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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 863, कुल 869 में से

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पृष्ठ 863

इकतीसवाँ अध्याय
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सबसे छोटे बन जाते हैं, उन्हें ही भगवद् रस सहज ही चखने को मिलता है। ऐसे अगम्य योग का भण्डार, गूढ़
ज्ञान का गहन ज्ञान, परमसुख का सुखसार, अट्ठाईसवाँ अध्याय है। इस भोजन से जो लोग तृप्त हो गये, वही यह
समर्थ उन्नीसवाँ अध्याय है। उसका निरूपण अत्यन्त अद्भुत है। इस अध्याय का रहस्य यदि मन में बस जाय तो
पूरे भागवत का फल उसके पास दौड़ कर आयेगा। इस अध्याय में साध्य-साधनों की एकात्मता हो गयी है।
इसलिये अहंकार का नाश होकर वह परमानन्द की ढकार दे रहा है। पूरे भोजन की शोभा ताम्बूल और चन्दन है।
वही तीसवाँ और इकतीसवाँ अध्याय है। उसमें कृष्णनिर्वाण का आत्मज्ञान है। इस भोजन से जो तृप्त हो गये उन्हें
ममतापाश कभी बाधक नहीं बनता। इस प्रकार सारे कुल का संहार कर श्रीकृष्ण निजधाम चले गये। जिन्हें पूर्ण
ब्रह्मानुभव प्राप्त हुआ हो, उसमें अब तक ममता नहीं होनी चाहिये; यह प्रतीत कराकर श्रीकृष्ण निजधाम चला
गया। श्रीभागवत एक बड़ा खेत है। इसमें प्रमुख बीज धारण करने वाला है, ब्रह्मदेव ! क्योंकि आदिकल्प में
नारायण से इसे ही पहली बार चतुःश्लोकी भागवत का उपदेश हुआ था। नारद इस खेत का जमींदार है (क्योंकि
उसे ब्रह्मदेव से भागवत का उपदेश प्राप्त हुआ था।) उसने भी अद्भुत ढंग से बीड़ा बोये। उसमें श्री व्यास ने इस
प्रकार के लक्षण जोड़ दिये। इससे फसल बहुत ही अच्छी हुई। उससे स्वानंदबोध परिपक्व हुआ है। शुक वहाँ
रखवालदार बन गये। उन्होंने हरि कथारूपी गोफन फड़का कर पातकरूपी पक्षियों का अस्तित्व ही समाप्त कर
दिया। उद्धव ने एकादश स्कंध में उस फसल की कटाई की और कृष्णोक्ति से पछोड़े हुए स्वच्छ दाने एकत्र
किये। वहाँ नाना प्रकार की युक्ति-प्रयुक्ति से, प्रश्नों की मालिका से स्वादिष्ट पकवान तैयार किये। उनका माधुर्य
नित्य नूतन और अविनाशी है। उसकी वह अविनाशी मिठास एकादश स्कंध में प्रत्यक्ष प्रतीत होती है। इसलिये
उद्धव के ही साथ संसार पर भी उपकार हुआ है। उद्धव की पिछली पंक्ति में श्रवण के संकप लेकर बैठे परीक्षित
शुक के मुख से आत्मज्ञान से तृप्त होकर सन्तुष्ट हुआ। उन्हीं बड़ों की पंक्ति में श्रीधर भावार्थ दीपिका रूप दीपक
हाथ में ले कर पदरूपी पदार्थ दिखाकर आत्मज्ञान से तृप्त हुआ। उसमें देशी भाषा में एकनाथ कृपा की मक्खी
भी भोजन करके तृप्त हुई क्योंकि उसे कहीं भी कोई भी प्रतिबन्ध नहीं है। एकनाथ जनार्दन की दुलारी बिल्ली
है। भावार्थ दीपिका के प्रकाश से उसे यह उत्तम दिखायी पड़ा इसलिये वह थाली में पहुँची। "मियो मियो
कहकर क्या मैं आऊँ यह शब्द सुनते ही सज्जन प्रसन्न हो उठे और उन्होंने कृपाकर शेष प्रसाद देकर मुझे सन्तुष्ट
किया। एका जनार्दन का दास है अतः मैंने नम्रभाव धारण कर बिल्ली का रूप लिया और संतों का उच्छिष्ट
पत्तल चाट कर मैं पूर्णरूप से तृप्त हुआ। जो काया वाचा मन से सद्‌भक्ति से नम्र होता है, नीच के सामने भी नम्र
होता है—वही एकादश स्कंध का अधिकारी है, ऐसा जनार्दन का उपदेश है। जब तक ज्ञान का अभिमान रहता
है, जब तक मान-सम्मान की इच्छा रहती है, तब-तब एकादश स्कंध के ज्ञान से अपरिचय रहेगा ही। पूर्ण
सद्भावना से जब तक समस्त प्राणिमात्र में भगवद्भाव उत्पन्न नहीं हुआ, तब तक एकादश स्कंध का ज्ञान बिलकुल
समझ में नहीं आयेगा। इस प्रकार श्रीभागवतरूपी खेत में परम पवित्र फसल तैयार हुई है। जिन्हें समस्त प्राणिमात्र
के प्रति अपार आदर हो वही साधकजन यहाँ सुखी होंगे। एकादश स्कंध केवल खेत नहीं है, वह तो परिपूर्ण
चित्समुद्र है। इसमें जो जितना डूबेगा उतने ही अधिक चिद्रत्न वह प्राप्त करेगा। यह केवल एकादश स्कंध ही
नहीं, अपितु जीवरूपी गजेन्द्र के उद्धार के लिये हाथ में ज्ञानचन्द्र लेकर वेग से आये श्रीकृष्ण ही हैं। लेकिन इस
उपमा से भी एकादश स्कंध की महानता का वर्णन पर्याप्त नहीं हो पाता; बल्कि यह कहना उपयुक्त होगा कि
अहंकार रूपी हिरण्यकश्यपु का विदारण करने के लिये पूर्ण कृपालु और भक्तों का पक्षधर यह नरहरि ही प्रकट
हुआ है। या ऐसे कहें कि कृष्ण और उद्धव ये गंगा और यमुना हैं और ज्ञानधारा यह गुप्त सरस्वती है। अतः