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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 854, कुल 869 में से

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पृष्ठ 854

८३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
चुम्बन लूँगी। तुम्हारे बिना मैं अत्यन्त दीन हो गयी हूँ। हे मेरे श्यामसुन्दर ! हे सुकुमार ! हे कमलाक्ष ! हे चतुर्भुज !
हे शारंगधर ! हे उदार श्रीकृष्ण ! मैं क्या करूँ ? कृष्णा, तुम्हारे बिना मैं अन्धी हो गयी हूँ! हे वनमाली ! मेरी उँगली
पकड़ने दौड़ते हुए आओ। मुझ अन्धी की वह लाठी था। उसे बैकुण्ठ में कौन छोड़ आया ? अब मैं अपना रास्ता
कैसे पार करूँ ? हे जगजेठी कृष्ण ! पुत्र, नाती, पौत्र आदि पूरे वंश की ही होली जल गयी ? यादवों के कुल में
कोई नहीं बचा ? कहते हुए वे वक्ष पीटने लगी। देवकी का रुदन सुनकर वसुदेव, उग्रसेन आदि सारे लोग रोते-
चिल्लाते प्रभास की ओर चल पड़े।
तत्र स्म त्वरिता जग्मुः कृष्णविश्लेषविह्वलाः ।
व्यसवः शेरते यत्र ज्ञातयो घ्नन्त आननम् ॥ १७॥
स्त्रियाँ, पुरुष, सुहृदजन आदि सभी एकत्र होकर रोते-चिल्लाते प्रभास की ओर चल पड़े। उनके चीख,
कोलाहल से वातावरण गूँज उठा। स्त्रियों ने तो आकाश-पाताल एक कर दिया। कृष्ण के वियोग में विह्वल सभी
लोग चल पड़े। यादव रण में जहाँ निर्जीव पड़े थे, वहाँ सभी लोग रोते-चिल्लाते जा पहुँचे।
देवकी रोहिणी चैव वसुदेवस्तथा सुतौ ।
कृष्णरामावपश्यन्तः शोकार्ता विजहुः स्मृतिम् ॥ १८॥
प्राणांश्च विजहुस्तत्र भगवद्विरहातुराः ।
उपगुह्यपतींस्तात चितामारुरुहुः स्त्रियः ॥ १९॥
देवकी और रोहिणी, वसुदेव और उग्रसेन ये दोनों, समरांगण में जहाँ यादव मृत पड़े थे वह स्थल देखने
पहुँचे। देखा तो वहाँ यादव वीरों की पंक्तियाँ महानिद्रा ले रही थीं। किन्तु उनमें बलराम और कृष्ण ये उनके पुत्र
नहीं दिखायी दिये। तब कृष्ण के विरह में शोकाकुल होकर उनका दुःख का आवेग नहीं थम पा रहा था। चारों
वहीं दहाड़ मारकर मूर्च्छित होकर गिर पड़े। निवर्तमान राम-कृष्ण का मुख भी हमें नहीं दिखायी दे रहा, इससे
उनके दुःख की पराकाष्ठा हो गयी और इसमें उनके प्राण भी निकल गये। सारे यादवों की पत्नियाँ अपने-अपने
पति का प्रेत लेकर सती होने के लिये चिता पर चढ़ गयीं। यादवों की स्त्रियाँ असंख्य थीं। उसमें कौन किस तरह
सती चली गयीं, उस अग्नि प्रवेश का शुक्राचार्य वर्णन करते हैं।
रामपत्न्यश्च तद्देहमुपगुह्याग्निमाविशन् ।
वसुदेवपत्न्यस्तद्गात्रं प्रद्युम्नादीन् हरेःस्नुषाः ।
कृष्णपत्न्योऽविशन्नग्निं रुक्मिण्याद्यास्तदात्मिकाः ॥ २०॥
रेवतीप्रमुख बलराम की स्त्रियों ने अपने पति का मन में ध्यान कर अग्नि में प्रवेश किया। देवकी और
रोहिणी तो वहाँ पहले से ही मृत पड़ी थीं। वसुदेव की जो शेष स्त्रियाँ थीं, उन्होंने भी अपने पति का देह ले कर
सहगमन किया। प्रद्युम्न के साथ महासाध्वी रती ने सहगमन किया और सांवा के साथ दुर्योधन की कन्या रूपवती
ने सहगमन किया। उसी प्रकार अनिरुद्ध के साथ रोचना और उरवा ने अग्निप्रवेश किया। इस प्रकार कृष्ण की
सभी बहुओं और यादवों की नायिकाओं ने अग्नि में प्रवेश किया। लेकिन श्रीकृष्ण की स्त्रियों ने जो अग्नि प्रवेश
किया, उसकी कृति अलौकिक थी। उन स्त्रियों में सभी सतियों में शिरोमणि जगन्माता रुक्मिणी प्रमुख थी। कृष्ण
का निर्वाण सुनने के बाद वह तत्क्षण तद्रूप हो गयी; ज्वाला जिस प्रकार अग्नि से जाकर मिलती है उसी प्रकार