श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
मूर्खतावश है। नित्य सर्वगत, परिपूर्ण तथा अखण्ड दण्डायमान श्रीकृष्ण में और मुझमें कोई अन्तर नहीं है। 'न
जायते म्रियते' अर्थात् जो जन्म भी नहीं लेता और मरता भी नहीं, ऐसा अपने सम्बन्ध में श्रीकृष्ण ने स्वयं ही
कहा है। उन श्रीकृष्ण को जन्म और मरण है ऐसा मूर्ख लोग ही स्वीकार करेंगे। 'मैं अक्षर और परब्रह्म' हूँ,
ऐसा स्वयं पुरुषोत्तम ने ही कहा है। क्षर और अक्षर इनसे भी परे रहने वाला 'उत्तम पुरुष' श्रीकृष्ण, उसे भ्रांत
लोग अपने मनोधर्म के अनुसार जन्म-मरण के फेरे हैं ऐसी कल्पना करते हैं। उस कृष्ण में और मुझमें कल्पांत
में भी भिन्नता नहीं है। इस प्रकार गीतार्थ का स्मरण करते ही उसे अपने पूर्णत्व की प्रतीति होती है। मैं अजन्मा,
आद्य, अचल, नित्य, निर्मल तथा आत्मस्वरूप हूँ। मेरे स्वरूप में कभी कोई परिवर्तन नहीं है। त्रैलोक्य मेरा ही
खेल है। संसार को नियमों का बोध कराने वाला वेद मेरे ही श्वासोच्छ्वास से निकला हुआ बोध है। आनन्द
का परमानन्द और स्वानंद का कंद मैं स्वयं हूँ। उदक के रूप में मैं ही हूँ तथा प्रकृति पुरुषों का जनक हूँ। मेरे
ही स्वरूप के आधार पर मैं ही कृष्ण रूप में अवतार लेकर, अपनी ही लीला से नाना प्रकार के चरित्रों का
आचरण कर अन्त में स्वस्वरूप में समाविष्ट हो गया। मेरे निजस्वरूप के ही बल पर मैंने कृष्णरूप से क्रीड़ा
की और अन्त में अपने में ही आपनिष्ठा से एकरूप होकर स्वयं में ही मिल गया। एक नर और एक नारायण,
वे परस्पर अभिन्न ही थे इसीलिये अर्जुन अपने को पूर्ण स्वरूप में देखने लगा। वह कृपासागर कितना कृपालु
है। युद्ध के समय उसने अर्जुन को उपदेश किया; लेकिन उस समय उसकी जो समाधि लगी, वह सचमुच
कल्पांत में नहीं टूट पाएगी। वास्तव में देखा जाय तो वह स्थान भी बहुत पवित्र था एकांत में नहीं था। वहाँ
असंख्य रथों की घड़घड़ाहट चल रही थी और शस्त्रों की खनखनाहट हो रही थी। किन्तु वैसे स्थान पर भी
निर्दोष परमानिष्ठा मन पर अंकित कर दी। समाधि भी ऐसी लगी कि महायुद्ध में भी नहीं टूटी। अन्त में वह
बोध कृष्ण के निर्वाण प्रसंग में पूर्णरूप से प्रकट हुआ। जिसे श्रीकृष्ण ने स्वयं गीता का उपदेश किया, वह उस
पर प्रभावकारी नहीं हुआ यह कहने से वाणी को दोष लगेगा। वह वाणी गलित कुष्ठ से झड़ जायेगी, उसमें
विकल्प के कीड़े लगेंगे। कृष्णोक्ति से बोध नहीं हुआ यह कहने वाली जीभ ही झड़ कर गिर जायेगी। गीता के
उपदेश से पूर्णत्व नहीं आता, यह कहते समय वाणी की देवता सरस्वती थर-थर काँपने लगेगी। फिर दूसरों की
क्या कथा कहें? जो गीता सुनता है, देखता है और पठन करता है, जिसे गीता का केवल स्मरण होता है उसे
भी पूर्णत्व प्राप्त होता है; फिर जिसे प्रत्यक्ष उपदेश हुआ था, उसे पूर्णत्व क्यों नहीं आयेगा? गीतार्थ का पूर्णत्व
या तो उसका वक्ता श्रीकृष्ण जानता है या फिर उसका श्रोता अर्जुन जानता है क्योंकि उसका रहस्य उसके ही
अंतःकरण में अंकित था। वेदार्थ का सारांश निकालकर श्रीकृष्ण ने गीता प्रकट की। उसका रहस्य जानने पर
मोक्ष अनायास ही प्राप्त होता है। वेदान्त परदेशी हो गया था। उसे गीतार्थ ने आश्रय प्रदान किया। उसी के बल
पर वह सबका मन जीत कर समर्थ हो गया। वेदों का जन्म कृष्ण के श्वासोश्वास से हुआ; लेकिन गीता प्रत्यक्ष
उसके मुख से प्रकट हुई। इसीलिये गीता का अर्थ अगाध है। उसके ही योग से वेद सशक्त हुए। वेद ने
ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य इन तीन वर्णों को अपनाया था और शूद्र तथा स्त्रियों को दूर ढकेल दिया था। उनके कानों
को भी वह स्पर्श नहीं करता था। यह वेद में कमी थी। वेद की यह न्यूनता दूर करने के लिये श्रीकृष्ण ने गीता
का आविर्भाव किया। गीता के श्रवण से और पठन से सभी का उद्धार होता है। अर्जुन से प्रेम के कारण
श्रीकृष्ण ने गीतार्थ प्रकट किया। उस गीता के श्रवण से और पठन से जड़-जीवों का उद्धार होता है। सारांश,
गीता की महिमा महान है। उस गीतार्थ से ही अर्जुन ने अपनी सांत्वना कर ली और पहले की तरह देहभाव
स्थिर कर स्वस्थचित्त हो गया।