श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 849, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंइकतीसवाँ अध्याय ८३३
मेघमण्डल में बिजली कड़कती है, लेकिन वह कहाँ से आती है और कहाँ जाती है, यह जिस प्रकार
पृथ्वी पर के लोगों को नहीं मालूम होता; उसी प्रकार कृष्ण की अवतार शक्ति भी देवताओं को नहीं मालूम हुई।
वैकुण्ठ से आना और वापस जाना यह कृष्ण को सम्भव ही नहीं है क्योंकि वह सदा-सर्वदा परिपूर्ण भरा ही हुआ
है। आकाश में बस्ती करने के लिये जिस प्रकार खाली मकान नहीं मिलेगा, उसी प्रकार श्रीकृष्ण परमात्मा सर्वत्र
व्याप्त होने के कारण उसे दूसरी ओर जाने के लिये कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार श्रीकृष्ण निजधाम गया।
उसकी महिमा अत्यन्त अद्भुत है। कृष्ण की महत्ता अतर्क्य होने के कारण उसके सम्बन्ध में तर्क नहीं चलता
यह सोचकर देवतागण अपने-अपने गंतव्य स्थान की ओर चल दिये।
ब्रह्मरुद्रायस्ते तु दृष्ट्वा योगगतिं हरेः।
विस्मितास्तां प्रशंसन्तः स्वं स्वं लोकं ययुस्तदा ॥ १० ॥
"हम अपने सामर्थ्य से माया के नियंता हैं। योग की दुर्गम गति हमें मालूम है, हम त्रिभुवन में सर्वद्रष्टा
अर्थात् सर्वज्ञ हैं।" इस प्रकार का अहंकार देवताओं में था। कृष्ण की गति देखकर उनकी जानकारी पानी पानी
हो गयी। लज्जा से अहंकार चूर-चूर हो गया। तब उन्होंने कृष्ण की स्तुति करना प्रारम्भ किया। शंकर पाँच मुखों
से स्तुति करने लगा। ब्रह्मदेव चार मुखों से कीर्ति का वर्णन करने लगा। कृष्ण की अगम्य गति देखकर समस्त
देवतागण आश्चर्यचकित रह गये। श्रीकृष्ण की स्तुति करके देवताओं को संतोष ही नहीं हो रहा था। वे उसी
प्रकार उनकी कीर्ति का वर्णन करते-करते अपने-अपने लोक चले गये। पहले कृष्ण की जो गति बतायी थी उसी
को अत्यन्त प्रेमपूर्वक, स्पष्ट करके श्रीशुकाचार्य पुनः परीक्षित को सुनाते हैं।
राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहा मायाविडम्बनमवेहि यथा नटस्य।
सृष्ट्वाऽऽत्मनेदमनुविश्य विहृत्य चान्ते संहृत्य चात्ममहिमोपरतः स आस्ते ॥ ११ ॥
राजा परीक्षित! सुनो। श्रीकृष्ण इन सारे कारणों का कारण था। वह माया की भी चेतनाशक्ति था। जिसे
व्यक्तित्व नहीं है और वर्ण नहीं है, जिसे रूप नहीं है और गुण भी नहीं है, उस श्रीकृष्ण ने अपनी लीला से ही
यदुवंश में अवतार लिया था। जो सारे वंश का मूल पुरुष, जो गोत्रों का गोत्रज, जो सारे जातियों की जाति, वही
यह श्रीकृष्ण स्वयं सबका आदिस्थान है। यदुवंश में उसका जन्म, अथवा गोवर्धन पर्वत उठाना आदि कर्म, उसी
प्रकार स्वकुल का क्षय, अथवा स्वयं का निर्वाण, यह सारा योगमाया का खेल है। उसी की सत्ता से उसने मत्स्य
कूर्मादि अवतार लिये। अन्त में उसी सत्ता से वह श्वेतवराह भी बना। श्रीकृष्ण की यह योग्यता अतर्क्य है।
श्रीकृष्ण केवल अवतार ही नहीं, अपितु वह तो चित्स्वरूप पूर्णब्रह्म है। उसका चरित्र अत्यन्त अतर्क्य, वह
ब्रह्मदेव, शंकर आदि के भी समझ में नहीं आता। जिस प्रकार दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, उसी प्रकार
यदुवंश में कृष्ण का जन्म हुआ। दर्पण में जिस प्रकार व्यक्ति के हाव-भाव दिखायी देते हैं, वैसे ही श्रीकृष्ण के
कर्म थे। हाथ से दर्पण गिरा दें तो जिस प्रकार सामने का प्रतिबिम्ब नष्ट हो जाता है; उसी प्रकार कृष्ण का निधन
मिथ्या और मायिक है। जिस प्रकार बहुरूपिया अनेक प्रकार के वेश धारण करता है और फिर उसे उतार देता है,
लेकिन बहुरूपिया नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार श्रीकृष्ण का अवतार था। यदुवंश में कृष्ण का जन्म हुआ था, फिर
भी वह सारे कर्मों से अलिप्त ही था। सृष्टि, स्थिति और अन्त होने पर भी वह नित्यमुक्त ही था। उसमें परम
अद्भुत ऐसे क्या होगा? किसी से किसी भी प्रकार की सहायता लिये बिना कृष्ण स्वयं ही सृष्टि की उत्पत्ति
करता है; उसका उचित प्रतिपालन करता है और फिर उसका संहार कर स्वयं शेष रहता है। कृष्ण उत्पत्ति,