श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 847, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंइकतीसवाँ अध्याय ८३१
पुत्र श्रीकृष्ण से आदरपूर्वक बिनती की थी कि हम दासों की ओर कृपा की दृष्टि से देखें (अर्थात् हमारा रक्षण
करें) समस्त देवताओं का समुदाय, स्वर्लोकादि लोकपाल ये सब तुम्हारे दास हैं इसलिये निजधाम जाते समय
एक बार हमारे यहाँ आकर हमारे आश्रम को पवित्र करें। उन सब देवताओं को श्रीकृष्ण ने अपने मुख से बताया
था कि यादवकुल का क्षय होने के बाद, अन्त में मैं इस मार्ग से अवश्य आऊँगा। श्रीकृष्ण का भाषण सुनकर सारे
देवताओं को अत्यन्त आनन्द हुआ था; वे समझ गये कि श्रीकृष्ण हमारे वश में हैं, इसीलिये उन्होंने हमारा वचन
अस्वीकार नहीं किया। उस दिन का स्मरण कर इस मौके का लाभ उठाने के लिये देवताओं का समुदाय यहाँ
आया था। उनका वह अभिमान उतर जाने के लिये ही श्रीकृष्ण ने आँखें बन्द कर ली थीं। देवताओं का समुदाय
बहुत बड़ा है, मैं किसके-किसके यहाँ जाऊँ? उनको छकाने के लिये ही भगवान ने आँखें बन्द कर समाधि
लगाने का अभिनय किया। कृष्ण परिपूर्ण परब्रह्म ही था। उसके लिये न समाधि है, न व्युत्थान है। उसने समाधि
लगाने का केवल अभिनय किया। योगियों को स्वच्छंद मृत्यु रहती है लेकिन श्रीकृष्ण की स्थिति वैसी भी नहीं
थी। शंकरादि देवताओं को भी उसकी गति अतर्क्य थी। वही स्थिति शुक्राचार्य परीक्षित को बताते हैं।
लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमङ्गलम्।
योगधारणयाऽऽग्नेय्यादग्ध्वा धामाविशत् स्वकम्॥ ६॥
जो योगी लोग कलिकाल को भी जीत कर इच्छा मृत्यु प्राप्त करते हैं, वे पूर्णरूप से अग्निधारणा कर,
अपना देह जलाकर स्वरूप में मिल जाते हैं। जैसे घृत पिघलता है, उसी प्रकार जो सगुण है वह निर्गुणत्व प्राप्त
करता है। इसी को 'योगाग्निधारण' कहते हैं। कृष्ण देह दहन कदापि नहीं होगा। श्रीकृष्ण का स्वरूप परिपूर्ण
था। वह योगधारणा क्यों करेगा? उसका देह लीलाविग्रही था। तो फिर दहन किसका किया जाय? उसे आँखों से
देखना ही पर्याप्त है, ध्यान वहीं लग जाता है। मन उसी में लगा रहता है। कृष्ण का सौन्दर्य परिपूर्ण तथा संसार
को मोहित करने वाला है। जिसके सौन्दर्य का दर्शन कर मदन स्वयं गर्भ में आ गये थे, चैतन्यघन श्रीकृष्ण के
चरणों को देखकर लक्ष्मी भी मोहित हो गयी थीं। योगी सदा जिसका ध्यान करते रहते हैं, शंकर आदि भी
जिसका नित्य चिंतन करते हैं; ऐसे सर्व-मंगल का जो अधिष्ठान है, वही चैतन्यघन श्रीकृष्ण है। श्रीकृष्ण स्वयं
आत्माराम होने के कारण वह संसार को भी आराम ही दिलाने वाला है। वह लीलाविग्रही घनश्याम ध्यानगम्य
और चिद्रूप है। जमे हुए घृत की जैसे मूर्ति बनायी जाय, उसी प्रकार चैतन्य में ढली हुई कृष्णमूर्ति स्वलीला से
बनी हुई थी। इसीलिये जब उस देह ने दावाग्नि प्राशन किया, तो उस पर कालिया सर्प के विष का असर नहीं
हुआ क्योंकि वह देह था ही नहीं। फिर उसे मृत्यु कैसे आयेगा? कृष्ण जिसके हृदय में प्रकट होता है, वह देह में
होते हुए भी विदेही हो जाता है, ऐसे उस कृष्ण में देहत्व कैसे होगा? कृष्ण का देह नष्ट नहीं हुआ; दर्पण का
प्रतिबिम्ब जिस प्रकार स्वयं में विलीन हो जाता है, उसी प्रकार जो भास था वह मूल स्वरूप में मिल गया।
जिसका नामस्मरण करते ही भक्तों का जन्म-मरण समाप्त हो जाता है, वह कृष्ण ही यदि मर जायेगा तो भक्तों
का उद्धार कौन करेगा? आत्ममाया की लीला से कृष्ण, कृष्ण के रूप में प्रकट हुआ था, वह लीला छोड़कर
निजरूप में निजत्व में स्थिर हो गया। कृष्ण देह को न ले गया, न छोड़ गया। उसने लीला से ही उसे भक्तों के
ध्यान में रखा और स्वयं निजधाम चला गया। जैसी भक्त की श्रद्धा होती है, वैसा ही भगवान होता है। इसलिये
देखो! वह भक्त के ध्यान में ही अपना देह स्थापित कर, निजधाम न जाकर ही चला गया। कृष्ण की मूर्ति यद्यपि
सगुण साकार थी, लेकिन उस देह का दहन होना सम्भव नहीं था क्योंकि सारा संसार ही श्रीकृष्ण के आश्रय में