श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 864, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें८४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
एकादश स्कंध को त्रिवेणी संगम का प्रयाग ही समझना चाहिये। यहाँ वैराग्यरूपी माघ मास में, श्रद्धा के
अरुणोदय के समय जो भी नित्य स्नान करेगा, वह पावन होकर पूर्ण कृष्ण-पद को प्राप्त करेगा। लेकिन यह
उपमा भी एकादश स्कंध के लिये उपयुक्त नहीं है। तो कृष्ण उद्धव का यह गुह्य संवाद साधकों के लिये लम्बे
समय बाद आने वाला कपिला षष्ठी का सुन्दर पर्वकाल है। इस पर्वकाल में जो डुबकी लगायेंगे उनका तत्काल
कल्याण होगा। उन्हें जन्म-मरण की बाधा नहीं होगी, वे स्वयं परिपूर्ण ब्रह्म होंगे। यह एकादश स्कंध नहीं,
अपितु एकतीस खण्ड का एक तुलसी वृन्दावन ही है; उसमें ज्ञानमंजरी के गुच्छे शोभा दे रहे हैं। उनमें जो अपना
जीवित जलरूप डालेगा, वे परमपावन होंगे और परिपूर्ण ब्रह्म होकर स्वानंदरूप कृष्ण सदन पहुँचेंगे। जो मूल के
उदक का वंदन करेंगे, जो मूल की मिट्टी लगायेंगे वे त्रिभुवन में वंद्य होकर उन्हें नित्य निजसखा कृष्ण की प्राप्ति
होगी। उसी प्रकार, हे सुजान परीक्षित ! जो भी कोई पठन के द्वारा प्रत्यगावृत्ति अर्थात स्वस्वरूपाकार वृत्ति के इस
वृन्दावन को सद्भावना से प्रदक्षिणा करेगा,' वे भी श्रीकृष्ण चरणों में रंग जायेंगे। जो इस कथा की विचित्र
लीलाओं की रंगोली इस तुलसी वृन्दावन के सामने नित्य सजायेंगे वे कलिकाल को भी जीतेंगे व उनके साथ
श्रीकृष्ण सदासर्वदा खड़ा रहेगा। इस एकादश स्कंध रूप वृन्दावन की जो श्रवणरूप से नित्य पूजा करेगा, उस पर
श्रीकृष्ण प्रसन्न होकर उसका देहाभिमान नष्ट करेगा। जो मनन की पुष्पांजलि (मंत्रपुष्प) नित्य त्रिकाल अर्पण
करेगा, वह भी आत्मनिष्ठा से हरि के पास पहुँचेगा। श्रीभागवतरूपी वृन्दावन के पास संत-सज्जनों को एकत्र
कर, इसकी कथा का जो निरूपण करेंगे वह वृन्दावन की निरपेक्ष महापूजा होगी। यह महापूजन देखकर श्री
जनार्दन सन्तुष्ट होगा और जो श्रोता-वक्ता सावधान रहेंगे उन्हें वह स्वयं आत्मज्ञान देगा। श्रवण से, पठन से,
मनन से तथा अर्थनिरूपण से एकादश स्कंध समान फल देगा। उसके मन में ज्ञाता और अज्ञानी के प्रति कोई भेद
नहीं है। यदि श्रवण, मनन अथवा पठन सम्भव न हो तो एकादश स्कंध की पुस्तक ही ब्राह्मण को दान में दें।
इससे विवेक ज्ञान उत्पन्न होगा। एकादश स्कंध का दान दें, एकादश स्कंध की पूजा करें अथवा केवल एकादश
स्कंध का स्मरण करें तो भी सारे पातकों का नाश होगा। एकादश स्कंध का जो संग्रह करता है, उसके घर में
श्रीकृष्ण का वास रहता है। एकादश स्कंध में जो श्रद्धा रखता है, उसमें ज्ञान अपने आप प्रवेश करता है। जिसके
मुख से इसके श्लोकों का, आधे श्लोक का अथवा एक चतुर्थांश श्लोक का नित्य स्मरण होता है, वह भी परम
पवित्र होता है। इस प्रकार एकादश स्कंध अत्यन्त उदार है। किसी काम के लिये जाते समय यदि अकस्मात भी
एकादश स्कंध पर दृष्टि पड़ जाये तो सारे पातक भय के मारे भाग जाते हैं। एकादश स्कंध जिसके हाथ में हो,
उसे देवतागण भी प्रणाम करते हैं। वह स्वयं सारे संसार का उद्धार कर सकता है। एकादश स्कंध का इतना
माहात्म्य है। सारे पुराणों में एकादश स्कंध एक वनकेशरी (सिंह) है वह एक श्लोकार्ध में ही, क्षणभर में
संसाररूपी गज का विदारण कर देता है। 'मामेकमेवशरणं' (अ० १२, श्लोक १७) इस श्लोक का पठन करने
से, वह माया का गला दबाकर भय से ही संसार को नष्ट देता है। 'निरपेक्षं मुनि शांत' (अ० १४, श्लोक १६)
यह श्लोक यदि अंतःकरण में बस गया तो उस भक्त की कृष्ण भी सेवा करता है, फिर संसार का भय कहाँ
रहेगा ? एकादश स्कंध का प्रत्येक श्लोक भवबंध को काटने वाला है। जिसमें साक्षात श्रीकृष्ण ही वक्ता हैं, उसमें
किसी एक को ही अच्छा कैसे कहा जा सकता है ? श्रीभागवत में एकादश स्कंध ही मोक्ष का स्थान है। इसलिये
आधे श्लोक से भी संसार बंधन का पूरी तरह नाश होता है। श्रीकृष्ण वेदों का जन्मस्थान है और निरूपण उसके
मुख से निकला है। इसलिये सारे वेदों का अर्थ स्वयमेव ही यहाँ अपने मैके आया है। इसलिये एकादश स्कंध में
वेदार्थ मैके में रहकर सुखी हो गया है। वे साधक को स्वानंदस्वरूप सम्पूर्ण परमार्थ देते हैं। वेदशास्त्रों का मंथन कर