श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
जो व्यास का प्राण है, योगियों का मुकुटमणि है, वह श्रीशुक स्वयं श्रीकृष्ण के निर्वाण का निरूपण कर रहे
हैं। शुक्राचार्य कहते हैं, हे परीक्षित्! श्रीकृष्ण ने निजधाम के लिये प्रस्थान किया उस समय सारे देवतागण
विमानों में बैठकर अत्यन्त तीव्रता से वहाँ आये। ब्रह्मदेव द्रुत गति से आये। शंकर भी पार्वती को लेकर आये।
इन्द्रप्रमुख सारे देवतागण अपने गणों के साथ वहाँ आये। सनकादिक मुनियों की पंक्तियाँ तथा दक्ष आदि प्रजापति
भी वहाँ आये। अर्यमादि आदि पितर आये और कपिलादि महासिद्ध भी दौड़ते हुए आये। गन्धर्व और विद्याधर
आये। यक्ष, चारण, किन्नर तथा विभीषणादि बड़े-बड़े राक्षस भी श्रीकृष्ण को देखने के लिये दौड़ते हुए आये।
श्रीकृष्ण को देखने के लिये पाताल से नाग भी आये; जिन्हें 'महोरग' अर्थात् प्रचण्ड सर्प कहते हैं, वे भी शीघ्रता
से आये। दत्तात्रेय आदि द्विज आये। नारद भी कौतुक देखने आये। उसी प्रकार गरुड़ आदि पक्षी भी तत्परता से
एकत्र हो गये। रंभा, उर्वशी, मेनका आदि अष्टनायिका अप्सरा भी कृष्णदर्शन के हेतु वहाँ एकत्र हो गयीं।
कृष्णस्वरूप देखने की लालसा से देवताओं का समूचा समुदाय वहाँ एकत्र हो गया।
द्रष्टुकामा भगवतो निर्याणं परमोत्सुकाः ।
गायन्तश्च गृणन्तश्च शौरेः कर्माणि जन्म च ॥ ३ ॥
कृष्ण को देखने के लिये दृष्टि आतुरता से दौड़ रही थी। सर्वत्र गड़बड़ी मच गयी। कृष्णरूप की माधुरी
इतनी विलक्षण थी। अब पुनः कृष्ण का दर्शन कैसे होगा ? इसलिये कृष्ण का निर्वाण काल का दर्शन लेने के लिये
सारे देवतागण अत्यन्त आतुरता से वहाँ आये हुए थे। घनश्याम जैसी सुन्दर मूर्ति तो सौन्दर्य की पराकाष्ठा थी। उस
कृष्ण के निजधाम जाने पर फिर हमें दर्शन कब मिलेगा ? देवताओं को श्रीकृष्ण दर्शन की लालसा लगी हुई थी।
इसीलिए वे अत्यन्त शीघ्रता से दर्शन के लिये आये थे। कोई श्रीकृष्ण के कार्यों का वर्णन कर रहा था, तो कोई
उसके चरित्र के गीत गा रहा था, इस प्रकार सभी उनके दर्शन के लिये अत्यन्त आतुरता से आये थे।
ववृषुः पुष्पवर्षाणि विमानावलिभिर्नभः ।
कुर्वन्तः संकुलं राजन् भक्त्या परमया युताः ॥ ४ ॥
आकाश में चारों ओर विमानों की भीड़ लगी हुई थी। उनमें बैठे देवताओं ने श्रीकृष्ण को देखते ही उनकी
जय-जयकार की। श्रीकृष्ण को देखकर उनका अन्तःकरण भक्ति से आर्द्र हो उठा और उन सबने मिलकर
अनवरत पुष्पवृष्टि की। कृष्ण के चारों ओर फूलों का ढेर लग गया। उस समय साँवले सलोने श्रीकृष्ण की शोभा
अत्यन्त न्यारी लग रही थी।
भगवान् पितामहं वीक्ष्य विभूतीरात्मनोविभुः ।
संयोज्यात्मनि चात्मानं पद्मनेत्रे न्यमीलयत् ॥ ५ ॥
समस्त देवतागण तीव्र गति से वहाँ एकत्र हो गये। तब सामने ही खड़ा ब्रह्मदेव श्रीकृष्ण को दिखायी पड़ा
और अपनी ही जैसी विभूति शंकर को भी श्रीकृष्ण ने देखा। उसी प्रकार इन्द्रादि देवतागण, जो उनकी अपनी ही
विभूतियाँ थीं उन्हें देखकर श्रीकृष्ण ने अपनी पद्मपत्र जैसी पलकें सहज ही बन्द कर लीं। आँखें खोलीं, बन्द
कीं, लेकिन उसमें कोई परिवर्तन नहीं दिखायी दिया। वह आत्मस्वरूप से परिपूर्ण आत्मा ही था; फिर कृष्ण ने
आँखें क्यों बन्द कर ली थीं ? देवताओं का समुदाय देखकर कृष्ण ने कुछ बोले बिना आँखें बन्द कर लीं, उसका
कारण सुनिये। श्रीकृष्ण जब द्वारका में थे, उस समय बड़े-बड़े देवतागण प्रार्थना करने आये थे। उन्होंने देवकी