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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 859, कुल 869 में से

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पृष्ठ 859

स्थिति अलिप्त क्यों रहती है? और अभक्त ही अत्यन्त बद्ध क्यों होते हैं? तो कृष्णकीर्ति का कीर्तन करने में
भक्तों का देहाभिमान नष्ट होता है, इसलिये वे अलिप्त रहते हैं और अभक्तों को अहंभाव होने के कारण बन्धन
प्राप्त होता है। हे परीक्षित! यह स्थिति माँगने से नहीं मिलती। बिलकुल इच्छापूर्वक श्रीकृष्ण कीर्ति गाने से अपने
आप ही अंकित हो जाती है। श्रीकृष्ण कीर्ति के कीर्तन से और पठन से सन्तुष्ट होकर श्रीकृष्ण ने अनेक लोगों
का संसार धारण छुड़ा दिया है। कृष्ण कीर्ति के कीर्तन में रुचि अहंकार का कारावास तोड़ देती है और असीम
रुचि से कीर्ति गाने से जीव का जीवन बंध टूट जाता है। इस प्रकार कृष्ण की कीर्ति का कीर्तन कर भक्तों को
'कृष्ण की उपाधि' प्राप्त कर लेनी चाहिये। संसार का उद्धार करने के लिये ही श्रीकृष्ण ने अपनी कीर्ति का
प्रसार किया है। ऐसा यह परमामृत का सार श्रीकृष्ण का चरित्र जन्म से अन्त तक परम अद्भुत है।
इत्थं हरेर्भगवतो रुचिरावतारवीर्याणि बालचरितानि च शान्तमानि।
अन्यत्र चेह च श्रुतानि गृणन् मनुष्यो भक्तिं परां परमहंसगतौ लभेत ॥ २८ ॥
ज्ञानधन श्रीकृष्ण का चरित्र जन्म से ही पावन है। जिसके संग से ग्वालों जैसे अज्ञानी जनों का उद्धार हुआ,
जिसके साथ व्यभिचार करने से कितनी ही गोपियों का उद्धार हुआ; क्योंकि उन्होंने कृष्ण की श्यामसुन्दर मूर्ति
देखकर मन में दृढ़ अभिलाषा रखी थी। कृष्ण की सुन्दर मूर्ति देखकर गौएँ भी सम्मोहित हो जाती थीं और
तटस्थ खड़ी रहती थीं। इस प्रकार कृष्ण की संगति से पशुओं का भी उद्धार हो गया। फिर गोपियों का उद्धार
क्यों नहीं होगा? वृन्दावन के तृण तथा पाषाण का (तृणजीव और पाषाण रूप के जीव) भी कृष्ण की संगति से
उद्धार हुआ, ऐसा वह श्रीकृष्ण ज्ञान का साक्षात पुतला था। स्तन में विष भर कर पूतना कृष्ण का प्राण हरने
आयी, उसका भी कृष्ण की संगति से उद्धार हो गया। कंस-शिशुपाल आदि का कृष्ण ने द्वेष के ही कारण उद्धार
किया। अंग में चन्दन लगाया इसलिये कुब्जा को तारा मद से उन्मत्त मूढ़ कवलयापीड हाथी मारने के लिये
आया, उसने कृष्ण को जोर से चोट पहुँचायी इसलिये उसे मोक्ष सुलभ कर उसका उद्धार किया। श्रीकृष्ण पर
अरिष्ट लादने के लिये अरिष्टासुर आया था, उसे सींग से पकड़ कर तारा। अघासुर ने श्रीकृष्ण को निगल लिया
था, उसे तत्काल चीर कर उसके दो फाँक कर उसका उद्धार किया। कृष्ण की प्रतीक्षा करते हुए बकासुर यमुना
के जल में ध्यानस्थ बैठा था, उसने कृष्ण को तत्काल निगल लिया। तब उसके दो फाँक कर उसका उद्धार
किया। तृणावर्त कृष्ण को उड़ाने आया था, उसे लट्टू की तरह घुमाकर मारा। ऐसा कृष्ण बैरी को भी अंगसंग से
कृपालु होकर तारता है। गोपालों को चोर चुरा कर ले गये, उस ठग व्योमासुर को मार कर उसका भी उद्धार
किया। श्रीकृष्ण मोक्ष दिलाने में उदार हैं। उसने कंस का केशी नामक घोड़ा मारकर उसे तारा। अखाड़े में मल्लों
का संहार कर मोक्ष की खैरात कर दी। विषैले कालिया सर्प को समाप्त कर दिया। वत्सासुर को वृक्ष पर फेंक
कर मारा। ऐसा श्रीकृष्ण संसार समुद्र की नौका है। वह स्वसंगति से जड़मूढ़ जीवों का उद्धार करता है। जिन्होंने
कृष्ण के साथ खेल खेले थे, जिनके घर का वह पानी पिया था, जिनके घर का मक्खन चुरा कर खाया था, उन
ग्वालिनों का भी उसने उद्धार किया। रुक्मिया की दुर्गत कर उसे तारा, बाणासुर की भुजाएँ तोड़कर उसे तारा।
कुशराक्षस का प्राण लेकर उसे तारा। इस प्रकार श्रीकृष्ण मोक्षदाता है। जिन्होंने श्रीकृष्ण से संबंध किया अथवा
जो मौज में उसे देखने आये उन्हें उसने दर्शन सुख से तृप्त कर लिया। पाण्डवों का पक्ष लेकर उन्हें तारा, बैरियों
को शस्त्राघात से तारा। इस प्रकार कृष्ण ने अपनी संगति से अनेक लोगों का उद्धार किया। वैरियों को द्वेषभाव से
ही तारा; भक्त भक्तिभाव से उसके पास पहुँचे और जीव भाव से अनुसरण करने वाली गोपियों को प्रत्यक्ष संगति
का अनुभव देकर उनका उद्धार किया। संरक्षण कर गौओं को तारा; मुकुट पर मोरपंख लगाकर मयूरों का उद्धार