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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 861, कुल 869 में से

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पृष्ठ 861

इकतीसवाँ अध्याय
८४५

सके इसलिये कृष्णकीर्तिका विस्तार किया है। ऐसी परमपावन भगवान की कीर्ति का श्रीभागवत में विस्तार से
वर्णन हुआ है। उसमें दशमस्कंध की श्रीकृष्ण की कीर्ति तो अत्यन्त मधुर है। दीनजनों के तरने के लिये श्रीकृष्ण
नित्य नूतन दिन बढ़-चढ़ कर अपनी कीर्ति का प्रसार करते हैं। नट का वेश धारण कर श्रीकृष्ण ने अवतार लिया
था। उसके अनुसार उसने प्रतिदिन नाना प्रकार के चरित्रों का अभिनय किया। उसका बालचरित अत्यन्त मधुर,
सुन्दर और पवित्र है। उसमें अखाड़े में मल्लों का गर्व हरण करने का चरित्र परम पावन है। जरासंध को पराजित
कर, कालयवन का नाश कर श्रीकृष्ण ने अद्भुत चरित्र दिखलाया है। रण में रुक्मिया को दुर्गत कर तथा
शिशुपालादि वीरों का दमन कर कृष्ण ने रुक्मिणी का हरण किया। वह लीला भी परम पावन है। पटरानियों का
विवाह, भौमासुर का संहार, पारिजातक का हरण, सोलह सहस्र स्त्रियों का पाणिग्रहण, समुद्र में द्वारका की बस्ती
बसाकर रातों रात किसी की निद्रा को भंग किये बिना पूरी मथुरा वहाँ ले आये, यह कृष्ण की लीला अघटित ही
हे। बछड़े और गोपाल बनकर उसने अपना पूर्णत्व प्रकट किया, ऐसा कृष्ण पूर्णरूप से अवतारी है, यह
ब्रह्मादिदेवताओं को भी नहीं मालूम हुआ। सब्जी का एक पत्ता खाकर समस्त ऋषि समुदाय का तृप्त किया। ऐसे
ज्ञानप्रधान तथा परमपावन चरित्रों का उसने निर्वाह किया। कृष्ण की ऐसी लीलाएँ अद्भुत हैं। वह पठन करने
वालों को पुनीत करती हैं। वह साद्यंत कथा दशम स्कंध में कही गयी है। एकादश स्कंध उससे अलग है। उसमें
मूल से ही परम पद की प्राप्ति है। ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और मुक्ति इनके बारे में श्रीकृष्ण ने अपने मुख से बताया
है। पहले अध्याय में नारद और वसुदेव का संवाद तथा वैराग्य पूर्णरूप से भरा हुआ है। वही साधकों की
भूमिशुद्धि अर्थात् स्थान का चयन है। उसमें निमिजायंत का सवांद निर्भयस्थान कौन सा है? उत्तम भागवत कौन
है ? माया और उससे तरना, कर्म और ब्रह्म आदि जनक के नौ प्रश्नों के सम्पूर्ण उत्तर, वही जमीन की जुताई है।
प्रश्नोत्तर रूप हल से खेत जोत कर तैयार किया। छठवें अध्याय में देवताओं ने श्रीकृष्ण की प्रार्थना की, उस
समय कृष्ण कुलक्षय के अन्त में निजधाम के लिये प्रयाण करेगा, इस बात को ध्यान में रखकर उद्धव ने जो खेद
प्रकट किया, उसने कल्पनाकाश का निर्दलन कर विकल्प के पत्ते तोड़ दिये। काम और लोभरूपी गुप्त खूँट
भीतर रह गये थे, वे अवरोध उत्पन्न करने लगे। उन्हें तीव्र अनुताप से समूल उखाड़ कर समतल भूमि तैयार की।
क्रोध की मोटी जड़ें थीं उन्हें शान्ति ने समूल उखाड़ दिया। उद्धव स्वरूप चातक का दुःख हरण करने के लिये
श्रीकृष्ण ने कृपारूपी मेघ की जलवृष्टि की। इससे सारा खेत अच्छी तरह गीला हो गया और तत्काल आत्मज्ञान
की वाष्प तैयार हो गयी। फिर पूर्ण ब्रह्मरूपी बीज, व्यर्थ के तन्तु, रस्सी आदि सब छोड़कर केवल कर्णरूपी नली
से श्रीकृष्ण ने स्वयं बोये। इसके उपरान्त यदु अवधूत संवाद के रूप में चौबीस गुरुओं की उपपत्ति सुनायी। यही
उस खेत के चारों ओर खोदा हुआ खंदक है ताकि कोई जानवर खेत में न घुस सके। इसके बाद जब फसल
पकने लगी तब वहाँ फसल का नाश करने वाली चिड़ियों को श्रीकृष्ण ने दसवें अध्याय में भजनरूपी गुलेल से
उड़ा दिया। अर्थात् उन सभी मतों का खण्डन किया। ग्यारहवें अध्याय में मुक्त के हस्त से ज्ञाताओं को तिलगुड़
के साथ ज्वार के भुट्टे, गेहूँ की बालियाँ तथा बजरे का परमल खिलाया। उस वैभव के भोक्ता यहाँ सत्संगति करने
वाले भगद्भक्त हैं, ऐसा बारहवें अध्याय में कृपापूर्वक बतलाया। विषयों की विषयावस्था साधक के चित्त को
बाधक न हो ऐसी कथा तेरहवें अध्याय में सुनायी। इस प्रकार तेरहवें अध्याय में फसल पूरी तरह पक गयी। वही
हंसगीत का निरूपण और समाधि श्रीकृष्ण ने बतायी। उस समाधि में एकत्र फसल साधकों को कैसे प्राप्त हो ?
इसी उद्देश्य से भजनपूर्वक चौदहवाँ अध्याय सुनाया। वह फसल हाथ में आते-आते ऋद्धि-सिद्धि बीच में ही
झपट्टा मार कर ले जाती हैं इसलिये उन्हें टालने का उपाय पन्द्रहवें अध्याय में बताया। वह फसल पूरे त्रिभुवन में