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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 855, कुल 869 में से

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पृष्ठ 855

इकतीसवाँ अध्याय ८३९
वह कृष्णत्व में लीन हो गयी। कृष्ण चला गया यह मालूम होते ही रुक्मिणी तटस्थ हो गयी और देह की खोल
त्याग कर कृष्णस्वरूप में मिलकर तद्रूप हो गयी। उसके देह का दहन करने के लिये देह बचा ही नहीं था। जिस
प्रकार कृष्ण स्वयंभू परिपूर्ण थे। वैसी ही वह भी थी। उन दोनों की गति एक जैसी थी। रुक्मिणी की तरह ही
सात अन्य पटरानियाँ थीं, वे तथा सोलह हजार स्त्रियाँ, इन्होंने भी तादात्म्य भाव से अग्नि में प्रवेश किया।
जिन्होंने कृष्णमुख का सुख भोगा, उनकी इससे कम गति हुई यह कहने में भी पाप लगेगा क्योंकि कृष्ण के
अंगसंग से ही वे ज्ञानस्वरूप हो गयी थीं। वाणी से 'कृष्ण कृष्ण' कहकर स्मरण करने से ही जब कोई पूर्ण
कृष्णस्वरूप हो जाता है तो फिर जिसने कृष्ण के साथ प्रत्यक्ष उपभोग किया, उसकी योग्यता कभी कम नहीं
होगी। जिसे कृष्ण का अंगसंग प्राप्त होगा, उसका वासनात्मक लिंगदेह भंग हो जायगा और अविनाशी की उपाधि
प्राप्त होकर, भोग भोगते हुए भी उसका कृष्ण के साथ तादात्म्य स्थापित रहेगा। जिसके ध्यान में श्रीकृष्ण की
मूर्ति रहती है, उसे चारों मुक्तियाँ वन्दन करती है। फिर जिसने स्वयं ही कृष्ण का उपभोग किया, उन्हें दूसरी गति
कभी नहीं प्राप्त होगी। इहलोक में जिसे कृष्ण का साथ होता है, उन्हें परलोक में दूसरी गति प्राप्त होगी ऐसा
कहने से ज्ञाता लोग रुष्ट हो जायेंगे। अतः उन्हें पूर्णत्व के कारण पूर्णस्वरूप की ही प्राप्ति होगी। जो लड़खड़ाकर
गंगा में गिरता है उसका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है; लेकिन जो विधियुक्त स्नान करता है उसका पाप क्यों नहीं
नष्ट होगा ? उसी प्रकार कृष्ण से व्यभिचार संगति करने से जब असंख्य गोपियों का उद्धार हुआ तो फिर उसकी
शादीशुदा स्त्रियों को दूसरी गति कैसे प्राप्त होगी ? अधिक क्या कहें, कृष्ण के पादस्पर्श से, अंगस्पर्श से जब
गोकुल वृन्दावन के तृण, वल्ली, मृग, पाषाण, गौएँ, गोपियाँ और ग्वाला लोग तर गये तो फिर कृष्ण की स्त्रियों
को अन्य गति कैसे मिलेगी ? इसलिये, किसी भी ढंग से क्यों न हो लेकिन जिसका कृष्ण से संग हुआ उनका हे
परीक्षित, कुरुराज अवश्य उद्धार हुआ।
अर्जुनः प्रेयसः सख्युः कृष्णस्य विरहातुरः।
आत्मानं सान्त्वयामास कृष्णगीतैः सदुक्तिभिः ॥ २१ ॥
जिसका रथ श्रीकृष्ण स्वयं हाँक रहा था, जिसका वह सारथी बना था, ऐसा वह प्रिय सखा अर्जुन तो
कृष्ण के विरह से अत्यन्त उद्विग्न हो गया था। इतने में उसे कृष्ण ने गीता में कही हुई सुदुक्ति का स्मरण हो
आया। फिर उसने अपने मन को किस प्रकार समझाया, जरा सुनिये। कृष्ण मेरे मन का मन है, कृष्ण मेरी बुद्धि
का अधिष्ठान है, कृष्ण प्रकाश से ज्ञान प्रकाशित होता है फिर उसमें और मुझमें भिन्नत्व कहाँ रह गया ?
कृष्णप्रभा से आँखें देखने का काम करती हैं, कृष्ण की अवधान शक्ति से कान सुनने का कार्य करते हैं, कृष्ण
की अनुवाद शक्ति से वाणी बोलती है, ऐसा होते हुए उसमें और मुझमें अन्तर है, यह मानना व्यर्थ है। कृष्ण ही
हृदय में रहने वाला अव्यंग आत्मा है, कृष्ण ही मेरे अंग का अवयव है; ऐसे उस कृष्ण का और मेरा वियोग
हुआ यह मानना भी केवल मिथ्या और मायाजनित है। कृष्ण मेरे जीव का जीवन है, कृष्ण मुझमें अंतर्बाह्य
व्याप्त है, कृष्ण का वियोग मानने वाला मेरा मन भी श्रीकृष्ण में ही लीन हो गया है। भिन्न-भिन्न प्राणियों के
जो आकार हैं, उनमें कृष्ण ऐक्यरूप से विद्यमान है। विषम में भी सम रहने वाला जो श्रीपति है उससे वियोग
कभी नहीं होगा। घर मिट्टी से भिन्न नहीं होता। तंतु का त्याग कर वस्त्र को अलग नहीं किया जा सकता। उसी
प्रकार मैं अर्जुन श्रीकृष्ण से बिलकुल अलग नहीं हूँ। जब मैं श्रीकृष्ण से वियोग की बात करता हूँ, उस समय
भी श्रीकृष्ण वहाँ उपस्थित रहता है। अतः जिसे लोग सच्चा वियोग कहते हैं, वह भ्रम के कारण तथा