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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 852, कुल 869 में से

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पृष्ठ 852

८३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अतर्क्य है। उस गति से ऊँची कोई गति ही नहीं है। इसीलिये ज्ञाता वेदशास्त्र में उसे 'परा पदवी' कहते हैं। कृष्ण
की इस 'परमपदवी' का जो कोई भक्तियुक्त भावना से, शुद्ध अंतःकरण से, नित्य नियमपूर्वक प्रातःकाल पठन
करेगा; भक्तियुक्त हृदयकमल में जो इन श्लोकों की जपमाल करेगा और नित्य नियमपूर्वक प्रातःकाल जिह्वाग्र पर
रखेगा, जो प्राण रहने तक इस नियम को भंग नहीं करेगा, वह उत्तमत्व प्राप्त करेगा। कृष्ण की इस उपाधि का
गायन करने से चारों मुक्तियाँ चरण छुएँगी। उनकी भी उपेक्षा कर वह स्वयं कृष्ण उपाधि तक निश्चित रूप से
पहुँचेगा। ये चौदह श्लोक वास्तव में चौदह विद्याओं का जन्मस्थान है। उनका जो प्रातःकाल पठन करेगा, वह
पूर्ण रूप से कृष्ण उपाधि तक पहुँचेगा। ये चौदह श्लोक भुवनों का जीवन है। उनका नियमपूर्वक पठन करने से
कृष्ण की पूर्ण उपाधि अवश्य प्राप्त होगी। ये चौदह श्लोक चौदह पदों का गयावर्जन है। उनका नियमपूर्वक पठन
करने से विष्णुपद पर पिण्डदान करने का फल प्राप्त होता है। (जीव को शिवपद का समाधान प्राप्त होता है) ये
चौदह श्लोक चौदह इन्द्रों के जीवों का जीवन है। उनका नियम से पठन करने से हम इन्द्रों के भी इन्द्र बन जाते
हैं। ये चौदह श्लोक वास्तव में चौदह काण्डों का पूर्ण वेद ही है। उसका नियमपूर्वक पठन करने से वेद पठन का
समाधान प्राप्त होता है। इनका नियमपूर्वक पाठ करने से संसार के गुण, कर्म, वर्ण आदि का निराकरण होकर
पूर्ण ब्रह्म प्राप्त होता है। प्रातःकाल इसका नियमपूर्वक पठन करने से परिपूर्ण ब्रह्म प्राप्त होगा और जो इसका
त्रिकाल पाठ करेगा वह तो अपने ही देह से कृष्णस्वरूप बन जायेगा और जो इसके पठन के अलावा इसके अर्थ
पर विचार करेगा वह स्वयं श्रीकृष्ण ही हो जायेगा। श्रीकृष्ण की उपाधि उसकी दासी बनकर रहेगी। कृष्ण
उपाधि (अर्थात् कृष्ण का निर्वाण वृत्तांत) के श्रवण, पठन और अर्थ से भी साधकों को पूर्ण ब्रह्म प्राप्त होता है,
यही परमार्थ सिद्धि का गूढ़ निरूपण है। इसमें अधिक साधना की भी आवश्यकता नहीं है, अनायास ही ब्रह्मज्ञान
की प्राप्ति होती है। श्रद्धा से तथा नियमपूर्वक पठन करने से कृष्ण की पूर्ण उपाधि प्राप्त होती है। तक्षक के भय
से मुक्त होने के लिये तथा देह में रहकर विदेहता प्राप्त करने के लिये यह अत्यन्त सरल उपाय है ऐसा शुक्राचार्य
ने परम कृपा से परीक्षित को बताया। जो नियमपूर्वक इसका पठन करेगा उसे पूर्णब्रह्म की प्राप्ति होगी, ऐसी
शुक्राचार्य की पूर्ण प्रतिज्ञा है। इतना सुलभ उपाय होते हुए जो उस पर श्रद्धा नहीं रखेगा वह अविद्या का घरजमाई
होकर रहेगा और उसका संसार डूब जायेगा। वह अविद्या का गुलाम, विषयों में पला हुआ श्वान सदा अहंकार
के गड्ढे में बैठकर भौंकता रहेगा। उन मूर्खों की बात न करो। इससे मिला हुआ आनन्द कम हो जायेगा। कहने
का तात्पर्य यह है कि इन श्लोकों के पठन से परब्रह्म की भेंट होती है। कृष्ण की इस निजानंद उपाधि का वर्णन
करने में मैं दीन असमर्थ हूँ। लेकिन जनार्दन ने कृपापूर्वक यह निरूपण मुझसे कराया। एका (जनार्दन) की शरण
में है। श्रीकृष्ण उपाधि का निरूपण इस एकादश स्कंध का कलश है। उसे व्यासजी ने पूर्ण कराया। यह निरूपण
समाप्त हुआ यह जनार्दन की पूर्ण कृपा है। इस प्रकार श्रीकृष्ण निजधाम चले गये। वहाँ का वृत्तांत शुक्राचार्य
परीक्षित को बताते हैं।
दारुको द्वारकामेत्य वसुदेवोग्रसेनयोः।
पतित्वा चरणावस्रैर्न्यषिञ्चत् कृष्णविच्युतः ॥ १५ ॥
दारुक ने द्वारका की ओर देखा तो वह प्राणहीन प्रेत की तरह अथवा पदच्युत राजा की तरह कलाहीन
दिखायी देने लगी। रस निचोड़ने के बाद जिस प्रकार ऊख दिखायी देता है; अथवा जिस प्रकार दाना के बिना
भूसा दिखायी देता है, उसी प्रकार कृष्ण के बिना द्वारका भी चारों ओर से उदास दिखायी देने लगी। दारुक