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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 860, कुल 869 में से

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पृष्ठ 860

८४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किया। केशों में फूलों के गुच्छे खोंस कर वृक्षों का उद्धार किया। ऐसा कृष्ण पूर्णब्रह्म होने के कारण सभी दृष्टियों
से तारक ही है। कृष्णावतार पूर्ण ब्रह्म था। उसका लीलाचरित्र ज्ञानप्रधान था। उसमें भी उसका बालचरित्र परम
पावन है। वह सर्वत्र ज्ञानियों के लिये वन्दनीय है। षड्गुणों का वैभव लेकर श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था। यश,
श्री, औदार्य, कीर्ति, ज्ञान और वैराग्य की स्थिति उसके पास अक्षय थी। अन्य अवतारों में ये गुण पूर्ण रूप में नहीं
थे। किन्तु कृष्णावतार परिपूर्ण ब्रह्म होने के कारण ये सारे गुण उसमें पूर्णरूप से प्रकट हुए थे। इसलिये
कृष्णावतार छहों गुणों से सम्पन्न था। इसलिये उसकी संगति से सभी का सदासर्वदा उद्धार हुआ। कृष्ण की संगति
से उद्धार हुआ हो, या कृष्ण की मूरत देखकर लोग तर गये हों इनमें कोई आश्चर्य नहीं है। लेकिन इस
कृष्णकीर्ति का ही गायन कर कितनों का उद्धार हो गया उनकी कोई गिनती नहीं है। अभी भी श्रद्धालु लोगों का
उद्धार हो ही रहा है। इच्छापूर्वक कृष्ण कीर्ति का गायन करने से सद्गति का लाभ होता है; और जिसे परा कहते
हैं, वह चौथी भक्ति घर चल कर आती है। आर्त, जिज्ञासु तथा अर्थार्थी इनकी स्थिति तो सहज रहती ही है,
लेकिन श्रीकृष्ण कीर्ति का स्वयं गायन करने से अखण्ड चौथी भक्ति प्रकट होती है, विषयों के प्रति अपने आप
ही विरक्ति उत्पन्न होती है और शमदम भी सहज ही चरण चूमते हैं। कृष्ण कीर्ति का जो निरन्तर जप करता है,
उसके पास श्रीकृष्ण सदा निवास करते हैं। श्रीकृष्ण की कीर्ति का भक्तिभाव से जप करने से समस्त प्राणिमात्र में
श्रीकृष्ण प्रकट होता है और परमात्म स्थिति के साथ चौथी भक्ति अपने आप हृदय में स्थापित हो जाती है। उस
भक्ति में पूज्य और पूज्यक दोनों श्रीकृष्ण ही रहते हैं। अर्थात् पूजा, अर्चना आदि सारे उपचार भगवान् स्वयं ही
हो जाता है। इत्र, गंध (पुष्प), धूप, दीप आदि सब कुछ श्रीकृष्ण स्वयं ही बन जाता है। स्वयं ही स्वयं को
भजना यही चौथी भक्ति का लक्षण है। चौथी भक्ति का स्वरूप यही है कि भोग्य और भोक्ता श्रीकृष्ण स्वयं ही
होने के कारण भक्त और श्रीकृष्ण में क्षणार्ध के लिये भी अलगाव नहीं होता। उस समय भक्त का देह, घर, द्वार
सब कुछ श्रीकृष्ण ही बन जाता है। जिस स्वरूप में कभी च्युति नहीं है, वह निश्चित रूप से कृष्ण स्वरूप ही
है। कृष्ण की कीर्ति वर्णन करने से भक्त स्वयं तद्रूप होकर रहते हैं। कृष्णकीर्ति का प्रत्येक अक्षर वेदों का
आत्मलिंग है। हे परीक्षित्! कृष्ण चरित्र सभी शास्त्रों का परमसार है। वेदों का जन्मस्थान, सकल शास्त्रों का
समाधान, षड्दर्शनों का ज्ञान अथवा समन्वय यही श्रीकृष्ण का आठवाँ पूर्णावतार है। हरि के ऐसे अनंत अवतार
हुए हैं किन्तु कृष्णावतार यह ज्ञानघन अवतार है। उसका चरित्र अत्यन्त पवित्र तथा भवबंधन नष्ट करने वाला है।
हे नृपनाथ! उस कृष्णकीर्ति का सादर स्मरण करने से संसारबन्धन की सचमुच ही समाप्ति होती है।
श्रीकृष्णकीर्ति के साथ वैभव रहता है, श्रीकृष्ण कीर्ति के पास वैराग्य रहता है; जिनके मन में श्रीकृष्ण की कीर्ति
रहती है वे कलिकाल से भी भयभीत नहीं होते। यदि आलस में भी कृष्णमूर्ति का स्मरण करें तो भी सारे पातक
भस्म हो जाते हैं। कृष्ण की कीर्ति का जो सदासर्वदा गायन करते हैं, उनके पास चारों मुक्तियाँ दासी बनकर रहती
हैं, श्रीकृष्ण कीर्ति का एक अक्षर भी महापातकों की राशि भस्म कर देता है। वह मोक्ष दिलाकर, उदारतापूर्वक
संसार का उद्धार करने वाला है। भगवान ने अनेक अवतार लिये हैं, लेकिन इस अवतार की बात निराली है।
इसकी सारी लीला ज्ञानप्रधान है। इसका रहस्य अगम्य है, वह ब्रह्मादिक देवताओं की भी समझ में आने लायक
नहीं है। जन्म से ही जो कर्म किये, वे सब एक से एक अद्भुत थे। नित्य नया चमत्कार और ब्रह्मसुख का सुकाल
कर दिया। अवतारों में केवल श्रीकृष्ण ही निश्चित पूर्ण ब्रह्मस्वरूप है। उसके ज्ञानधन चरित्र के पठन से लोग
पवित्र होते हैं। इस प्रकार कृष्णकीर्ति पावन है। उसका पठन करने से पाठकों का उद्धार होता है और श्रद्धापूर्वक
श्रवण करने वाले भी संसार सागर तर जाते हैं। कलियुग में लोग मंद बुद्धि होंगे। उसका सुगम रीति से निदान हो