श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वे तत्काल निर्वाण के पथ पर चल पड़े। श्रीकृष्ण निजधाम गये यह सुनते ही कुंती ने वहीं प्राण त्याग दिये और
द्रौपदी सहित पाँचों पाण्डव महापंथ पर चल पड़े।
य एतद् देवदेवस्य विष्णोः कर्माणि जन्म च।
कीर्तयेच्छ्रद्धया मर्त्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २७॥
ऐसा वह देवाधिदेव सर्वेश्वर, उसके मत्स्यकूर्मादि अवतार और जन्मकर्मादि नाना चरित्रों का जो गायन
करते हैं, वे अत्यन्त पवित्र और पुण्यराशि हैं। उस चरित्र का श्रद्धापूर्वक गायन करने से प्रयागादि सारे तीर्थों को
उसके योग से पवित्रता प्राप्त होगी। हे परीक्षित्! श्रद्धायुक्त हरिकीर्तन करने से, उससे अधिक पवित्र कुछ है ही
नहीं। वह श्रद्धा कैसी होती है, यह पूछो तो जिस प्रकार धन का लोभी धन के पास चिपक कर बैठता है, अथवा
चींटा को जिस प्रकार गुड़ से प्रेम होता है, वैसा ही प्रेम कीर्तन में होना चाहिये। अनेक दिन कष्ट करने के बाद
बाँझ स्त्री को जब बच्चा पैदा होता है तो उसे जिस प्रकार उसके प्रति अत्यन्त ममत्त्व होता है, उसी प्रकार कीर्तन
के प्रति प्रेम होना चाहिये। हे परीक्षित्! हरिकीर्तन के वैभव से बेहोश होकर श्रीहरि का चरित्र भक्तिभाव से गाने
के लिये जो पतंग की तरह दौड़कर आता है उसका नाम 'श्रद्धा' है। ऐसी श्रद्धासम्पत्ति से युक्त होकर भगवान की
गुणानुवाद कीर्ति का वर्णन करने पर, हे राजश्रेष्ठ! उस श्रद्धावान को 'परमप्राप्ति' होती है, यह निश्चित रूप से
जान लो। परमेश्वर ने यद्यपि अपनी लीला से नाना प्रकार के अवतार लिये हैं, फिर भी उनमें श्रीराम और
श्रीकृष्ण इनके चरित्र अत्यन्त गम्भीर और पवित्र हैं। कृष्ण की चोटी का गीतों में वर्णन करने से सुवर्णचोरी का
पाप धुल जाता है। कृष्ण के व्यभिचार का वर्णन करने से गुरुपत्नीगमन का पाप भी नष्ट हो जाता है। पूतना के
दुग्धप्राशन का चरित्र पढ़ने से, श्रद्धालु पुरुष के सुरापानादि दोष दूर हो जाते हैं। रावण राक्षस कुल का था किन्तु
वह शुद्ध ब्राह्मण जाति का था। वह नित्य वेदपाठ करता था क्योंकि वह ब्रह्मदेव का पोता है। श्रीराम ने उसके पूरे
कुल का नाश किया। उस चरित्र का पठन करने से ब्रह्म हत्या का लय होता है। श्रीकृष्ण धर्म का सहायक था।
इसलिये उसने पाण्डवों का संरक्षण किया। उस महाभारत के श्रवण से मृत ब्राह्मण जीवित हो उठे। जनमेजय ने
अठारह ब्रह्महत्याएँ की थीं। उसे महाभारत के अठारह पर्व सुनाकर मृत अठारह ब्राह्मणों को जीवित किया। कृष्ण
की यह कीर्ति अत्यन्त पावन है। श्रीराम और श्रीकृष्ण की कीर्ति सुनने पर बेचारे महापातक हैं ही कितने?
श्रद्धापूर्वक कीर्ति का गायन करने से चारों मुक्तियाँ चरण स्पर्श करती हैं। श्रद्धा के वैभव से तथा प्यार से श्रीकृष्ण
के चरित्र का गायन करने से देह को होते हुए ही वे सायुज्य स्थिति तक पहुँचते हैं। जिसके हृदय में और मुख में
हरिकीर्तन रहता है वह भले ही देह में विचरण करता दिखायी देता हो लेकिन वह देह में नहीं बल्कि हरि के
पास रहता है और हरि भी पूर्ण रूप से उसके हृदय में रहता है। वह भी हरि में ही रहता है और हरि भी उसमें
अन्तर्बाह्य रहता है। हे परीक्षित्! इस प्रकार 'कीर्तिवंत' अर्थात् कीर्ति गाने वाले संसार में विचरण कर रहे हैं।
अतः इस मृत्युलोक में हरिकीर्तन से अधिक सरल कोई अन्य साधन नहीं है। जो हरिकीर्तन में रममाण होते हैं वे
देहबंधन का स्पर्श भी नहीं करते। कृष्ण के कीर्तन से अंतःकरण एक बार शुद्ध और स्वच्छ होने पर वह कल्पांत
में भी मलिन नहीं होता। देह अवश्य कर्म करता है लेकिन उससे अंतर की स्थिति मलिन नहीं होती। आकाश
बारिश से नहीं भींगता; अथवा कुण्ड के जल का सूर्य का प्रतिबिम्ब उससे गीला नहीं होता। उसी प्रकार
हरिकीर्ति-कीर्तन के घोष से जिसकी निष्कामदशा उज्ज्वल होती है, वे देहकर्म में विचरण करते हुए भी देह की
मलिनता से अलिप्त रहते हैं। अपने भक्तों का शरीर कर्म पुरुषोत्तम स्वयं चलाता है, इसलिये भक्तों को अच्छे-बुरे
कर्मों की बाधा नहीं होती। वास्तव में भक्तों के और अभक्तों के कर्म भगवान ही करता है; फिर भक्तों की ही