श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 857, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंइकतीसवाँ अध्याय ८४१
बन्धूनां नष्टगोत्राणामर्जुनः साम्परायिकम्।
हतानां कारयामास यथावदनुपूर्वशः ॥ २२॥
सभी यादव अपने कुल के साथ मर गये। उनकी उत्तर क्रिया करने के लिये भी कोई गोत्रज शेष नहीं
बचा। वज्र नाम का अनिरुद्ध का पुत्र* द्वारका में रहता था इसलिये वह सारा उत्तर कार्य अर्जुन को करना पड़ा।
मैं अब निष्कर्म ब्रह्मस्वरूप हो गया हूँ, अतः मैं यह अंत्यकर्म नहीं करूँगा ऐसी ज्ञानगर्व की अकड़ अर्जुन में नहीं
थी। 'कर्मण्यकर्म यः पश्येत्' अर्थात् कर्म में जो अकर्म देखता है वह बुद्धिमान और योगी है (गीता अ ४/१८)
यह गीता का गूढ़ रहस्य अर्जुन के अंतःकरण में अंकित था। इसलिये उसने उन सबका अंत्यकर्म शान्त मन से
किया। पहले वरिष्ठों का दहन किया, फिर कनिष्ठों का किया। उसी क्रम में सबका पिण्डदान कर सबका तिल
तर्पण भी किया। इस पर सारी उत्तर क्रिया करके अर्जुन द्वारका लौटा। तो वहाँ दूसरा ही अरिष्ट सामने खड़ा था।
समुद्र अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा था।
द्वारकां हरिणा त्यक्तां समुद्रोऽप्लावयत् क्षणात्।
वर्जयित्वा महाराज श्रीमद्भगवदालयम् ॥ २३ ॥
नित्यं संनिहितस्तत्र भगवान् मधुसूदनः।
स्मृत्याशेषाशुभहरं सर्वमङ्गलमङ्गलम् ॥ २४॥
कृष्ण के द्वारका छोड़कर जाते ही समुद्र ने क्षणभर का भी विलम्ब न कर द्वारका क्षणभर में डुबो दी। तब
सभी लोग हाहाकार करते हुए भागने लगे। समुद्र ने पूरी द्वारका डुबोयी लेकिन भगवान का स्थान छोड़ दिया
क्योंकि पाताल से वह कुशनिर्दलन करने आया था। भगवान का स्थान समुद्र ने नहीं डुबोया क्योंकि वहाँ श्रीकृष्ण
का संनिधान नित्य नूतन स्फूर्ति का स्रोत रहता है। जिसका स्मरण करते ही महापातकों का नाश होता है और जो
सर्वमंगल का अधिष्ठान है, वह श्रीहरि का स्थान बना हुआ है। उस द्वारका में अभी भी श्रीकृष्ण की पूजा होती
है। हे महाराज परीक्षित! वह अधोक्षज का जागृत स्थल है।
स्त्रीबालवृद्धानादाय हतशेषान् धनंजयः।
इन्द्रप्रस्थं समावेश्य वज्रं तत्राभ्यषेचयत् ॥ २५॥
इस प्रकार द्वारका के डूबने के बाद शेष बचे छोटे-छोटे बालक, वृद्ध, स्त्री, पुरुष तथा स्त्रियों को साथ
लेकर अर्जुन इन्द्रप्रस्थ जाने के लिये तैयार हुआ। जो यादव प्रभास तक गये थे वे सभी मर गये। वज्रादिक जो
शेष बचे थे उनको लेकर अर्जुन निकल पड़ा। इस प्रकार उन सबको लेकर अर्जुन इन्द्रप्रस्थ आया और
यादववंश के राजकर्ता के रूप में उसने वज्र का राज्याभिषेक किया। अनिरुद्ध का पुत्र वज्र यही यादववंश के
राज्य का उत्तराधिकारी था, इसलिये उसका राज्याभिषेक कर वीर अर्जुन तत्काल धर्मराज के पास जाने के
तैयार हुआ।
श्रुत्वा सुहृद्वधं राजन्नर्जुनात्ते पितामहाः।
त्वां तु वंशधरं कृत्वा जग्मुः सर्वे महापथम् ॥ २६ ॥
अर्जुन ने श्रीकृष्ण के निजधाम जाने का समाचार युधिष्ठिर को सुनाया। फिर परीक्षित, तुम्हें राजपाट देकर
- अनिरुद्ध को रुक्मिणी की नतिनी से हुआ पुत्र; यादवी के बाद अर्जुन उसे इन्द्रप्रस्थ ले गये और उसे राजगद्दी पर बिठाया।