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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 851, कुल 869 में से

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पृष्ठ 851

इकतीसवाँ अध्याय ८३५
अद्भुत सामर्थ्य थे। संसार में जो बड़ी-बड़ी शक्तियाँ हैं, उनमें श्रीकृष्ण की शक्ति के अंश से ही सामर्थ्य प्राप्त
हुआ है। उसका देह विदेहस्थिति का होने के कारण ही वह अपनी इच्छा से निजधाम गया। श्रीकृष्ण के मन में
इहलोक की आसक्ति नहीं थी और वैसे निजधाम के प्रति भी आतुरता नहीं थी। इसी देह से इस लोक में रहना
भी उसे उपयुक्त नहीं लगा क्योंकि उसने सोचा कि मेरे देह की अगम्य स्थिति को देखकर साधकों की स्थिति
बिगड़ जायेगी। मेरा देह चैतन्यघन होने के कारण उसे विषय की बाधा नहीं होती, यह देखकर साधक भी
देहसाधना करने लगेंगे। वायु का पूर्ण निरोध कर अपना देह अमर कर, मेरी तरह विषय सेवन करने का उन्हें
मोह होगा और देहाभिमान भी बढ़ेगा और ऐसा देहाभिमान बढ़ने पर उनका निजात्मज्ञान नष्ट हो जायेगा। इस
विचार से श्रीकृष्ण विदेहरूप से निजधाम चले गये। मेरे आत्मज्ञान का आकलन तो नहीं होगा लेकिन योगी लोग
मेरी तरह विषयसेवन अवश्य करने लगेंगे। इसीलिये वह निजधाम चला गया। जिसके देह का दर्शन करने से मन
अंतर्बाह्य तृप्त हो जाता है, वह देह ही मिथ्या है यह दिखाकर वह निजधाम चला गया। इस प्रकार देहाभिमान
छोड़ने के लिये ही कृष्ण ने निजधाम का गमन किया। उस कृपा सागर ने साधक जनों को तारने के लिये ही यह
दीक्षा दी। यहाँ तक वैराग्य की स्थिति दृढ़ हो और देहाभिमान के प्रति विरक्ति उत्पन्न कर आत्मज्ञान साध्य किया
जाय यही दीक्षा श्रीकृष्ण ने दी। इसके अतिरिक्त, श्रीकृष्ण ने जिस देह से अनेक लीलायें कीं लेकिन उस देह के
कर्म से ज्ञाता को दोष नहीं लगता, यह भी उन्होंने प्रकट किया। जय मिले या पराजय, किसी भी स्थिति में ज्ञाता
का मन मलिन नहीं होता। जिसे पुरुषों का और स्त्रियों का भास भी मिथ्या लगता है, वह व्यभिचार में भी
निरन्तर ब्रह्मचारी ही है। स्त्री बच्चों के साथ गृहस्थी करते हुए भी कोई नित्य संन्यासी हो सकता है यह लक्षण
भी श्रीकृष्ण ने अपने अवतार में दिखला दिया। मूलरूप में ग्वाला, लेकिन शीघ्र ही मथुरा में पूर्ण स्वामित्व प्राप्त
हुआ और अन्त में स्वयं सेवक ही बना लेकिन पूर्णत्व में बाधा नहीं आयी। एक के घर जूठन उठायी, एक के
घोड़ों को नहलाया-धुलाया फिर भी पूर्णत्व में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आयी। किसी को उसके मृत पुत्र
लौटाये; किसी के पूरे कुल का ही नाश कर दिया लेकिन इन दोनों कृतियों में उसका ज्ञान मलिन नहीं हुआ यह
भी दिखा दिया। एक का पूर्ण समर्थक बना तो दूसरे का कट्टर शत्रु बन गया लेकिन चराचर में स्थापित ऐक्य
रत्तीभर भी कम नहीं हुआ। जिसके चरणों पर गिरते ही उनका उद्धार हो गया, वह स्वयं भी किसी के चरणों पर
मस्तक रखता है। उसके ज्ञान का महत्त्व किन शब्दों में वर्णन किया जाय? परस्पर विरुद्ध कृतियों में भी उसके
ज्ञान में कमी नहीं आयी। अन्य ज्ञातागण अपना ज्ञान शब्दों में व्यक्त करते हैं किन्तु कृष्ण की बात वैसी नहीं थी।
उसने उसके अनुसार आचरण कर मार्ग दिखला दिया। ज्ञान के अत्यन्त गूढ़ लक्षण श्रीकृष्ण ने अपने आचरण में
दिखला दिये, फिर भी पूर्णत्व के कारण अपने में कोई कमी नहीं आने दी। जिस देह की इतनी ख्याति है, जिस
देह के कारण ही दीनजनों का उद्धार होता है, जिस देह को देव, दानव और मानव भी वन्दन करते हैं और जिस
देह की कीर्ति त्रैलोक्य वर्णन करता है, उस देह का निःशेष अभिमान त्याग कर, अपनी मूर्ति स्वभक्तों के ध्यान में
रखकर श्रीकृष्ण निजधाम चला गया। श्रीकृष्ण देह को ले भी नहीं गये और छोड़ भी नहीं गये। वह लीला विग्रह
से समस्त विश्व में व्याप्त होकर, वह लीलादेह अपने भक्तों के ध्यान में प्रतिष्ठित किया और स्वयं निजात्म योग
से निजधाम चला गया।
य एतां प्रातरुत्थाय कृष्णस्य पदवीं पराम्।
प्रयतः कीर्तयेद् भक्त्या तामेवाप्नोत्यनुत्तमाम्॥ १४॥
श्रीकृष्ण अवतार के अन्त में कृष्ण की जो परमगति हुई, वह सर्वोत्तम योगस्थिति है। वह देवश्रेष्ठों को भी