श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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भी नहीं समा पाती। उसके संग्रह कितने हैं उनके सम्बन्ध में विभूति के रूप में श्रीकृष्ण ने सोलहवें अध्याय में
बताया। इस खेत के अधिकारी यहाँ चार आश्रम और चार वर्ण हैं; अतः सत्रहवें और अठारहवें अध्याय में उनके
विभागों के बारे में बतलाया। उन्नीसवें अध्याय में बताया कि फसल काटकर अनाज प्राप्त करने के लिये जिस
छिलके से अनाज तैयार हुआ है उसे पछोड़ कर अलग करना चाहिये। फिर अनाज के जो दाने अपने हिस्से में
आये हों उन्हें हमें सुरक्षित रखना चाहिये क्योंकि गुणदोषरूपी चोर अनाज चुराकर ले जाते हैं। अनाज सभी को
मिलता है लेकिन चोरों के भय से वे खा नहीं पाते। उन चोरों ने बड़े-बड़े लोगों को हानि पहुँचायी है। इसलिये
उसकी अच्छी तरह सुरक्षा करनी चाहिये। गुणदोषों की बात विचित्र-सी है। वे चोर हमसे मिल-जुल कर, स्नेह
दिखाकर सब कुछ ठग कर ले जाते हैं। एक दाना भी हाथ में नहीं आने देते। गुण-दोष अत्यन्त बलवान हैं,
ज्ञानियों का तो वे निश्चित रूप से छल करते हैं। उन गुणदोषों का जो संहार करता है वही त्रैलोक्य में बलशाली
है। यह उपदेश उद्धव ने सुना तो उसने तत्काल ही कहा, इन चोरों को आश्रय देने वाला तो आपका वेद ही है।
उसी की सहायता से ये गुणदोष बढ़े हैं। तुम्हारा वेद ही खराब है। वही मुख्य चोरों का वाड़ा है। उसी में
गुणदोषों ने आश्रय लिया है। वही हर प्रकार की चिहुल सिखाता है। इस प्रकार गुणदोषों का पालन-पोषण कर
वेद ही सबको लूटता है, ऐसी स्थापना वेद के सम्बन्ध में उद्धव ने की। लेकिन वेद की बात में दुष्टता नहीं है
ऐसा प्रत्येक शब्द में स्पष्ट कर दिया है। वही इक्कीसवाँ अध्याय है। चोर किस मार्ग से आते हैं, किस रास्ते
फसल ले जाते हैं उन रास्तों को ही बन्द करने के लिये तत्व संख्या का विचार बाईसवें अध्याय में बताया।
मुख्यरूप से ज्ञान का संरक्षण करने के लिये दृढ़ शान्ति ही कारण है। उसी भिक्षुगीत का निरूपण श्रीकृष्ण ने
किया। प्रमुख चोर की चुराने की प्रवृत्ति मन में रहती है। इसी मनोजय का लक्षण ही तेईसवें अध्याय का
निरूपण है। चोर जहाँ जन्म लेता है, वह प्रकृति ही झूठी है इसलिये पकी हुई फसल को लूट कर वे
अन्त में उसी में छिप कर बैठ जाते हैं। आदि भी निर्गुण और अहं भी निर्गुण; बीच ही में उत्पन्न प्रकृति के तीन
गुण होते हैं, इसलिये मुख्य फसल को उससे बचाना चाहिये। यही निरूपण चौबीसवें अध्याय में किया गया है।
खेत में फसल पड़ी हो फिर भी पशु, पक्षी अथवा चोर उसमें प्रवेश न कर सकें ऐसी सहज सुरक्षा का उपाय
निर्गुणोक्ति ने पचीसवें अध्याय में बताया। स्त्रीभोग की इच्छा प्रबल होने पर पूरा अनाज नष्ट हो जाता है, जहाँ
राजा पुरूरवा नष्ट हुआ वहाँ औरों की क्या बिसात है? काम की आसक्ति से जो पूर्णरूप से स्त्रियों के मोह जाल
में फँसते हैं उन्हें पश्चात्ताप से छुटकारा मिलता है, इसी का छब्बीसवें अध्याय में निरूपण हुआ है। निरोग फसल
प्राप्त होने पर भी उसकी पाक क्रिया जानना आवश्यक है। इसलिये कर्मयोग का स्वरूप सत्ताईसवें अध्याय में
प्रकट किया गया है। इस प्रकार पूरी फसल हाथ में आने पर भी उसके स्वादिष्ट पकवान की विधि आनी
चाहिये। ऐसे सरस अमृत फलों का वर्णन अट्ठाईसवें अध्याय में किया गया है। वे पकवान इतने मृदु, मधुर और
कुरकुरा होते हैं कि उसके सुवास से ही भोजन करने वाले तृप्त हो जाते हैं और उसका ग्रास मुँह में डालना ही
काफी है, अंतर्बाह्य नित्य तृप्ति ही हाथ लगती है। तब इच्छा के अनुसार भूख शांत होती है, सुख पर भी तृप्ति
सुख का आवरण रहता है अपने माधुर्य के कारण अपूर्व वह अट्ठाईसवाँ अध्याय है। इस अध्याय का माधुर्य इतना
अनूठा है कि उसे चखने के लिये ब्रह्मदेवादि देवता भी छटपटाते रहते हैं। यह भोजन जिसके बिना खाया जाता
है, रसना के बिना उसका माधुर्य चखा जाता है। अदंत के दाँत गिराकर ही स्वयं उसे चखना पड़ता है। श्रीकृष्ण
की कुशलता इसमें है कि उसने उद्धव को थाल बनाया। एकनाथ जनार्दन चरण की मक्खी बनकर उस रस का
आस्वाद ले रही है। जहाँ बड़ों-बड़ों का प्रवेश नहीं हो पाता, वहाँ मक्खी आराम से चली जाती है। सारांश, जो