श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
होने के कारण, यदि कृष्ण के देह का दहन होता तो सारे संसार का ही दहन हो जाता। जिसने अपनी माँ को
बचपन में, पेट में अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड का दर्शन कराया था, उस कृष्ण के देह का दहन हो जाने पर संसार की
बात करना ही सम्भव नहीं होगा। श्रीकृष्ण का देह विदेहरूप था, उसका दहन कैसे होता ? कृष्ण का रहना और
जाना अकेले कृष्ण ही जानें। उसके सम्बन्ध में वेद की वाचा भी मौन हो जाती है। उसका ज्ञान यहाँ नहीं चल
पाता। कृष्ण की यह अगम्य गति ब्रह्मदेव और शंकर के भी समझ में नहीं आती। उनका विचार था कि श्रीकृष्ण
हमारे साथ चलेंगे। इसी विचार से देवताओं का समुदाय आनन्दित हुआ और उन्होंने बड़े आनन्दोत्सव का
आयोजन किया।
दिवि दुन्दुभयोनेदुः पेतुः सुमनसश्च खात्।
सत्यं धर्मो धृतिर्भूमेः कीर्तिः श्रीश्चानु तं ययुः ॥७॥
देव अत्यन्त आनन्दित हुए, उन्होंने दुन्दुभी बजाना शुरू किया और आकाश से श्रीकृष्ण पर दिव्य पुष्पों की
वर्षा की। वैकुण्ठ तथा स्वर्ग से श्रीकृष्ण मृत्युलोक में सम्पत्ति ले आये थे, वह अब हमें वापस मिल जायेगी यह
सोच कर देवतागण हर्षित हो गये और वे कृष्ण पर बार-बार पुष्पवृष्टि करने लगे, किन्तु शंकरादि देवतागण जब
ध्यानपूर्वक श्रीकृष्ण की ओर देख रहे थे तभी अतर्क्य गति से श्रीकृष्ण निजधाम चले गये। कैसे गये, किसी को
मालूम नहीं हुआ। हम सब माया के नियंता हैं, सर्वद्रष्टा तथा सर्वज्ञाता हैं ऐसा देवताओं को अभिमान था, किन्तु
श्रीकृष्ण ने उन सबको लज्जित कर दिया। कृष्ण की गति अतर्क्य थी, वह ब्रह्मदेव और शंकर की भी समझ में
नहीं आयी इसलिये वे चकित रह गये। अन्य सारे देवता भी आश्चर्य करने लगे। देवतागण आश्चर्य कर रहे हैं,
तभी सत्य, धर्म, धृति और कीर्ति ये देवता भी लक्ष्मी के साथ पृथ्वी छोड़कर कृष्ण की ओर देखकर चल दीं।
सत्य, धर्म, श्री, धृति और कीर्ति इनकी श्रीकृष्ण चरणों के पास बस्ती थी, इसलिये वे भी पृथ्वी छोड़कर तत्काल
कृष्ण के साथ चल दीं। लेकिन हे परीक्षित ! शायद तुम सोचोगे कि क्या सत्य, धर्म, श्री, धृति और कीर्ति ये सभी
पृथ्वी छोड़ कर चली गयीं ? उसके बारे में भी सुनो। हे कुरुश्रेष्ठ! मेरा विचार है कि जिनके हृदय में श्रीकृष्ण की
मूर्ति अंकित रहती है, वहाँ सत्य, धर्म, श्री, धृति और कीर्ति का साम्राज्य रहता है। केवल भक्तों का अनुग्रही
श्रीकृष्ण स्वयं लीलाविग्रही (अर्थात् स्वेच्छा से, विग्रह अर्थात् देह धारण करने वाला) कृष्ण की गति ब्रह्मादि
देवताओं की भी समझ में नहीं आयी।
देवादयो ब्रह्ममुख्या न विशन्तं स्वधामनि।
अविज्ञातगतिं कृष्णं ददृशुश्चातिविस्मिताः ॥८॥
इन्द्र, बृहस्पति और मुख्य रूप से ब्रह्मदेव इन सभी देवताओं को भ्रम में डालकर श्रीकृष्ण ने निजधाम में
प्रवेश किया। हरि की यह महिमा अतर्क्य है। श्रीकृष्ण की अतर्क्य गति, देवताओं को भी अपने सामर्थ्य से नहीं
मालूम हुई इसलिये वे मन ही मन विस्मित होकर अपने-अपने गंतव्य स्थल की ओर चल पड़े। वे इस बात से
चकित थे कि कृष्ण की गति अलक्ष्य है। वह समझ में आने लायक नहीं है। शंकर के लिये भी वह अतर्क्य है।
कृष्ण की ऐसी अतर्क्य गति, जो देवताओं को दैवी शक्ति के रहते भी समझ में नहीं आयी, वही शुक्राचार्य दृष्टांत
देकर परीक्षित को समझा रहे हैं।
सौदामन्या यथाऽऽकाशे यान्त्याहित्वाभ्रमण्डलम्।
गतिर्न लक्ष्यते मर्त्यै स्तथा कृष्णस्य दैवतैः ॥ ९ ॥