र फसल तैयार हुई है। जिन्हें समस्त प्राणिमात्र
के प्रति अपार आदर हो वही साधकजन यहाँ सुखी होंगे। एकादश स्कंध केवल खेत नहीं है, वह तो परिपूर्ण
चित्समुद्र है। इसमें जो जितना डूबेगा उतने ही अधिक चिद्रत्न वह प्राप्त करेगा। यह केवल एकादश स्कंध ही
नहीं, अपितु जीवरूपी गजेन्द्र के उद्धार के लिये हाथ में ज्ञानचन्द्र लेकर वेग से आये श्रीकृष्ण ही हैं। लेकिन इस
उपमा से भी एकादश स्कंध की महानता का वर्णन पर्याप्त नहीं हो पाता; बल्कि यह कहना उपयुक्त होगा कि
अहंकार रूपी हिरण्यकश्यपु का विदारण करने के लिये पूर्ण कृपालु और भक्तों का पक्षधर यह नरहरि ही प्रकट
हुआ है। या ऐसे कहें कि कृष्ण और उद्धव ये गंगा और यमुना हैं और ज्ञानधारा यह गुप्त सरस्वती है। अतः

८४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
एकादश स्कंध को त्रिवेणी संगम का प्रयाग ही समझना चाहिये। यहाँ वैराग्यरूपी माघ मास में, श्रद्धा के
अरुणोदय के समय जो भी नित्य स्नान करेगा, वह पावन होकर पूर्ण कृष्ण-पद को प्राप्त करेगा। लेकिन यह
उपमा भी एकादश स्कंध के लिये उपयुक्त नहीं है। तो कृष्ण उद्धव का यह गुह्य संवाद साधकों के लिये लम्बे
समय बाद आने वाला कपिला षष्ठी का सुन्दर पर्वकाल है। इस पर्वकाल में जो डुबकी लगायेंगे उनका तत्काल
कल्याण होगा। उन्हें जन्म-मरण की बाधा नहीं होगी, वे स्वयं परिपूर्ण ब्रह्म होंगे। यह एकादश स्कंध नहीं,
अपितु एकतीस खण्ड का एक तुलसी वृन्दावन ही है; उसमें ज्ञानमंजरी के गुच्छे शोभा दे रहे हैं। उनमें जो अपना
जीवित जलरूप डालेगा, वे परमपावन होंगे और परिपूर्ण ब्रह्म होकर स्वानंदरूप कृष्ण सदन पहुँचेंगे। जो मूल के
उदक का वंदन करेंगे, जो मूल की मिट्टी लगायेंगे वे त्रिभुवन में वंद्य होकर उन्हें नित्य निजसखा कृष्ण की प्राप्ति
होगी। उसी प्रकार, हे सुजान परीक्षित ! जो भी कोई पठन के द्वारा प्रत्यगावृत्ति अर्थात स्वस्वरूपाकार वृत्ति के इस
वृन्दावन को सद्भावना से प्रदक्षिणा करेगा,' वे भी श्रीकृष्ण चरणों में रंग जायेंगे। जो इस कथा की विचित्र
लीलाओं की रंगोली इस तुलसी वृन्दावन के सामने नित्य सजायेंगे वे कलिकाल को भी जीतेंगे व उनके साथ
श्रीकृष्ण सदासर्वदा खड़ा रहेगा। इस एकादश स्कंध रूप वृन्दावन की जो श्रवणरूप से नित्य पूजा करेगा, उस पर
श्रीकृष्ण प्रसन्न होकर उसका देहाभिमान नष्ट करेगा। जो मनन की पुष्पांजलि (मंत्रपुष्प) नित्य त्रिकाल अर्पण
करेगा, वह भी आत्मनिष्ठा से हरि के पास पहुँचेगा। श्रीभागवतरूपी वृन्दावन के पास संत-सज्जनों को एकत्र
कर, इसकी कथा का जो निरूपण करेंगे वह वृन्दावन की निरपेक्ष महापूजा होगी। यह महापूजन देखकर श्री
जनार्दन सन्तुष्ट होगा और जो श्रोता-वक्ता सावधान रहेंगे उन्हें वह स्वयं आत्मज्ञान देगा। श्रवण से, पठन से,
मनन से तथा अर्थनिरूपण से एकादश स्कंध समान फल देगा। उसके मन में ज्ञाता और अज्ञानी के प्रति कोई भेद
नहीं है। यदि श्रवण, मनन अथवा पठन सम्भव न हो तो एकादश स्कंध की पुस्तक ही ब्राह्मण को दान में दें।
इससे विवेक ज्ञान उत्पन्न होगा। एकादश स्कंध का दान दें, एकादश स्कंध की पूजा करें अथवा केवल एकादश
स्कंध का स्मरण करें तो भी सारे पातकों का नाश होगा। एकादश स्कंध का जो संग्रह करता है, उसके घर में
श्रीकृष्ण का वास रहता है। एकादश स्कंध में जो श्रद्धा रखता है, उसमें ज्ञान अपने आप प्रवेश करता है। जिसके
मुख से इसके श्लोकों का, आधे श्लोक का अथवा एक चतुर्थांश श्लोक का नित्य स्मरण होता है, वह भी परम
पवित्र होता है। इस प्रकार एकादश स्कंध अत्यन्त उदार है। किसी काम के लिये जाते समय यदि अकस्मात भी
एकादश स्कंध पर दृष्टि पड़ जाये तो सारे पातक भय के मारे भाग जाते हैं। एकादश स्कंध जिसके हाथ में हो,
उसे देवतागण भी प्रणाम करते हैं। वह स्वयं सारे संसार का उद्धार कर सकता है। एकादश स्कंध का इतना
माहात्म्य है। सारे पुराणों में एकादश स्कंध एक वनकेशरी (सिंह) है वह एक श्लोकार्ध में ही, क्षणभर में
संसाररूपी गज का विदारण कर देता है। 'मामेकमेवशरणं' (अ० १२, श्लोक १७) इस श्लोक का पठन करने
से, वह माया का गला दबाकर भय से ही संसार को नष्ट देता है। 'निरपेक्षं मुनि शांत' (अ० १४, श्लोक १६)
यह श्लोक यदि अंतःकरण में बस गया तो उस भक्त की कृष्ण भी सेवा करता है, फिर संसार का भय कहाँ
रहेगा ? एकादश स्कंध का प्रत्येक श्लोक भवबंध को काटने वाला है। जिसमें साक्षात श्रीकृष्ण ही वक्ता हैं, उसमें
किसी एक को ही अच्छा कैसे कहा जा सकता है ? श्रीभागवत में एकादश स्कंध ही मोक्ष का स्थान है। इसलिये
आधे श्लोक से भी संसार बंधन का पूरी तरह नाश होता है। श्रीकृष्ण वेदों का जन्मस्थान है और निरूपण उसके
मुख से निकला है। इसलिये सारे वेदों का अर्थ स्वयमेव ही यहाँ अपने मैके आया है। इसलिये एकादश स्कंध में
वेदार्थ मैके में रहकर सुखी हो गया है। वे साधक को स्वानंदस्वरूप सम्पूर्ण परमार्थ देते हैं। वेदशास्त्रों का मंथन कर