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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 853, कुल 869 में से

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पृष्ठ 853

इकतीसवाँ अध्याय ८३७
राजमहल में पहुँचा, उस समय वसुदेव और उग्रसेन को देखते ही उसकी आँखों से आँसू झरने लगे। उसके हृदय
का बाँध टूट गया और उसने चीख कर उनके पैर पकड़ लिये। कृष्ण के वियोग से दारुक के अश्रु संतप्त हो उठे
थे। उन आँसुओं से वसुदेव के पैर भी जलने लगे। वह पेट-फाड़ कर रोने लगा। उस दुःख से उसका हृदय
फटना चाहता था। उसकी जिह्वा सूखने लगी थी, गला भर आया था, मुँह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे। दुःख
में व्याकुल दारुक की यह अवस्था देखकर द्वारका के सारे लोगों के तो प्राण ही सूख गये। देवकी और रोहिणी
भी घबरायी हुई वहाँ आयीं और वहाँ का कोलाहल देखकर कृष्ण की स्त्रियाँ भी वहाँ आ पहुँचीं। रनिवास की
सारी स्त्रियाँ और पुरुष दौड़ते हुए वहाँ आ पहुँचे और सभामण्डप में एकत्र हो गये। देखा तो दारुक फूट-फूटकर
रो रहा है। सभी का हृदय बैठ गया। फूट-फूट कर रोने से उसकी साँस रूक जा रही थी। कृष्ण के वियोग की
वार्ता बताते हुए वह बेहोश होकर गिर पड़ा। तब वसुदेव और उग्रसेन ने उसके पास जाकर उसे सांत्वना दी और
क्या हुआ है इसके बारे में उत्कंठा व्यक्त की। तब दारुक बताने लगा।
कथयामास निधनं वृष्णीनां कृत्स्नशो नृप।
तच्छ्रुत्वोद्विग्नहृदया जनाः शोकविमूर्च्छिताः ॥ १६॥
दारुक ने कहा, पहले आप सब लोग अर्जुन को लेकर भागिये। यहाँ एक भी क्षण के लिये न रुकिये। सारे
यादव मर गये हैं। यादवों ने प्रभास क्षेत्र में जाकर यथाविधि तीर्थविधि किया। ब्राह्मणों को दान दिया। भोजन
कराया और फिर मद्यपान प्रारम्भ किया। मद्य से उन्माद उत्पन्न हुआ और यादवों के मित्र, भाई आदि में परस्पर
युद्ध होकर सारे कुल का अन्त हो गया। यादव किसी भी शस्त्र से न मरते लेकिन वहाँ एक अपूर्व चमत्कार हुआ
और वह यह कि वे सब एरिका से मारे गये। बलराम ने देह त्याग किया; श्रीकृष्ण निजधाम गये, और आप सब
एक क्षण के लिये भी द्वारका में न रहें यह कहने के लिये मुझे यहाँ भेजा है। श्रीकृष्ण ने द्वारका छोड़ी अब समुद्र
उसे तत्काल डुबो देगा। इसलिये कृष्ण ने ही आपको यहाँ से तुरन्त जाने के लिये कहा है। दारुक का यह भाषण
सुनते ही द्वारका में हाहाकार मच गया। उग्रसेन सिर पीटने लगा और वसुदेव भी सिर पीटने लगा। कोई हाथ पर
हाथ रगड़ने लगा, कोई छटपटाने लगा, कोई चीख-चीख कर रोने लगा तो कोई बेहोश होकर जमीन पर गिर
पड़ा। रोते-रोते किसी का गला सूखने लगा, कोई फूट-फूटकर रोने लगा; किसी का कलेजा फटने-फटने को हो
आया, सभी का दुःख चरमसीमा पर पहुँच गया। कोई जोर-जोर से रो रहा था, कोई छाती पीट रहा था, कोई
कान और बाल खींच रहा था तो कोई दुःख में पागल हो गया था। कोई जोर से चिल्लाने लगा, तो कोई मुँह के
बल गिरने लगा, कोई मछली की तरह तड़पने लगा। नर नारी हो हल्ला करने लगे, घर-घर शंख ध्वनि होने
लगी, सबका दुःख एक जैसा था, फिर कौन किसे सांत्वना देता? देवकी और रोहिणी बेहोश होकर जमीन पर
गिर पड़ीं। फिर उठकर जोर-जोर से विलाप करने लगीं। देवकी कहने लगी, हे कृष्ण! हमारे विश्रामदाता! हे
कान्हा! क्यों रूठे हो? तुम्हारे पैरों पर गिरती हूँ। तुम मेरे सहकारी हो, यहाँ मुझे अँधेरे में छोड़कर तुम कहाँ चले
गये? कंस और केशी को जीत कर हमें कारावास से बाहर निकाला और अन्त में मुझे यहाँ छोड़कर मेरे साथ
ठगी की? मृत पुत्रों को भी तुम वापस ले आये और मुझे सुखी किया और अन्त में मुझे यहाँ छोड़ दिया? तुम
इतने निष्ठुर कैसे हो गये? मेरे पुत्र कृष्णराया! कान्हा! शीघ्र आओ। क्या मैंने तुम्हें दूध नहीं पिलाया इसलिये
रूठ गये हो? तुमने जिसका स्तनपान किया, वह यशोदा ही दीन हो गयी है। तुम्हारा मुख देखे बिना उसके प्राण
भी कैसे बचेंगे? कृष्ण! आओ बेटा! दौड़कर आओ। चारों हाथों से मुझे आलिंगन दो। अरे! मैं तुम्हारे मुख का