श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्थिति और लय करता है, उसकी यह महत्ता संसार में प्रत्यक्ष दिखायी देती है। कृष्ण सारे कर्म करके भी सदा
अविकारी रहता है। कभी भी विकारी नहीं होता। वह प्रत्येक प्राणिमात्र का अंतर्यामी है। संसार के सारे कर्मों का
कर्ता होते हुए भी वह अकर्ता और स्वस्वरूप से विदेही ही था। ऐसे श्रीकृष्ण की महिमा अगाध है। शिव, इन्द्र
और ब्रह्मदेव भी उसकी थाह नहीं पा सकते। उसका देह ही विदेह रूप था। उसी योग से वह निजधाम गया,
इसी अवतार में कृष्ण ने देह में विदेह कर्म दिखला दिया। यह तुम्हें पहले बता ही दिया है और भी बताता हूँ,
सुनो। उसने सात दिन तक अपने हाथ पर गोवर्धन पर्वत उठाकर इन्द्र का घमण्ड चूर कर दिया था। स्वयं
दावाग्नि प्राशन कर अग्नि को लज्जित किया और रासक्रीड़ा करके मदन का गर्व भी शान्त कर दिया। समुद्र को
पीछे हटा कर अपनी द्वारका नगरी बसायी और निद्रा भंग किये बिना सारी मथुरा द्वारका ले आये। सब्जी का पत्ता
खिलाकर सारे ऋषियों को तृप्त किया और अपने अंतर्यामी होने का लक्षण दिखला दिया। इसी देह से वह बछड़े
और उसका पालन करने वाला गोपाल बना और ब्रह्मदेव को लज्जित कर उसका अहंकार नष्ट किया।
मर्त्येन यो गुरुसुतं यमलोकनीतं त्वां चानयच्छरणदः परमास्त्रदग्धम्।
जिग्येऽन्तकान्तकमपीशमसावनीशः किं स्वावने स्वरनयन्मृगयुं सदेहम्॥ १२॥
श्रीकृष्ण ने इसी देह से यमलोक जाकर यम का निग्रह कर मृत गुरुपुत्र को वापस लाया। उत्तरा के गर्भ में
ब्रह्मास्त्र की महाशक्ति से तुम जल रहे थे, ऐसी स्थिति में श्रीकृष्ण ने अपने चक्र से तुम्हारा संरक्षण किया।
तुम्हारा संरक्षण करने का कारण यही था कि तुम्हारी माँ उसकी शरण में चली गयी और कृष्ण शरणागत की रक्षा
करने वाला है तथा भक्तों का संकट दूर करने वाला है। द्वारका में अर्जुन ने यादवों के सामने प्रतिज्ञा की थी कि
षष्ठी के दिन द्विज के पुत्र का मैं संरक्षण करूँगा। लेकिन वह लड़का उसी रात सदेह अदृश्य हो गया। तब उस
ब्राह्मण ने अर्जुन की भर्त्सना की। इससे अर्जुन को लज्जित होना पड़ा। इससे कृष्ण के मन में दया का उदय हुआ
और वह भक्त की सहायता के लिये आ पहुँचा। अर्जुन को लेकर कृष्ण रथ में बैठा और क्षीरसागर की ओर चल
पड़ा। वहाँ नारायण के पास उस ब्राह्मण का पुत्र था, उसे द्वारका लाया। इस प्रकार श्रीकृष्ण भक्त का संकट स्वयं
दूर करते थे। श्रीकृष्ण प्रताप की महिमा अलौकिक है और भी सुनो। बाणासुर की सहायता करने शंकर युद्ध
करने आया, उस समय कृष्ण ने नंदी, भृंगी, वीरभद्र तथा कार्तिक स्वामी आदि के साथ शंकर को पराजित
किया। उग्र से भी उग्र, भयंकर से भी भयंकर कालाग्निरुद्र को पराजित कर बाणासुर की भुजाओं का भार कम
कर दिया। कृष्ण का वचन भी अगाध है। जिसने महान अपराध किया था, उस जरा व्याध को अपने वचन पर
दृढ़ रह कर देह के साथ स्वर्ग भेज दिया। इतना सामर्थ्य जिस श्रीकृष्ण के पास था, क्या वह अपना देह बचाने में
असमर्थ था ? लेकिन उसके देह में देहत्व था ही नहीं। वह निजात्म रूप से निजधाम गया। इतना सामर्थ्य होते
हुए वह निजधाम क्यों गया ? उसी देह से इस लोक में रहने में क्या उसे किसी का भय था ? ऐसा विकल्प
तुम्हारे मन में शंका उत्पन्न कर सकता है। तो सुनो। श्रीकृष्ण के मन में लोकाभिमान जरा भी नहीं था। उसकी
स्थिति स्वेच्छा की थी। (अर्थात् अन्य जीवों की तरह कर्म परतंत्र नहीं था।)
तथाप्यशेषस्थितिसम्भवाप्ययेष्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक्।
नैच्छत् प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं मर्त्येन किं स्वस्थगतिं प्रदर्शयन्॥ १३॥
माया तथा उसके सत्त्वादि तीनों गुणों का कारण स्वयं श्रीकृष्ण हैं। अनादित्व के कारण उसका कोई कारण
नहीं है। अनंतकोटि ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति, स्थिति और लय करके भी वह अलिप्त ही रहता है। श्रीकृष्ण में अनेक