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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 845, कुल 869 में से

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पृष्ठ 845

इकतीसवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप सद्गुरु अच्युत ! तुम्हें नमस्कार है। तुम देहधारी होते हुए भी देहातीत हो। गुणों में रहते
हुए भी निर्गुणत्व से विचरण करते हो। तुम्हें देह के प्रति ममता नहीं है। बचपन में तुमने विष प्राशन किया था;
पूतना का प्रत्यक्ष शोषण किया था और दावाग्नि का प्राशन किया था। तुम वैकुण्ठ के सिंहासन को सुशोभित
करते हो, तुम्हें देहाभिमान नहीं है। स्वयं गोपालकों के साथ रहकर उनके साथ कबड्डी खेलते हो। कर्मशील
ब्राह्मण कर्म के बल पर तुम तक पहुँचने के लिये सदा छुआछूत का आश्रय लेते हैं और तुम ग्वालों के बेटों के
साथ मिल-जुल कर खाना खाते थे। जिसे दुराचार कहते हैं, वह व्यभिचार कर गोपियों का उद्धार किया। तुम्हारा
यह चरित्र वेदशास्त्रों को भी अगम्य है। घर में सोलह हजार स्त्रियाँ और एक लाख साठ हजार बच्चे खेलते हुए
भी, तुम्हें बाल ब्रह्मचारी के रूप में सनत्कुमार वंदन करते हैं। तुम्हारे ब्रह्मचर्य की महत्ता को शुक नारद भी मान्य
करते हैं और मारुति भी चरणों पर लोटते हैं। तुम ऐसे निष्ठावान ब्रह्मचारी हो। व्रतबंध होने के पूर्व ही तुमने
ग्वालों की लड़कियों का भोग किया, तुम निश्चय ही ऊर्ध्वरेता हो, तुम्हें भीष्म भी वन्दन करते हैं। नौ लाख गौवों
की रस्सी से भी तुम नहीं बँध सके लेकिन श्रद्धा के बल पर रासक्रीड़ा में तुम्हें गोपियों ने बाँध लिया। तुम उनकी
इच्छानुसार क्रीड़ा कर रहे थे। छह महीने तक तुमने उनके साथ क्रीड़ा की। इस प्रकार काम को स्पर्श किये बिना
तुम स्त्रियों का काम पूरा कर रहे थे। विधि वेदार्थ को लज्जित कर तुमने सारी गोपियों को तारा। गोपियों को
अद्भुत प्रेम से तारा; वेणुगीत से गौओं का उद्धार किया और श्रीकृष्ण ! निजयोग सामर्थ्य से समस्त ग्वालों का
तारा। दुष्ट बुद्धि कंस और अपराधी व्याध को भी तारा। श्रीकृष्ण ! तुम संसार की सीमा होते हुए भी कृपालु हो।
कृष्ण की बात नहीं काट सकता था इसलिये यम भी गुरु के पुत्र को वापस ले आया। जो कलिकाल से भी कभी
हार नहीं मानता, उस श्रीकृष्ण ने क्या देह त्याग कर दिया ? देव निजधाम जाते हैं यह अध्याय भागवत का कलश
है। इसका गहन अभिप्राय शुकदेव परीक्षित को बताते हैं। कलश के ऊपर कोई चीज नहीं चढ़ायी जाती। उसी
प्रकार भगवान निजधाम जाने के बाद निरूपण कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसीलिये उसे कलश कहते हैं।
वेदशास्त्रों का रहस्य यही है कि अहँभाव नहीं होना चाहिये। श्रीकृष्ण का निजधामगमन ब्रह्मादि देवताओं के
लिये भी अतर्क्य है। फिर भी जनार्दन की कृपा होने के कारण एकनाथ उसका विशद वर्णन करके बताएगा।
दारुक द्वारका जाने के बाद श्रीकृष्ण निजधाम के लिये निकल पड़े। उस समय उनका निर्वाणकाल का दर्शन लेने
के लिये समस्त देवतागण वहाँ आये। उसी अर्थ का निरूपण श्रीशुक्राचार्य बता रहे हैं और श्रोता परीक्षित भी
कृष्ण का निर्वाण सुनने के लिये सावधान होकर बैठा है।
श्रीशुक उवाच
अथ तत्रागमद् ब्रह्मा भवान्या च समं भवः ।
महेन्द्रप्रमुखा देवा मुनयः सप्रजेश्वराः ॥ १ ॥
पितरः सिद्धगन्धर्वा विद्याधरमहोरगाः ।
चारणा यक्षरक्षांसि किन्नराप्सरसो द्विजाः ॥ २ ॥