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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५७
'एष स्वयंज्योति' का अर्थ यह है कि परमात्मा स्वप्रकाशघन है और साधक भी परमात्मा से अभिन्न होने
के कारण तद्रूप ही है। आत्मा अपने पूर्णत्व से ही परिपूर्ण है; उसे निराली माता, पिता कहाँ से होंगे? इसलिये
आत्मा को जन्म की बात ही नहीं है। त्रिगुणों के तीन प्रकार के मल समूल मिथ्या अर्थात् मायिक हैं। उनका
आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं होता। इसलिये आत्मा निर्मल है। अब उसे 'अप्रमेय' क्यों कहते हैं, यह सुनिये।
उसके सम्बन्ध में कोई प्रमाण नहीं बताया जा सकता। काला, गोरा, साँवला, नीला, सफेद, पीला अथवा यहाँ,
वहाँ, दूर, पास, इन सारे प्रमाणों से अलग ही परमात्मा है। 'महानुभूति' इस पद का अर्थ—आत्मा अखण्ड
दंडायमान अर्थात् सर्वव्यापी, अपने आत्मस्वरूप में ही समसमान तथा सदा-सर्वदा स्वानंदघन है। यहाँ देश, काल
वर्तमान, ध्येय, ध्याता, ध्यान अथवा ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञान; यह भी सच नहीं रहता। नाम, रूप, जाति, गोत्र और
क्रियाकर्म आदि से अलिप्त रहने वाला, उसे जन्म और मरण किसका? आत्मावस्तु सर्वदा स्वानंदपूर्ण ही रहती
है। वहाँ वृद्धि और ह्रास या आदि-मध्य-अन्त का खेल अथवा परिणामादि विकार आदि का भी प्रवेश नहीं
होता। तुम कहोगे कि पहले बताये हुए धर्म इसमें कैसे प्रवेश नहीं करते? तो 'सकलानुभूति' इस पद से
आत्मवस्तु सर्वोपरि अलिप्त है यह बताया गया है ऐसा समझना चाहिये। इस प्रकार धर्म और अधर्म, तथा
प्राणिमात्रों का क्रिया कर्म इनका प्रकाश मैं आत्माराम ही हूँ। श्रेष्ठ परमात्मा इससे भी अलिप्त है। घर के गंगाजल
को अथवा मद्य को आकाश का आवरण रहता है, लेकिन वह दोनों से ही अलिप्त रहता है। इस प्रक्रार परमात्मा
भी ज्ञान-अज्ञान से अलिप्त रहता है। जहाँ ज्ञान-अज्ञान का ही अभाव है, वहाँ कर्माकर्म को कहाँ स्थान है? इसी
का नाम है 'सकलानुभूति' यहाँ स्वानंद के कारण भेदभाव नहीं है। ऐसा परमात्मा परमानंदरूप है। इसमें
सजातीय, विजातीय तथा स्वगत का भेदभाव नहीं है। इस प्रकार आत्मवस्तु शुद्ध होती है, यह प्रसिद्ध ही है यह
आत्मज्ञान से जानना चाहिये। मैं देह हूँ यह कहना 'विजातीय भेद' है। मैं जीव हूँ यह कहना 'सजातीय भेद' है
और मैं ब्रह्म हूँ इस बात का स्फुरण यह 'स्वगत भेद' है। ये तीनों ही भेद परमात्मा को नहीं मालूम हैं। वहाँ युक्ति
प्रयुक्ति लक्षण की आवश्यकता नहीं होती। ब्रह्म परिपूर्ण एवं एक है। ऐसा एक ही अद्वितीय परब्रह्म आत्मगुह्य का
गुह्य है। जो इसे जान ले वह बहुत भाग्यवान है। उसे संसार भ्रम की बाधा नहीं होगी। देह में रहने पर भी उसे
देह की बाधा नहीं होती। उन्हें कर्माचरण भी कमी बाधक नहीं होता और जन्म-मरण की भी बाधा नहीं होती।
ऐसे ज्ञान के बारे में सुनकर यदि तुम उसे स्पष्ट करने को कहो तो उसे करने में वाचा समर्थ नहीं है। शब्दों के
साथ श्रुति भी पीछे हट जाती हैं। जहाँ विवेक सम्पन्न बुद्धि भी प्रवेश नहीं कर सकती, चंचल होने के कारण मन
भी जहाँ पहुँच नहीं पाता, वह परब्रह्म वाणी के अधीन कैसे रह सकता है? अर्थात्, कभी नहीं होगा। शास्त्रों की
व्युत्पत्ति समाप्त हो गयी, दर्शन अभी तक वाद-विवाद ही कर रहे हैं; श्रुति भी 'जहाँ नेति नेति' - न इति
कहकर थक गयी वहाँ वाणी क्या करेगी? वह भी ठहर गयी। जिज्ञासा की उत्कंठा से शब्द ज्ञान ने पहल की।
लेकिन परब्रह्म का एक भी नाम लेने के लिये ज्ञान कम पड़ा। इस प्रकार अच्छी तरह विचार करने पर परादि
वाणी भी उसका उच्चार नहीं कर सकी। इसीलिये यह ब्रह्म परात्पर और क्षर-अक्षर से परे है। वह सदा सभी
अवयवों से शून्य लेकिन अन्त में स्वयं भी शून्य है। शून्य का प्रकाशक चित्स्वरूप परब्रह्म भी एकत्व से परिपूर्ण
है। वहाँ प्रवेश करने के लिये अनेक प्रकार की युक्तियाँ चलायी लेकिन जिस प्रकार सूर्योदय होते ही जुगनूँ
अदृष्य हो जाते हैं उसी प्रकार वे चिदाकाश में लुप्त हो गयी। जुगनूँ यदि सूर्य से गले मिल सकता तो ब्रह्म भी
वाचा के हाथ लग जाता है। आत्मवस्तु के आगे शब्दों का सारा पांडित्य लुप्त हो जाता है। सूर्योदय हो जाने पर
जुगनू जिस प्रकार खोजने पर भी नहीं मिलता उसी तरह आत्मवस्तु जब हाथ में आ जाती है तब शब्दों का

७५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। अँधियारी रात में जो दीपक से काम चलाते हैं, वे सूर्योदय होने पर दीपक को
त्याग देते हैं। उसी प्रकार साधक शाब्दिक ज्ञानयुक्ति से, अनुतापयुक्त अंतःकरण से ब्रह्म का विचार करते हैं,
लेकिन जिन्हें ब्रह्मप्राप्ति हो चुकी है, वे शब्द की उपेक्षा करते हैं। जैसे-जैसे शब्दों का अभिमान बढ़ता है, वैसे-
वैसे ब्रह्मज्ञान दूर भागता जाता है। उद्धव, उसका भी लक्षण बताता हूँ, सुनो। जब वर को कन्या देनी होती है तो
माता, पिता, बन्धु, ज्योतिषी तथा इष्टमित्रों से मिलकर वह कन्या वर को अर्पण करते हैं। किन्तु पति के साथ
एकान्त के समय माता, पिता और रिश्तेदारों की उपस्थिति उसके लिए पति सुख में व्यवधान उपस्थित करती है।
उसी प्रकार योग्यता, चातुर्य, शब्द ज्ञान आदि होने पर ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। जिस प्रकार
आँख में एक कण भी सहन नहीं होता, उसी प्रकार ब्रह्म में भी कल्पना सहन नहीं होती। इसलिये निर्विकल्प
भाव से देखने पर ही शुद्ध ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जब सारे ज्ञान का अन्त और सारे भाषणों का जहाँ विराम
होता है, तभी परब्रह्म की प्राप्ति होती है, ऐसा श्रीकृष्ण ने बताया। जिसका बुद्धि से आकलन नहीं होता, वह मन
को कभी प्राप्त नहीं होता, जो शब्द का विषय ही नहीं है वहाँ प्रमाण के कदम नहीं बढ़ते। इस प्रकार आत्मवस्तु
किसी उपाय से नहीं प्राप्त होती इसलिये वह वस्तु ही नहीं है, ऐसा यदि तुम मन में विचार कर रहे हो, तो उसके
बारे में सुनो। मूल श्लोक का पद—'येनेषिता वागसवश्वशति', अर्थात् देह, इन्द्रिय और प्राण ये जड़मूढ़ और
अचेतन हैं; उन्हें चिद्रूप आत्मा ही चैतन्य प्रदान करतां है। उसका भी लक्षण सुनो। आत्मा के प्रकाश से ही दृष्टि
प्रकाशित होती है लेकिन आत्मा दृष्टि को स्पर्श भी नहीं करता, दृष्टि में भीतर और बाहर आत्मा ही रहता है,
लेकिन वह अदृश्य होने के कारण दिखायी नहीं देता। आत्मा की सत्ता से ही कान श्रवण करते हैं, लेकिन उस
कान को आत्मा स्पर्श नहीं करता। कान के भीतर और बाहर व्याप्त होने पर भी आत्मा श्रवण का विषय नहीं
बनता। आत्मसत्ता से ही वाणी प्रकट होती है लेकिन वाणी के शब्दों को आत्मा स्पर्श नहीं करता। शब्द के आगे-
पीछे आत्मा भरा रहता है लेकिन उस शब्द को आत्मा का अनुभव नहीं होता। आत्मसत्ता से ही मन चपल है;
मन के भीतर और बाहर आत्मा है लेकिन वह मन को बिलकुल स्पर्श नहीं करता। आत्मा को मन नहीं जान
पाता। चैतन्य ही चित्त को जागृत करता है, चित्सत्ता से ही चित्त में चिन्तन उत्पन्न होता है; चित्त के भीतर-बाहर
परिपूर्ण चैतन्य ही रहता है; फिर भी उस चित्त को चैतन्य मालूम नहीं होता। आत्मा के संयोग से 'अहं' उल्हसित
होता है लेकिन उस अहंता को आत्मा कभी स्पर्श नहीं करता। अहंता के अंतर्बाह्य आत्मा रहता है लेकिन वह
अहंकार को दिखायी नहीं देता। आत्मप्रभा के प्रकाश से ही विवेकबुद्धि प्रकाशित होती है; बुद्धि के भीतर और
बाहर आत्मा रहता है लेकिन बुद्धि आत्मा को नहीं पहचानती। आत्मा की प्रभा से ही प्राण चालित होता है, फिर
भी प्राण को आत्मा स्पर्श नहीं करता। प्राण के भीतर-बाहर आत्मा रहता है लेकिन प्राण परमात्मा को नहीं
पहचानता। उद्धव तुम इस प्रकार देखने का प्रयत्न करो। जिसके योग से जड़ व्यवहार कर रहा है, वह आत्मा
स्वतः सिद्ध ही होता है। वह नहीं है, ऐसा कल्पांत में भी नहीं हो सकता। इस प्रकार आत्मा स्वतःसिद्ध है। भेद
में रमण कर अभेद ही रहता है, द्वंद्व प्रकाशित करके भी निर्द्वंद्व रहता है। इस आत्मज्ञान को दृढ़ करना चाहिये।
सारांश आत्मा निर्द्वंद्व और अद्वैत है, वह है या नहीं यह कहने के लिये भी कोई नहीं बचता क्योंकि आत्मा
आत्मस्वरूप से परिपूर्ण है। आत्मा सदा आत्मस्वरूप में ही रहता है, व्यर्थ ही उस पर सांसारिक होने का आरोप
लगा है। इस विषय में श्रीकृष्ण अगले श्लोक में बता रहे हैं।
एतावानात्मसम्मोहो यद् विकल्पस्तु केवले।
आत्मन्नृते स्वमात्मानमवलम्बो न यस्य हि॥ ३६ ॥

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५९
आत्मा नित्यमुक्त है, तीन गुणों से परे है; सर्वदा परिपूर्ण ही रहने के कारण वह आकाश से भी अत्यन्त
अलिप्त रहता है। ब्रह्म अखण्ड दण्डायमान होकर सदा सर्वदा आनन्दघन है। ऐसी अलिप्त वस्तु पर प्रपंच का
आरोप मिथ्या है। उस आरोप का अधिष्ठान भी स्वयं परमात्मा ही है। इसलिये प्रपंच का भान होता है। प्रपंच को
परमात्मा से अलग कोई स्थान ही नहीं है; इसलिये उत्पत्ति, स्थिति और लय का भी वहाँ भास होता है। रस्सी
वाला सर्प रस्सी से अलग नहीं दिखायी देता लेकिन वह रस्सी सर्प नहीं बन जाती, फिर भी वहाँ सर्प का आभास
होता ही है। उसी प्रकार ब्रह्म पूर्व निर्विकल्प है। उसे रूप, नाम, गुण, कर्म आदि स्पर्श भी नहीं करते। फिर भी
मन का भ्रम विषम प्रपंच की कल्पना करता ही है। जिस प्रकार रस्सी में मिथ्या सर्प का आभास होता है, उसी
प्रकार ब्रह्म में संसार का मिथ्या आरोप होता है। अर्थात्, उसमें सुख, दुःख, भय, कम्पन यह प्रयास भी मायिक
ही है। सारांश प्रपंच का भास मिथ्या है, आत्मवस्तु शुद्ध एवं आनन्दमय है। उसी प्रकार ब्रह्म परिपूर्ण एवं अद्वय
है, ऐसा निरूपण से स्पष्ट हुआ है। इस प्रकार अनेक युक्तियों से ब्रह्म की अद्वयता अबाधित रूप से सिद्ध की।
जो पण्डित यह नहीं मानते उनके मत का श्रीकृष्ण खण्डन करते हैं।
यन्नामाकृतिभिर्ग्राह्यं पञ्चवर्णमबाधितम्।
व्यर्थेनाप्यर्थवादोऽयं द्वयं पण्डिमानिनाम्॥ ३७॥
इस प्रकार वेदों द्वारा प्रतिपादित, सभी शास्त्रों का मतिमार्थ जो ब्रह्म है वह सदासर्वदा अद्वय ही रहता है यह
मैंने सिद्ध करके दिखला दिया। मेरे इस मत को पण्डित लोग झटक कर, अपने ज्ञान में अत्यन्त उन्मत्त होकर
अपने पांडित्य के अभिमान में चूर हो जाते हैं। उनका मत है कि जब प्रपंच अनुभव सिद्ध है, तो उसे मिथ्या
मानकर यह अद्वैत कहाँ से निकल आया? अद्वैत को स्थान ही नहीं है, कहीं भी जाकर देखिये, अद्वैत का कोई
निश्चित ठिकाना नहीं है। इसलिये वह सारा झूठ है। ये पण्डित लोग रूप, नाम, गुण, कर्म विषम से पंचमहाभूत
और भौतिक, चातुर्वर्ण्य और चार आश्रम ये सत्य हैं, ऐसा मानते हैं। इन्हें सत्य मानने का कारण यह है कि ये मन
के भ्रम से भ्रमित हुए रहते हैं, ज्ञानाभिमान के कारण फँस जाने के कारण वे अपने आप को ही भूल जाते हैं। वे
विषय के सुख को प्रमुख मानते हैं और उसके लिये उत्कृष्ट पुण्य कमाकर स्वर्ग का भोग अवश्य करना चाहिये
यही सत्य है, ऐसा मानते हैं। विषय को बिलकुल सच मानना यह देहाभिमान का असली मर्म है। उसने संज्ञान
लोगों को अधम बनाकर जन्म-मरण भोगने को बाध्य किया है। पुनः स्वर्ग, पुनः नरक, पुनः गर्भवास, इस प्रकार
पण्डित लोगों के अहंकार ने पठत मूर्ख बना दिया है। उनका ज्ञान वेदबाह्य होने के कारण बिलकुल ग्राह्य नहीं है।
अंत्यजों का अन्न जिस प्रकार अग्राह्य है, उसी प्रकार उनका ज्ञान भी अत्यन्त त्याज्य है। ज्ञानाभिमानी लोगों का
विचार अज्ञान का शुद्ध सार है। उनका जो दृढ़ निश्चय है वह सचमुच महामोह है। उनका विवेक इन्द्रायण फल
जैसा है, ऊपर से देखने में सुन्दर किन्तु भीतर विष से भरा हुआ। प्रपंच नामरूपात्मक है, मायिक होने के कारण
वह मिथ्या है यह बिलकुल सच है किन्तु ज्ञानाभिमानी उसे ही सच मानकर व्यर्थ की कचकच करते रहते हैं।
प्रपंच की रचना को यदि सत्य मानें तो 'मैं देह हूँ' यह बुद्धि माथे पर बैठ जाती है और दारिद्र्य में गिराती है।
उनकी योग्यता देखें तो उनका वेदपठन बिलकुल गायत्रीतुल्य रहता है। सारे शास्त्र, श्रुति, पुराण, इतिहास सब
कुछ उन्हें अवगत रहता है, उत्कृष्ट वक्तृत्त्व और समय-सूचक भाषण करने में पारंगत होने के कारण वह
अहंकार से फूल जाता है। अद्वैत का समाधान उन्हें मालूम नहीं होता फिर भी योग्यता का अहंकार कम नहीं
होता। ऐसे अहंकारी पण्डितों की बात गरीब अज्ञजनों को नहीं सुननी चाहिये क्योंकि देहाभिमान से जिन्हें लूट

७६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
लिया है ऐसे लोगों के सौजन्य से भी अधःपतन होता है। विष खानेवालों की पंक्ति में जो पुरुष अन्न की आशा से
बैठेगा उसे, बिना बुलाये ही मृत्यु का निमंत्रण प्राप्त हो जायेगा। इसलिये ऐसे लोगों की संगत नहीं करनी चाहिये,
उनसे बात भी नहीं करनी चाहिये; उनके घर कभी नहीं जाना चाहिये, जीवभाव से उनका त्याग ही करना
चाहिये। उनके मुँह नहीं लगना चाहिये, उनके मार्ग पर नहीं चलना चाहिये, जो ज्ञान के अभिमान में भूल जाते
हैं, वे अपने हित से वंचित हो जाते हैं। उन्हें अपने घर नहीं जाना चाहिये, स्वयं उनके घर नहीं जाना चाहिये। जो
अभिमान से लुट जाते हैं, उनसे कोई बात नहीं करनी चाहिये। उनसे बाजार में भी नहीं मिलना चाहिये; उन्हें
आँखों से देखना भी नहीं चाहिये; धर्मशील मनुष्य के लिये जिस प्रकार परनिंदा त्याज्य है, उसी प्रकार उसे भी
पूरी तरह त्याज्य समझना चाहिये। वेदशास्त्रों का मतितार्थ अद्वैत परमार्थ जो स्वार्थ सिद्ध करने वाला है, उसे जो
नहीं पसन्द करते हैं, उनके यहाँ अनर्थ विचरता रहता है। इसीलिये उनकी संगत से दूर रहना चाहिये। अब
साधकों के योग का स्वरूप और उसमें आने वाले विघ्नों की निवृत्ति श्रीकृष्ण बताते हैं।
योगिनोऽपक्वयोगस्य युञ्जतः काय उत्थितैः ।
उपसर्गैर्विहन्येत तत्रायं विहितो विधिः ॥ ३८ ॥
योगी योगाभ्यास प्रारम्भ करता है तो उसके पूर्ण होने के बीच अनेक प्रकार के विघ्न उसे कष्ट देते हैं।
शरीर में कोई रोग ही उत्पन्न होता है; अथवा विषय का विकार खलबली मचा देता है; अथवा जल्दीबाजी या
भ्रान्ति के कारण संकट आता है; या विकल्प उत्पन्न होकर ही योग का भंग होता है। अथवा ज्ञान का अहंकार ही
बहुत बढ़ जाता है जिससे दूसरों के गुणदोषों की कुचेष्टा करना यही एकान्त में बात करने का विषय बन जाता
है। कभी देह में शीत बढ़ जाता है या ऊष्मा बढ़ जाती है; प्राणवायु गलत राह पकड़ लेता है या क्षुधा अधिक
बार लगने लगती है। कभी कल्पना का भय तथा प्रकाश दर्शन आदि विघ्न उपस्थित हो जाते हैं अथवा पराया
धन और परस्त्री का चस्का लग जाता है। इस प्रकार के अनेक उपसर्ग आते हैं। उन्हीं के निवारण के लिये
श्रीकृष्ण उपाय बताते हैं।
योगधारणया कांश्चिदासनैर्धारणान्वितैः ।
तपोमन्त्रौषधैः कांश्चिदुपसर्गान् विनिर्दहेत् ॥ ३९ ॥
देह में ठंडक बढ़ने पर, अग्निधारण करने से उसका निवारण होता है; देह में उष्णता बढ़ने पर सोमधारणा
करने से वह दूर होती है। अकस्मात् वायु वाममार्ग पर चला गया हो तो देह में वायु भर लेना चाहिये, वायु में
वायु मिलने पर, अभ्यास से वह पूर्व स्थिति पर आ जाता है। कभी-कभी जब वायु का क्षोभ बढ़ कर उसका
दबाव पेट पर होता है, तब क्षुधा अत्यन्त बढ़ जाती है, कभी खाने से तृप्ति नहीं होती। ऐसे समय प्राणवायु का
उत्सर्ग कर अपानवायु को अन्दर करें। वह जठर की ओर आता है तो क्षुब्ध हुआ प्राणवायु सहज ही उधर ही
आता है। उस समय साधक को प्राण और अपान की एकता सहज ही प्राप्त होती है; फिर षट्चक्र भेद कर
निकलने में क्षणभर का समय भी नहीं लगता। तब साधक को सत्रहवीं को अमृतपान करने का अवसर प्राप्त
होता है। इस प्रकार योगी क्षुधा की बाधा को समाप्त कर देते हैं। अब हे उद्धव! परद्रव्य और परस्त्री पर आसक्ति
होना, पापों का फल है। उसका निवारण करने के लिये तपश्चर्या ही एकमेव साधन है। भक्तिभाव से मंत्रों का
अनुष्ठान करने से वैराग्य उत्पन्न होता है; उस वैराग्य से साधक की विषयवृत्ति का सहज ही निर्दलन होता है।
शुद्ध मंत्रों का पुरश्चरण सभी विघ्नों का नाश करता है। उससे पिशाच बाधा का भी समूल विनाश होता है। शरीर

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७६१
में व्याधि का प्रवेश होने पर दिव्यौषधि उसका संहार करती है; उसी प्रकार मन की व्याधि दूर करने के लिये
निश्चयपूर्वक योग की साधना करें। योगसिद्धि साध्य होने से आधिव्याधि समूल नष्ट हो जाती है। उसी प्रकार
उद्धव! वह योगसिद्धि अन्य भी कई विघ्नों का नाश करती है। ये भिन्न-भिन्न उपाय कितने बतायें ? भक्तिभाव से
मेरा ध्यान करने पर सारे विघ्नों का नाश होता है। उसी का निरूपण श्रीकृष्ण करते हैं।
कांश्चिन्ममानुध्यायेन नाम संकीर्तनादिभिः ।
योगेश्वरानुवृत्त्या वा हन्यादशुभदाञ्छनैः ॥ ४० ॥
उद्धव! मेरा क्षण भर ध्यान करने से ही आधि-व्याधि सहित सारे विघ्न, विकल्प, विकर्म, देहाभिमान तथा
ज्ञानाभिमान आदि सारे भस्म हो जाते हैं। मेरा ध्यान करने की आदत डालने से सभी उपसर्ग धीरे-धीरे भाग जाते
हैं, खोजने से भी विघ्न नहीं दिखायी देता। साधकों के लिये सारी सृष्टि निर्द्वंद्व हो जाती है। सारे विघ्नों का
अभाव होकर विकल्प अपने आप ही नष्ट हो जाते हैं। अब तुम पूछोगे कि आसन लगाकर कब बैठा जाय ? मन
को कब एकाग्र किया जाय ? इतना करके भी जब तुम्हारा ध्यान मन में बसेगा तभी तो विघ्नों की बाधा होगी ?
तो सुनो! मेरा ध्यान भी मन में न बसता हो तो दूसरा आसान उपाय है। वह यही है कि मेरा नामकीर्तन करो।
हरिनाम से भी विघ्नों का नाश होता है। जहाँ नाम की घड़घड़ाहट होती है वहाँ विघ्नों को रास्ता ही नहीं मिल
पाता। मेरे नाम की कीर्ति जिसके मुख में अखण्ड बस्ती करती है, उसे देखकर सारे विघ्न भाग जाते हैं। समस्त
उपसर्गों का नाश हो जाता है। मेरे नाम का गजर महापातकों का संभार भगा देता है। विघ्नों के लिये स्थान ही
नहीं छोड़ता। हरि के नाम में इतना सामर्थ्य है। भूल कर भी मेरा नाम ले लेने से वह समस्त पातकों को भस्म
कर देता है। फिर जहाँ मेरे गुण नाम-कर्म का अखण्ड गायन चल रहा हो वहाँ विघ्नों का स्पर्श भी नहीं होगा।
जिसकी वाणी मेरे नाम की विरुदावली गाती हो, उसके सामने विघ्न उसी प्रकार नहीं आते, जिस प्रकार सूर्य के
सामने अन्धकार नहीं आ पाता। इस लोक में मेरी नामकीर्ति के अलावा जिसका मुँह खाली नहीं रहता, वह जिस
प्रकार पतंगे को अग्नि जलाता है, उसी प्रकार महाविघ्नों को भस्म कर देता है। 'नामकीर्ति' श्रेष्ठ है यह तो
विश्वासपूर्वक स्वीकार है, किन्तु वह नाम मुख में रहे तो कैसे ? उसके लिये क्या करना चाहिये ? यह कहोगे तो
इसके लिये साधु की सेवा करे, संतों की सेवा पर जीव-भाव से भक्ति करें। इससे, वहाँ विघ्नों का प्रवेश नहीं
होता। सद्भावना से सत्संगति करने से उससे मुख में नामकीर्ति बस जाती है और चित्त में विकल्प उत्पन्न नहीं
होता। मुख को हरिनाम की मधुरता तथा मन को संतसेवा की चाह हो तो उसके प्रभाव से कोटि-कोटि विघ्नों का
नाश होता है। साधकों का रक्षक संतसंग यदि निजसखा हो जाय तो वह एक ही क्षण में महाविघ्नों के मुँह तोड़
देता है। साधु का चरणोदक सेवन करने से साधक अत्यन्त शुद्ध हो जाते हैं और उस शुद्धत्व से महादोष निर्मूल
हो जाते हैं। साधु के चरणतीर्थ के पास सारे तीर्थ शुद्धि के लिये आते हैं, इसलिये वह तीर्थ भक्तिभाव से सेवन
करने से सारे विघ्न नष्ट हो जाते हैं। साधुओं की चरणधूलि का वन्दन करने से साधकों का कार्य सिद्ध होता है।
विघ्नों का बीज ही नष्ट होकर उन्हें स्वानंद का अनुभव होता है। भाग्य से यदि संतों की चरणरज मस्तक पर पड़
जाय तो वह कलिकाल को भी लात मारता है फिर विघ्नों की क्या बिसात है ? निर्भय वीर वैसे ही बलशाली
होता है, फिर उसके हाथ में अच्छा सा शस्त्र देकर युद्ध में भेजें और उसकी पीठ थपथपायें तो उस उल्हास से
वह शत्रुओं का भीषण संहार करने लगता है। उसी प्रकार भक्तिभाव से सत्संगति धारण कर मुख में अखण्ड
नामकीर्ति रखें और भावपूर्वक संतों की भक्ति करें तो साधक सहज ही महाविघ्नों का विनाश कर सकते हैं।

७६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कीर्ति, भक्ति और सत्संगति इस त्रिवेणी का जिसे स्नान होता है, उन्हें विघ्न स्पर्श भी नहीं करते, उनके कारण
त्रिभुवन पावन हो उठता है। मेरी भक्ति और नामकीर्ति की सत्संगति माता समान है। वह सत्संग प्राप्त हो जाय तो
साधकों को विघ्नों की बाधा नहीं होती। योग, याग, आसन, ध्यान, तप, मंत्र, औषधि आदि साध्य करने से भी
देहाभिमान नहीं छूटता। लेकिन सत्संग से वह समूल नष्ट हो जाता है। योग आदि समस्त उपायों से छोटे-छोटे
विघ्न दूर हो जाते हैं लेकिन सारे विघ्नों का राजा देहाभिमान उनसे नहीं हिल पाता। देहाभिमान असाध्य है, वह
विद्वत्ता के अहंकार से तो और भी भयंकर हो उठता है। इसका समूल निर्दलन केवल सत्संग ही कर सकता है।
अज्ञानी लोगों का अभिमान तो तत्काल चला जाता है लेकिन ज्ञानाभिमान वैसा नहीं है। वह जानकार के लिये
सदा बाधक होता है। लेकिन सत्संग उस अभिमान का भी पीछा कर उसका अस्तित्व समाप्त कर देता है,
इसलिये सत्संग जैसा अन्य कोई साधन नहीं है। देह को ही अजर-अमर करने की कोई बात करता है तो उस
मूर्ख के चक्कर में पड़कर लोग योगादि साधन को सिद्ध करने के फेर में पड़ जाते हैं।
केचिद् देहमिमं धीराः सुकल्पं वयसि स्थिरम्।
विधाय विविधोपायैरथ युञ्जन्ति सिद्धये ॥ ४१ ॥
देह प्रारब्ध के वश में है; उसे प्रारब्ध से ही जन्म और मरण आता है। उस देह को पामर अमर करने का
प्रयत्न करते हैं। उस प्रारब्ध का सूत्र काल के हाथ में रहता है इसलिये काल द्वारा निर्धारित जन्म और मरण
सबके पीछे लगा ही रहता है। मार्कण्डेय को चौदह कल्प की आयु थी, फिर भी काल ने उसे दबोचा ही;
लोमहर्ष का एक-एक केश एक-एक युग में झरता था, उसका गला भी काल ने दबा ही दिया। चार-हजार युगों
का एक दिन ऐसी जिस ब्रह्मदेव ने कालगणना कर दी है वह सारी सृष्टि का कर्त्ता ब्रह्मदेव, वह भी काल की
सत्ता से नहीं बच पाता। उत्पत्तिकर्ता ब्रह्मदेव को काल निगल लेता है, उसी प्रकार पालनकर्ता विष्णु को भी वह
ग्रस लेता है, वह प्रलयकर्त्ता रुद्र को भी अपने सामर्थ्य से भस्म कर देता है। इस प्रकार काल अत्यन्त असाध्य है,
लेकिन यह जाने बिना अविचारी लोग देह को अजर-अमर करने के लिये काल पर ही प्रभाव जमाने का प्रयास
करते हैं। जो-जो दिखायी देता है, वह सब नष्ट होता है। काल की यह सत्ता देखकर भी मूर्ख लोग अजर-अमर
होने के लिये कितना प्रयास करते हैं। जलकुण्ड का तरंग अमर होने की इच्छा करता है तभी जलकुण्ड सूख
जाता है। उसी प्रकार यह संसार नाशवान है; उसमें पामर लोग देह को अजर-अमर करने की इच्छा करते हैं और
उसके लिये अथक प्रयास करते हैं। देह जाता है तो उसे जाने दें किन्तु जीव चिरंजीव रहे और उसके लिये प्रयास
करें, उसी में नरदेह का अमरत्त्व है। देह तो पूरी तरह नाशवान है; अविवेकी लोग उसे अनेक कष्टकारी उपायों
से अजर-अमर करने का प्रयत्न करते हैं। देह तो काल का एक खाद्य है, उसे अमर करने का उपाय साधक के
लिये हानिकारक होता है। सारांश, मूर्खतावश, देह के अमरत्व के लिये उपाय कर हठयोगी ठगे गये हैं। परकाया
प्रवेश साधने के लिये प्राण धारण करते-करते योगी थक गये हैं। सारांश, देहाभिमान के कारण ही योगी लोग
अपनी हानि कर चुके हैं। देह की नश्वरता को जान कर ही ज्ञानी लोग देहाभिमान नहीं करते। श्रीकृष्ण उसी का
निरूपण कर रहे हैं।
नहि तत् कुशलादृत्यं तदायासो ह्यपार्थकः।
अन्तवत्त्वाच्छरीरस्य फलस्येव वनस्पतेः ॥ ४२ ॥
विचार करने से मालूम होता है कि यह संसार समूल नश्वर है; इसलिये ज्ञानी लोग देह के अजर-अमर

अट्टाईसवाँ अध्याय ७६३
होने की ओर ध्यान नहीं देते क्योंकि देह को प्राप्त होने वाली सिद्धि सचमुच बाधक ही है। ज्वर से शरीर तप्त
होने पर, वह मृत्यु के भय से काँपने लगता है; लेकिन शीतोपचार करने पर भी उसे मृत्यु आती है। मिथ्या देह
का अभिमान ही हमेशा जन्म-मरण का भोग कराता है; ऐसे देह को अजर-अमर करने से देह बंधन और भी
कस जाता है। योगसाधन से देहबन्धन दृढ़ करने पर तथा देह की सिद्धि भोगने पर भी अधःपतन नहीं टलता।
ज्ञान के ही लिये क्यों न हो, लेकिन योग साधन करते हुए यदि सिद्धि समय पर आ जाय तो अपने कल्याण के
लिये उसका भी त्याग करना चाहिये जिसका राजा के पास आना-जाना रहता है उसी को रिश्वत मिलती है
लेकिन उसके कारण ही उसका अपमान होता है। उसी प्रकार साधक की सिद्धियाँ उसके लिये घातक होती हैं।
वृक्ष पर फल आते हैं लेकिन वृक्ष उन्हें नहीं छूता। उसी प्रकार सिद्धि प्राप्त होने पर भी उन्हें वैराग्य बल से छोड़
देना चाहिये। सूखे वैराग्यबल से त्याग करने पर वह स्थायी नहीं होता। विवेकयुक्त वैराग्य से त्याग करने पर
सिद्धियाँ तृणवत हो जाती हैं। अन्धा हाथी जब मदमस्त हो जाता है तो उसे अपना पतन नहीं दिखायी देता। उसी
प्रकार जो अविवेक से त्याग करते हैं, उनका अधःपतन होता है। जब देह ही नश्वर है तो उससे प्राप्त सिद्धि
कितनी शाश्वत होंगी ? ऐसे विवेक से जो वैराग्य सम्पन्न रहते हैं, वही देह के भोग से अलिप्त रहते हैं। यहाँ देह
जितना अनित्य है वहीं आत्मा सत्य और नित्य है। यह जानकर ही विवेकी लोग आत्माभ्यास के लिये तैयार हो
जाते हैं।
योगं निषेवतो नित्यंकायश्चेत् कल्पतामियात् ।
तच्छ्रद्दध्यान्न मतिमान् योगमुत्सृज्य मत्परः ॥ ४३ ॥
परमार्थ के लिये योगसाधन करते समय यदि सिद्धि प्राप्त हो जाए तो अपने हित के लिये उन्हें छोड़ देना
चाहिये। लेकिन सिद्धि छोड़ने पर भी नहीं छूटती प्रारब्ध के बल से गले पड़ जाती हैं। यदि ऐसा हो जाय तो
योगाभ्यास छोड़कर मेरे भजनमार्ग पर लग जाएँ। मेरे भक्ति मार्ग में विघ्नों का प्रवेश नहीं होता क्योंकि मैं श्रीरंग
भक्त के प्रेमरंग में रंग जाता हूँ। सद्भाव से मेरी भक्ति करने से विघ्न कभी नहीं आते क्योंकि मैं श्रीकृष्ण रात-
दिन भक्तों के साथ रह कर उनका संरक्षण करता हूँ। ऐसी भक्ति की महिमा का वर्णन श्रीकृष्ण करते हैं।
योगचर्यामिमां योगी विचरन् मदपाश्रयः ।
नान्तरायैर्विहन्येत निःस्पृहं स्वसुखानुभूः ॥ ४४ ॥
जो अनन्यप्रीति से मेरी शरण में आते हैं, समस्त प्राणिमात्र में मेरी ही भावना रखते हैं और अभेद बुद्धि से
मेरा भजन करते हैं उन्हें विघ्नों की बाधा बिलकुल नहीं होती। मेरे भक्तों के सारे उपसर्ग मैं श्रीकृष्ण निवारण
करता हूँ। जिसे अनन्य भजनयोग है ऐसे भक्त को मैं अपना अंग ही बस्ती के लिये देता हूँ। मेरे भक्तों की ओर
विघ्न आने लगते हैं तो मैं वहाँ कूद पड़ता हूँ। मेरे भक्तों का संकट मैं निवारण करता हूँ क्योंकि वे मेरे लाडले हैं।
वे कितने लाडले हैं, उसके बारे में सुनो। उनके संकट मैं निरन्तर सहन करता हूँ। राजा हिरण्यकश्यपु प्रह्लाद को
यातना दे रहा था उस समय मैंने उसकी पूरी तरह सुरक्षा की। अम्बरीष पर संकट आया तो मैंने दुर्वासा का
अपमान किया। उसके दसों गर्भवास मैंने झेले लेकिन भक्तों को कमी नहीं होने दी। गजेन्द्र को पीड़ा हुई तो मैं
हाथ में सुदर्शन लेकर, कूद कर उसके पास पहुँचा और क्षण भर में उसे छुड़ाया। कौरव सभा में द्रौपदी के
असाध्य संकट में, दुष्ट लोग उसे नग्न करने लगे, उस समय मैंने उसे वस्त्रों का ढेर उपलब्ध कराकर उसे उस
संकट से बचाया। यदि द्रौपदी के हाथ में साड़ी देता तो उसे पहनते समय वह नग्न दिखाई देती इसलिये मैं स्वयं

ही उसकी साड़ी बन गया। जब दावाग्नि ने गोपालों को पीड़ा दी तो मैंने अपने मुँह से ही वे ज्वालायें निगल लीं।
उद्धव ! अपने भक्तों के प्रति मेरे मन में अत्यधिक करुणा रहती है। अश्वत्थामा के शस्त्र की पीड़ा से मैंने परीक्षित
की गर्भ में रक्षा की। इन्द्र ने गोकुल को त्रस्त किया तब मैंने गोवर्धन को हाथ पर उठा लिया। अर्जुन को बचाने
के लिये मैंने दिन में ही सूर्य को छिपा दिया। रणभूमि पर हार ले जाकर मैंने ही भीष्म को सत्यप्रतिज्ञ किया।
भक्तों का ऐसा सहायक सिर पर हो तो उन्हें विघ्न कौन करेगा ? मैं श्रीहरि उनका रक्षक हूँ। जो मेरी भक्ति का
अनुसरण करते हैं, उन भक्तों पर मैं कभी विघ्न नहीं आने देता। मैं अपना देह उन्हें अर्पण कर उन्हें निजस्वरूप
में परमानन्द में रखता हूँ। सद्भाव से मेरी भक्ति करने पर साधकों को आत्मसुख का लाभ होता है। तब वासना
के साथ ही काम और लोभ लोप हो जाता है और भक्तों को मेरा सुख प्राप्त होता है। तुम कहोगे, देह के अन्त में
भक्त को आत्मसुख की प्राप्ति होगी लेकिन मेरी चौथी भक्ति वैसी नहीं है। इसके योग से देह में रहते हुए ही
आत्मसुख की प्राप्ति होती है। देह रहे या जाये, उस सुख का कभी भी अभाव नहीं रहता। इस प्रकार मेरे भक्त
सुखपूर्वक आत्मसुख का भोग करते रहते हैं। भक्त देह में विचर रहे हैं ऐसा लगता है, लेकिन वे मुझमें ही
विचरते रहते हैं। मैं सदा सर्वदा उनके हृदय में ही वास करता हूँ। भक्त आत्मज्ञान से मुझमें और मैं निजांग से
उनके भीतर और बाहर रहता हूँ। इस प्रकार आत्मसुख के बीच वाले घर में हम दोनों परस्पर विचरण करते रहते
हैं। मैं देव और वह भक्त यह तो बाहर कहने की बात है। गूढ़ दृष्टि से विचार करें तो मैं और भक्त दोनों एक हैं।
घी पिघला हुआ हो या जमा हो। उसी प्रकार मैं और भक्त दोनों एक हैं। मुझमें और भक्त में कल्पांत में भी
भेदभाव नहीं है। तब मैं और वह एक हैं, यह कहनेवाला भी कोई नहीं रहता। इस प्रकार भक्त मत्स्वरूप से
मिलकर आत्मानंद प्राप्त करते हैं। ऐसा यह अट्ठाईसवाँ अध्याय ब्रह्मज्ञान का कलश है। श्रीकृष्ण कुशल कारीगर
है, उसने मन्दिर पर यह कलश चढ़ाया। अलंकारों में जिस प्रकार 'मुकुटमणि' रहता है, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान का
यह अट्ठाईसवाँ अध्याय है। श्रीकृष्ण भक्तों की माता होने के कारण उसने उद्धव का श्रृंगार किया। उत्तम से उत्तम
अलंकार पहना कर जिस प्रकार माँ अपने मुन्ने का शृंगार करती है, उसी प्रकार उत्तम से उत्तम ज्ञाननिर्णय से
उद्धव का शृंगार किया। माँ अपने बच्चे को अलंकार पहनाती है और बाद में उन्हें उतार लेती है किन्तु श्रीकृष्ण ने
एक बार उद्धव का श्रृंगार किया तो वह शृंगार-शरीर से निकल ही नहीं पाया। शरीर पर वह अमूल्य अलंकार
स्थायी हो गया, इसमें उद्धव अनमोल हो गया। सारा त्रैलोक्य उसके पैरों पर गिरने लगा और ब्रह्मदेव आदि
देवतागण भी उसकी पूजा करने लगे। श्रीकृष्ण ने स्वस्वरूपालंकार से उद्धव का श्रृंगार किया था इसलिये वह
ब्रह्मस्थिति तक पहुँच गया, इसीलिए वह त्रिभुवन में वन्दनीय हो गया और पुराण में भी महाकवि उसका वर्णन
करने लगे। माधुर्य में अमृत श्रेष्ठ है, उसे भी फीका बना कर श्रीकृष्ण ने उद्धव को परमामृत पिलाया। देव
अमृतपान करते हैं लेकिन वे भी मृत्युरूपी संसार में डूबते ही हैं। श्रीकृष्ण ने उद्धव को कथामृत से तृप्त कर
अक्षय बना दिया। वह सर्वांग से शान्त हुआ, परमानन्द से तृप्त हुआ; इस प्रकार मैं उद्धव हूँ इसका भान ही वह
भूल गया और स्वानंद से डोलने लगा। फिर परमानन्द के उन्माद में वह जहाँ भी 'दूजा' देखता उसे मार कर
गिरा देता। इस प्रकार संसार को लात से ठुकरा कर वह देवताओं के मस्तक पर चढ़ गया। देवताओं के माथे पर
चढ़कर उनका देवत्व भी भक्तों का भक्तपन भी उसने निगल लिया और फिर सच्चिदानन्द के स्वानंद से स्वयं ही
आत्मस्वरूप बन गया। वहाँ सत्, चित् और आनन्द का त्रिविध भेद भी नहीं रहा। सदैव परमानन्द और आनन्द
ही भर गया। नश्वर का त्याग करते समय अविनाश को 'सत्' कहते हैं, जड़ की निवृत्ति करते समय वस्तु को
'चित्' कहते हैं और जहाँ दुःख की बाधा नहीं है उसे 'आनन्द' कहते हैं। इस प्रकार 'सच्चिदानन्द' शब्द की

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७६५

व्याख्या है लेकिन वह मायिक ज्ञान सम्बन्ध है क्योंकि आत्मवस्तु सत् भी नहीं है और असत् भी नहीं है, उसी
प्रकार वह चित् भी नहीं है और अचित् भी नहीं है। उसे सुख दुःखातीत तथा सन्मात्रस्वरूपी समझ लो। इस
प्रकार अट्ठाईसवें अध्याय का यह आत्मबोध आनन्दकंद श्रीकृष्ण ने सन्तुष्ट होकर उद्धव को दिया। निजधाम
जाना स्थगित कर श्रीकृष्ण ने अपनी गुप्तनिधि उद्धव को दी। उसके भाग्य का वर्णन किन शब्दों में करें? जो
अपने पिता वसुदेव को नहीं दिया, अपने बन्धु बलिभद्र को नहीं दिया, पुत्र प्रद्युम्न को नहीं दिया, वह उद्धव को
दिया। जो माँ देवकी को नहीं दिया। फूफी कुन्ती को नहीं दिया, यशोदा को भी नहीं दिया, वह उद्धव को दिया।
आप कहेंगे कि यह तो अर्जुन को भी बताया था। वह भी उसका लाडला था यह सच है; लेकिन उसके हाथ से
पृथ्वी का बोझ कम हो इसलिये उसे जल्दबाजी में युद्ध में उपदेश दिया था। उद्धव की बात वैसी नहीं थी। उसे
उसने निश्चित रूप से अपने निर्णय की बात अर्थात् गुप्त निधि उसे सौंपी। पिता की कमाई का धन, उसका
स्वामित्व उसके पुत्र के पास आता है; उसी प्रकार श्रीकृष्ण के गूढ़ ज्ञान का हकदार उद्धव बन गया। पाण्डवों में
अर्जुन धन्य है और यादवों में उद्धव धन्य है। त्रिभुवन में इन दोनों के जैसा भाग्य किसी का नहीं दिखायी देता।
सारे सार का सार यह एकादश स्कंध का अट्ठाईसवाँ अध्याय है। संन्यासियों में जिस प्रकार परमहंस श्रेष्ठ हैं,
उसी प्रकार पूरे भागवत में यह अध्याय श्रेष्ठ है। जिस प्रकार क्षीराब्धी में शेष और उसके ऊपर नारायण है, उसी
प्रकार भागवत में भी यह अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्णब्रह्मरूप है। जिस प्रकार परमपावन वैकुण्ठ में भगवान
शोभायमान हैं, उसी प्रकार भागवत में अट्ठाईसवाँ अध्याय शोभा दे रहा है। ऐसा लोकोत्तर वैभव कृष्ण की कृपा
से उद्धव को प्राप्त हुआ। उसके निजभाग्य की गति अत्यन्त तीव्र है। वह स्वयं ही ब्रह्मस्वरूप हो गया। उद्धव
पूर्णब्रह्म हो गया उसका प्रमाण कृष्ण कृपा ही है। मैं अज्ञानी, प्राकृत देशी भाषा में उसका वर्णन कर रहा हूँ।
अन्धे पर जब सूर्य प्रसन्न हो जाता है तो वह पृथ्वी के भीतर का गुप्त खजाना भी देख पाता है, उसी प्रकार
जनार्दन प्रकट होकर यह गुप्त ज्ञान मुझसे कहलवा रहा है। जनार्दन अब प्रकट हुआ यह कहना भी मेरी मूर्खता
ही है क्योंकि वह तो सदासर्वदा स्वतः सिद्ध ही है। लेकिन यह भी उसकी ही कृपा से मालूम हुआ। उसकी कृपा
ने मेरा 'मैं'पन' भी समाप्त कर दिया। जिस प्रकार सूर्य अँधेरे को ले जाता है वैसे ही वह मेरा 'मैं'पन' ले गया।
जनार्दन मुझ पर कृपा करता है यह भी मुझ अज्ञानी को मालूम नहीं होता। उस दयाघन ने कृपा करके यह
गुह्यज्ञान मुझसे कहलवाया। वह मेरे सान्निध्य में होते हुए भी मुझे उसकी महिमा नहीं मालूम हुई। उसने अपनी
महिमा स्वयं ही मेरे मुख से कहलवायी। जिसे मैं 'मेरा मुख' कहता हूँ, वह भी सचमुच जनार्दन ही बन गया है।
उस मुख से निःशंकर आत्मसत्ता से ही आत्मसुख कहलवाया। सारांश, मेरे नाम से भले ही कविता दिखायी दे
रही हो लेकिन उसका वक्ता जनार्दन ही है। उसी ने अपने वक्तृत्व से यह रसमयी कथा चलायी है। ब्रह्मरस से
सनी हुई कथा अर्थात् श्रीभागवत का निरूपण उसी ने किया है। उसमें अट्ठाईसवाँ अध्याय तो वास्तव में
ब्रह्मस्वरूप की तल्लीनता है। अट्ठाईसवें अध्याय का निरूपण वस्तुतः परिपूर्ण ब्रह्म ही है। उसका श्रद्धा से श्रवण
करने के कारण उद्धव ने पूर्ण समाधान प्राप्त किया। उद्धव स्वयं तृप्त तो हुआ लेकिन उसने विचार किया कि यह
शुद्ध आत्मज्ञान अवश्य है लेकिन वह निर्बल और अज्ञानियों को प्राप्त होना कठिन है। अतः इस चित्स्वरूप की
प्राप्ति साधकों को कैसे सुलभ होगी, इसकी विनती वह अगले अध्याय में करेगा। पर्वत की चट्टान काट कर मार्ग
बनाया जाय या ऊँचाई चढ़ने के लिये सीढ़ियाँ बनायी जायँ ताकि सुगम रीति से निर्गुणत्व तक पहुँचा जा सके,
वह उपाय उद्धव पूछेगा। तो अगला अध्याय सुरस होते हुए साधकों को परमार्थ सिद्धि कराएगा। दुर्बल पुरुषों को
तैरने की अपेक्षा पैदल चलकर ही संसार समुद्र पार करना चाहिये। श्रीकृष्ण इसके लिये सरल उपाय बतायेंगे।

७६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सीता पर अत्यन्त कृपा होने के कारण रामचन्द्र ने सेतु का निर्माण किया। उस पर से जंगली और मूढ वानर भी
उस पार चले गये। उसी प्रकार उद्धव के प्रश्न के प्रति प्रेम के कारण अपनी भक्ति के उपाय का भवाब्धि सेतु
श्रीकृष्ण ने बनाया। उस पर से दीन, दुर्बल और भाविक लोग सहज ही उस पार चले जायेंगे। कृष्णभक्ति के सेतु
पर चलकर जड़, मूढ़ पामर सब तर कर चले गये। वही भक्ति यादवेन्द्र श्रीकृष्ण बतायेंगे, उसे श्रोतागण
आदरयुक्त चित्त से सुनें। एका जनार्दन की शरण में होने के कारण श्रोता भी प्रसन्न हो उठे हैं। इस प्रकार अगले
अध्याय के निरूपण से साधक लोग तर जाएँगे। अपना एकपन त्याग कर एका जनार्दन की शरण में है। अब
जिससे आत्मज्ञान सुगम रीति से समझ में आ सके वह भक्तिसाधन श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधेभगवदुद्धवसंवादेपारमहंससंहितायां
एकाकार टीकायां परमार्थ निर्णयोनाम अष्ट विशंतितमोऽध्यायः॥ २८ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

उनतीसवाँ अध्याय

हे ओंकारस्वरूपी श्री सद्गुरु दयासागर ! तुम्हें नमस्कार ! तुम्हारी कृपा का कोई अन्त नहीं है। तुम अपनी
कृपा से जीव का उद्धार करते हो। हे कृपानिधि ! हे गुरुराया ! तुम जीवभाव दूर कर तथा जीवोपाधि नष्ट कर
भक्तों को संसारसमुद्र से तारते हो। तुम्हारी कृपालुता अद्भुत है। तुम जीव को मारते हो; उसका नामरूप शून्य
कर देते हो और समस्त जातिगोत्र का संहार कर देते हो। अपना-पराया की भावना का निर्दलन कर संसार को
संतान-विहीन कर देते हो। ऐसा प्राणप्रिय मित्र और सच्चे कृपालु तुम कैसे हो सकते हो ? जिस प्रकार अन्धकार
में दृष्टि काम करती है; उसमें कोटि-कोटि नक्षत्र और जुगनू दिखाई पड़ते हैं; लेकिन उन्हें अन्धकार के साथ सूर्य
ग्रस लेता है; उसी प्रकार साधकों की तुमसे भेंट है। तुमसे जब सचमुच ही भेंट होती है, और जब तुम कृपादृष्टि
करते हो तब संसारभेद की त्रिकुटी और त्रिगुण युक्त सृष्टि भी नहीं दिखायी देती। गुणों वाली सृष्टि न दिखाकर
अद्वय ब्रह्म दिखाते हो। एक बार तुमसे सचमुच भेंट होने पर, भेंट में कभी विराम नहीं होता। जो कभी दृष्टि को
नहीं दिखायी देता, उससे भेंट कैसे होगी ? और भेंट में कभी खण्ड नहीं पड़ेगा यह कैसे घटित होगा ? तो जिस
प्रकार गर्भ माँ के पेट में रहने से उसे नहीं दिखायी देता, फिर भी उनकी दोनों की भेंट होती रहती है, उसी प्रकार
साधक तुम्हारे पेट में ही रहते हैं। माँ बड़े प्यार से बच्चे का लालन-पालन करती है लेकिन वह जिस प्रकार माँ
को नहीं पहचानता; उसी प्रकार तुझ में अज्ञानी जन रहते हैं, उन्हें तुम अपने ही प्रेम से सँभालते हो। बालक का
जन्म होने पर माँ उसे अपनी बुद्धि से पालती-पोसती है उसी प्रकार तुम्हारे निजज्ञान से साधक भी संज्ञान होते हैं।
साधकों को तुम्हारा ज्ञान प्राप्त होते ही उन्हें 'मैं तू' का स्मरण नहीं होता। जीव अद्वयभाव से पूर्ण परमात्मा ही
बन जाता है और अपना जीवपन भूल जाता है। यदि सद्गुरु की कृपा न हो तो कोटि उपाय करने पर भी परमार्थ
से भेंट नहीं होगी। सद्गुरु की कृपा होने पर साधनों की आवश्यकता नहीं रह जाती। सृष्टि ब्रह्मानन्द से भर
जाती है और साधकों को आत्मानंद का लाभ मिलता है। सद्गुरु की कृपा होने पर उपनिषदों का अर्थ साधकों के
हाथ लगता है। श्रीगुरु की कृपा इतनी समर्थ है। इसीलिये उनकी कृपा से श्रीभागवत का शुद्ध और सरल
मथितार्थ मैंने प्राकृत में वर्णन किया। श्रीजनार्दन की कृपादृष्टि से ही मेरी अनाड़ी बातें, स्वानंद के जोश में,
निजबोध से एकादशस्कंध में प्रवेश कर सकीं। संस्कृत और प्राकृत भाषाएँ भिन्न होने पर भी उसमें निहित स्वानंद
की माधुरी ही ज्ञाता लोग सेवन करते हैं। गाय लाल हो अथवा काली हो, उससे दूध के स्वाद में अन्तर नहीं
आता। उसी प्रकार भाषा संस्कृत हो या पाली हो, उससे ब्रह्म में कोई अन्तर नहीं पड़ता (मैंने) एकनाथ ने दोनों
भाषाओं का तत्त्व बिना किसी भेदभाव के बतलाया। इसमें मेरा सखा जनार्दन मेरा सहायक है। उसकी कृपा से
ही अट्ठाईसवें अध्याय का गुह्य, गम्भीर और स्वानंदपूर्ण निरूपण किया। उसमें नानाप्रकार की उपपत्तियों से
आत्मज्ञान की युक्ति साधकर, निःशंक ब्रह्मस्वरूप का स्वयं श्रीकृष्ण ने वर्णन किया है। ब्रह्म अद्वयत्व से परिपूर्ण
है; उसमें हेतु, अनुमान, बुद्धि, युक्ति अथवा मन आदि का प्रवेश नहीं हो पाता। वहाँ दृश्य, द्रष्टा, दर्शन नहीं हैं;
ध्येय, ध्याता, ध्यान नहीं है; कर्म, कर्ता, कारण नहीं है; अथवा 'मैं' या 'तू' वाला भाव नहीं है। युक्तियाँ वहाँ
गतप्राण हो गयीं, दृष्टांत बेकार हो गये, प्रमाण अप्रमाण हो गये और ज्ञान के साथ विचार क्षीण हो गया। वहाँ न
वाचा है न मौन है, आकार है न शून्य है; न गुण है न निर्गुण है। इस प्रकार की ब्रह्मस्थिति कृष्ण की कृपा से
उद्धव को प्राप्त हुई; लेकिन वह दुर्बल अज्ञानियों को प्राप्त होना कठिन है; फिर वे लोग कैसे तर पायेंगे ?

७६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ब्रह्मस्थिति अत्यन्त कठिन है यह मर्म उद्धव के ध्यान में आया; इसलिये साधकों का काम हो जाय इसलिये वह
सरल उपाय पूछ रहा है। कृष्ण अब निजधाम जायेंगे और तब ब्रह्मप्राप्ति हाथ नहीं लगेगी; साधक संकट में पड़
जायेंगे फिर सही उपाय कौन बतायेगा ? इस प्रकार साधकों के हितों के प्रति विह्वल होकर, सुगम रीति से
ब्रह्मप्राप्ति हो सके ऐसा उपाय वह श्रीकृष्ण से पूछ रहा है। उन्नीसवें अध्याय में, ब्रह्मप्राप्ति का सुगम साधन,
अर्थात् जो सप्रेम भगवद्भजन है उसका लक्षण श्रीहरि बताने वाले हैं। जिससे दुर्बल अज्ञानियों को ब्रह्मप्राप्ति
सुलभ हो, वह रीति बतलाने के लिये उद्धव छः श्लोकों में भगवान से विनती कर रहा है।
उद्धव उवाच
सुदुश्चरामिमां मन्ये योगचर्यामनात्मनः ।
यथाञ्जसा पुमान् सिद्ध्येत् तन्मेब्रूह्यब्जसाच्युत ॥ १ ॥
पूर्वाध्याय में जिस ब्रह्मस्थिति का वर्णन किया उसे साध्य करना अत्यन्त कठिन है। दुर्बल, भोले भाले भक्त
इसे नहीं साध्य कर पायेंगे। ब्रह्म वस्तु व्यक्त भी नहीं है और अव्यक्त भी नहीं है; प्रकट भी नहीं है और गुप्त भी
नहीं है। वह मूर्त है वा अमूर्त है इसका पता नहीं चलता। वहाँ साधकों का प्रवेश कैसे होगा ? वह स्थूल भी नहीं
है और सूक्ष्म भी नहीं है; वह है यह कहना भी कठिन है और नहीं है यह कहना भी सम्भव नहीं है। जहाँ देखना
और देखने की वस्तु ये दोनों ही समाप्त हो जाते हैं वह साधकों को कैसे साध्य होगा ? जो दिखायी देता है उसी
को ब्रह्म कहें तो वह नाम और रूप से माया होगी; वह नहीं है यह मानकर छोड़ दें तो उससे साधकों का
नुकसान होगा। जो आकार वाला भी नहीं है और शून्य भी नहीं है; जिसमें ध्येय और ध्यान प्रवेश नहीं करता;
जिससे ज्ञेय और ज्ञान भी शरमाता है और साधन जिसे स्पर्श भी नहीं करता; जो शब्दों के हाथ नहीं लगता; जो
मौन में भी नहीं मिलता; जहाँ भीतर और बाहर नहीं है, वहाँ साधक बेचारा क्या करे ? जो विचारों के अन्दर भी
नहीं है और बाहर भी नहीं है; जिसका पूरी तरह निश्चय करने में बुद्धिमान को भी साहस नहीं होता; वहाँ
साधक किस तरह निश्चय करें ? जहाँ साधकों को अपना मन स्थिर करने के लिये कोई आधार ही नहीं दिखायी
देता; वहाँ अनात्मनिष्ट अज्ञानी लोगों के लिये क्या यह योग अत्यन्त कठिन नहीं है। तुम यदि निजधाम जाने की
जल्दी कर रहे हो तो अज्ञान लोगों के लिये तरने का सुलभ साधन बताओ। यह कह कर उसने साष्टांग दण्डवत
किया, दौड़कर श्रीकृष्ण के चरण पकड़ लिये और सुलभ साधन बताने की विनती की। नदी को तैरकर पार करने
की अपेक्षा उसे चलकर पार करना स्त्रियों और बच्चों को आसान रहता है। इसलिये हे श्रीकृष्ण ! कुछ ऐसा ही
उपाय बताइये। तुम्हारे प्रति सद्भाव तो पूरा है लेकिन शब्दज्ञान समझ में नहीं आता; ऐसे अज्ञानी लोगों को समझ
में आ सके ऐसा तैर कर पार जाने का सुगम साधन बताइये। मनोनिग्रह करना अत्यन्त कठिन है; वह साधकों को
पूरी तरह साध्य नहीं होता। इसी अर्थ का निरूपण अब उद्धव कर रहे हैं।
प्रायशः पुण्डरीकाक्ष युञ्जन्तो योगिनो मनः ।
विषीदन्त्यसमाधानान्मनोनिग्रहंकर्शिताः ॥ २ ॥
हे कमलनयन कृष्ण ! सुनो ! साधक साधना करके कितना भी थक जाये लेकिन वह मन का आकलन नहीं
कर पाता। साधक लोग मन का निग्रह करने के लिये प्राणापान साध्य करते हैं लेकिन मन उन्हें भी मूर्ख बनाकर
तत्काल चला जाता है। कुछ लोग एकांत में आसन लगाकर मनोनिग्रह के सम्बन्ध में बड़ी सावधानी दिखलाते हैं,
लेकिन उन्हें भी ठग कर मन अत्यन्त चपलता से वहाँ से निकल जाता है। मनोनिग्रह करने में हम बड़े निश्चयी

उनतीसवाँ अध्याय ७६९
हैं, यह कह कर गिरिकंदराओं में चले जाते हैं किन्तु मन उन्हें भी ठग कर सबके सामने चपलता से निकल जाता
है। कोई मन का निग्रह करने के लिये अन्न का त्याग करते हैं लेकिन उसका परिणाम विचित्र होता है। उनका
मन जागृति में और स्वप्न में अन्नमय ही हो जाता है। इस प्रकार मनोनिग्रह करते समय मन और भी अधिक क्षुब्ध
हो उठता है। इस प्रकार मन का नियमन करने वाले बड़े-बड़े ज्ञाता साधन करके थक जाते हैं। वायु को गठरी में
बाँध सकते हैं, अग्नि को भी एक बार में पी सकते हैं; समुद्र को भी निगल सकते हैं लेकिन यह मन कभी भी
आत्मस्वरूप में नहीं रह पायेगा। आकाश को तह करके रख सकते हैं; महामेरु को पुड़िया में बाँध सकते हैं;
शून्य का गला टीप सकते हैं लेकिन इस मन का नियमन असम्भव है। सचमुच काल पर भी विजय प्राप्त की जा
सकती है; त्रिभुवन की सत्ता भी प्राप्त की जा सकती है; परन्तु हे अच्युत ! मनोनिग्रह की बात तुम्हारे बिना कैसे
साध्य होगी? मन तपस्वी लोगों को तत्काल धोखे में डालता है; मन नेमी लोगों का नियम टालता है; इस प्रकार
यह मन बल से भी अधिक बलशाली है। वह धैर्य की राख कर देता है। मन इन्द्र को नीचा दिखाता है, ब्रह्मदेव
को भी हठ से अटकाता है; इस प्रकार मन की जिद बहुत खराब है; उसे साधक अपने वश में नहीं कर सकते।
साधना करके मन कितना भी थक जाय, लेकिन मन पर विजय नहीं प्राप्त होती। हे अच्युत ! तुम्हारे बिना यह
मन नियमित नहीं होता। यदि अत्यन्त प्रयास करने से मनोजय प्राप्त हो भी जाय तो सिद्धियों का ढेर लग जाता है
और उससे साधकों का मन असमंजस में पड़ जाता है। तुम्हारी कृपा हुए बिना साधक मन को कभी वश में नहीं
कर सकते। तुम जनार्दन यदि सन्तुष्ट हो जाओ तो मन स्वयं ही अपना मनपन भूल जाता है। सारांश, भक्तिभाव से
तुम्हारी शरण में गये बिना साधक अपने मन को वश में नहीं कर सकते। इसलिये मनोनिग्रह के लिये तुम्हारी
शरण में आना ही पड़ेगा।
अथात आनन्ददुधं पदाम्बुजं हंसाः श्रयेरन्नरविन्दलोचन।
सुखं नु विश्वेश्वर योगकर्मभिस्त्वन्माययामी विहता न मानिनः ॥ ३ ॥
हे कमलापति ! हे कमलवदन ! हे कमलालय ! हे कमलनयन ! नाभिकमल में वास करने वाले ब्रह्मदेव को
तुमने ही ब्रह्मज्ञान दिया है। तुम्हारे चरणों का चरणामृत तुम्हारी कृपा से जिसे प्राप्त होता है, उसका मनोजय
सुनिश्चित हो जाता है। वह सांसारिक सुख के प्रति विरक्त हो जाता है। तुम्हारे चरणामृत की माधुरी तत्काल
मनोजय का लाभ करा देती है। आधिव्याधियों का विनाश करती है जिससे साधकों को स्वानंद की राशि प्राप्त हो
जाती है। इसलिये इस सारे साधनों का सार, महासमर्थ सांख्य योग और विवेक का भी सार कहना चाहिये। हे
श्रीकृष्ण ! भक्ति को रहस्य जान कर हृदय के प्रेम के प्रति जो आकृष्ट हुए वे ही विज्ञानयुक्त राजहंस भजन सार
का सेवन करते हैं। जिनका काया, वाचा और मन सद्भाव से सदा सम्पन्न रहता है, ऐसे भक्तों को तुम्हारे चरण
परिपूर्ण स्वानंद प्रदान करने वाले हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये विधियुक्त साधनों से ही प्राप्त होते हैं। उन
साधनों में जरा भी कमी होने से साधकों की हानि होती है लेकिन तुम्हारी भक्ति वैसी नहीं है। जीव-भाव से तुम्हें
भजने से भजन करने वालों पर कोई विघ्न नहीं आता। इसके विपरीत भक्त ही विघ्नों का नुकसान करता है। सूर्य
और जुगनू की यदि आराम से भेंट होगी, तभी विघ्न भक्तों के पास आने का साहस करेंगे। सिंह की गन्ध आते
ही मदोन्मत्त हाथी भी भागने लगते हैं। उसी प्रकार तुम्हारे भक्तिभावयुक्त भजन से विघ्न भागने लगते हैं। ऐसे
निश्चय से सम्पन्न होकर जो तुम्हारे चरणों के पास अनन्य भाव से आते हैं, उन्हें जन्म-मरण भी स्पर्श नहीं
करता, फिर अन्य विघ्नों की क्या बिसात है? ऐसी भावना से जो तुम्हारी शरण में आते हैं, उन्हें तुम्हारे चरण,
कामधेनु जिस प्रकार वत्स को तृप्त करती है, उसी प्रकार स्वानंद से सदा तृप्त करते हैं। भक्तिरूप निर्मल सरोवर

७७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
में नवविधा रसों का मधुर जल होता है, उसमें डूबे हुए तुम्हारे चरणकमल भावार्थ सूर्य के उदय के साथ ही
विकसित होते हैं। उसमें स्वानुभवी भ्रमर उन कमलों पर झपट्टा मारकर, आहिस्ते से, केसर को धक्का दिये बिना
सौख्यरूपी मकरंद का सेवन करते हैं। वहाँ आत्मानात्मविवेक करने वाले परमहंस उस सरोवर के राजहंस हैं। वे
तुम्हारे चरणकमलों के सान्निध्य में रहकर सरस मकरंद का उपभोग करते हैं। आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी भक्त ही
क्यों न हों, वे भी उसी सरोवर में रहते हैं, लेकिन उन्हें कमल के मकरंद के बारे में मालूम नहीं रहता। वे कमल
के तल के पास क्रीड़ा करते रहते हैं। श्रीकृष्ण ! ऐसे भोले भक्तों को तुम तारते हो। इस प्रकार जो भी तुम्हारी
भक्ति करते हैं उनका कोई नुकसान नहीं होता। भक्तिभाव से तुम्हारा भजन करने से, उस भावार्थ से ही तुम प्रसन्न
होते हो और तुम्हारे प्रसन्न होते ही तुम्हारे चरण उस भक्त पर स्वानंद की परिपूर्ण वर्षा करने लगते हैं। तुम
विश्वमूर्ति और विश्वंभर हो; तुम ही ब्रह्मादि देवताओं के ईश्वर हो। तुम्हारा अभयहस्त एक बार मस्तक पर पड़ने
पर भक्तों को भवभार स्पर्श नहीं करता। तुम्हारी भक्ति ही तुम्हारा सत्कर्म है, तुम्हारा भाव ही उनका स्वधर्म है;
तुम्हें उत्तम नैवेद्य अर्पण करना यही भक्तों का बहुत बड़ा यज्ञ है। नित्य तुम्हारे नाम का स्मरण करना यही भक्तों
का जप है और तुम्हारा मनोरम कीर्तन करना यही भक्तों की परम समाधि है। इस प्रकार भक्त जो जो कर्म करते
हैं, वह कर्म तुम स्वयं ही हो जाते हो। तुम मेघश्याम श्रीकृष्ण जिस पर प्रसन्न होते हो उसे भवभ्रम स्पर्श नहीं
करता। इस प्रकार तुम भजन के द्वारा भक्तों को आत्मसुख देकर तारते हो और उनके सुख के आनन्द में झूमते
रहते हो। इस प्रकार भक्तों को अनपेक्षित ढंग से, निजसुख से परिपूर्ण करते हो। ऐसा होते हुए भी जो तुम्हारी
शरण में नहीं आते, वे माया के मोह में फँस जाते हैं। तुम्हारे चरणों से जो विमुख हो जाते हैं; वे स्वप्न में भी
सुख का दर्शन नहीं करते। वे सदा निरन्तर बढ़ने वाला दुःख ही भोगते रहते हैं। माया ने उन्हें इस सीमा तक मूर्ख
बनाया रहता है। तुम्हारे चरणों का ध्यान न कर योग यागादि साधन करने से वह साधकों के लिये बन्धन ही हो
जाता है क्योंकि ज्ञातापन की अकड़ से अभिमान क्षुब्ध होता है। पूर्वश्लोक का चरण, 'त्वन्माययाऽमी विहता न
मानिनः' यह श्लोक का अन्तिम चरण है। उसका विचार करने पर, उसमें पण्डितों का ज्ञानाभिमान और अभक्त
भाव ही प्रकट होता है। हम ज्ञाता, हम योगी, हम ही श्रोत्रिय सारे संसार में पवित्र; हमारा ही मार्ग अत्यन्त शुद्ध
है; लोग अज्ञानी हैं, वैसे हम नहीं हैं; हमारा वचन सबके लिये प्रमाण होना ही चाहिये। इस प्रकार ज्ञाता लोग
अपने मन में ऐसा ही समझते रहते हैं। इस ज्ञानाभिमान ने ही उन्हें मूर्ख बनाया रहता है। वे शब्द पांडित्य के
घमण्ड में अपार दुःख भोगते हैं। सारांश, संसार में अभिमान जैसा बैरी कोई और नहीं है। वह ज्ञानाभिमान से
सज्जनों को भी चक्कर में डाल देता है। खैर, इन अभक्तों की कथा रहने दीजिये। वे भक्तिमार्ग से भटके रहने के
कारण ही, देह के अहंकार से व्यर्थ नाना प्रकार की व्यथा भोगते हैं। लेकिन जो भक्ति पर अपना चित्त न्योछावर
कर तुम्हारी अनन्य शरण में आये हैं उनको तुम जगन्नाथ तारने वाले हो। तुम अपने भक्तों को आत्मसुख में रखते
हो। तुम्हारे जो भी भक्त हैं, जिन्होंने भक्ति पर ही अपने प्राण न्योछावर किये हैं, उन्हें बिना माँगे ही आत्मज्ञान की
प्राप्ति होती है। हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारा भजन करते रहने से, विघ्न भक्तों को कभी पीड़ा नहीं देते। वे अत्यन्त
सुखसम्पन्न हो जाते है कैसा आश्चर्य है ! जो अनन्य रूप से तुम्हारी शरण में आते हैं, तुम सदा उनके अधीन रहते
हो। इसी अर्थ का निरूपण उद्धव स्वयं सुना रहा है।
किं चित्रमच्युत तवैतदशेषबन्धो दासेष्वनन्यशरणेषु यदात्मसात्त्वम्।
योऽरोचयत् सह मृगैःस्वयमीश्वराणां श्रीमत्किरीटतटपीडितपादपीठः ॥४॥
हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारे भक्तों को विघ्नों की बाधा नहीं होती यह बहुत बड़ी बात नहीं है क्योंकि तुम भक्तों के

उनतीसवाँ अध्याय ७७१
प्रेम में भूलकर सदासर्वदा भक्तों के अधीन होकर रहते हो। तुमने अपने दासों के अधीन रह कर (द्रौपदी के लिये
दुर्वासा को) आधीरात को भी अन्न की आपूर्ति की। अन्त में तुम तो भूखे ही रह गये। तुम्हारे हिस्से में सब्जी का
पत्ता ही आया। दोनों सेनाओं के बीच शस्त्रों की झंकार में अर्जुन के रथ का सारथी बनकर तुमने कष्ट सहे। अन्त
में उनके घोड़ों की भी धुलाई की। तुम्हारे मुकुट का आकलन वेदों को भी नहीं होता। घोड़ों की लगाम खींच
कर तुम वहीं घोड़ों को धोने लगे। तुम्हें इसमें लाज भी नहीं आयी। तुम भक्तों के इतने अधीन हो जाते हो यह
निश्चित है। जिसे कारागार से छुड़ाया, उस उग्रसेन को तुमने राजा बनाया; धर्मराज के घर की तो तुमने जूठन
उठायी; और नन्द के गौओं की रक्षा की। अस्तु ! तुम बालगोपालों के साथ मिलकर उनके साथ खड़े-खड़े भात
खाते थे और उनकी ही ताल पर नाचते थे। छुआछूत की बात नहीं की; वे केवल चरवाहा थे लेकिन उनका
उच्छिष्ट खाकर तुम स्वानंद में झूमते रहे। द्रौपदी पर आये भीषण संकट के समय उसकी पहनने वाली साड़ी तुम
स्वयं ही बन गये। गोपियों के प्रति प्रेम के कारण तुम उनके साथ नानाप्रकार से नाचे। एक गोपी पानी से भरी
गगरी लेकर जा रही थी, उसके पैर में काँटा गड़ा तो तुमने दोनों हाथों से उसका पैर पकड़कर काँटा निकाल
दिया। दुर्वासा को तुमने कन्धे पर वहन किया; बली के तो तुम द्वारपाल बन गये। इस प्रकार तुम भक्तों के अधीन
रहकर उनकी बात मानते हो। भगवान आप कहेंगे कि केवल मैं ही तुम्हारे गोपालत्व को सत्य मानता हूँ लेकिन
ऐसी बात नहीं है क्योंकि देवताओं को भी तुम पूज्य हो। हे श्रीकृष्ण! इन्द्र, चन्द्र, महेन्द्र, ब्रह्मवेद, बृहस्पति और
शंकर ये जो पूज्य देवता हैं, वे भी तुम्हारे दास हैं। तुम्हें नमस्कार करने के लिये देवताओं की भीड़ एकत्र होती है
जिससे तुम्हारी आसनी पर उनके कोटि-कोटि मुकुटों का घर्षण होता है जिसकी तीव्र झंकार उठती है। तुम्हारी
आज्ञा का पालन न करने पर ब्रह्मदेव जैसे देवता के मस्तक पर भी प्रहार होता है। तुम्हारी आज्ञा के भय से वायु
भी नियम से प्राण का संचालन करता है। उसी प्रकार हे गोविन्द ! तुम्हारी आज्ञा के भय से ही सूर्य दिनमान
चलाता है। तुम्हारी ही आज्ञा के भय से समुद्र सीमा का उल्लंघन नहीं करता और तुम्हारी ही आज्ञा से मेघ
यथासमय जल की वृष्टि करता है। तुम्हारी आज्ञा की महानता अगाध है। उसे साक्षात मृत्यु भी शिरसा वन्दन
करता है। योग्य समय पर ही वह प्रलय लाता है। आज्ञा के विपरीत काम नहीं करता। (आशंका) हे मुरारी !
शायद तुम कहोगे-कि मैं तो नंद का चरवाहा हूँ, उग्रसेन की सेवा करता हूँ इसलिये मेरा यह बखान व्यर्थ है।
लेकिन ऐसी बात नहीं है। तुमने काल के भी दाँत तोड़ कर गुरु के पुत्र को जीवित किया; इन्द्र ने गोकुल पर
अतिवृष्टि की उस समय तुमने उसे अच्छा सबक सिखाया। औरों की क्या बात करें ? गोपालों के साथ वत्स
बनकर तुमने ब्रह्मदेव को भी पागल बना दिया, अन्त में नंद के चरवाहा ही बन कर रहे। बाणासुर की पैरवी
करने के लिये शंकर लाल-लाल आँखें दिखाते हुए आये थे, किन्तु हे शारंगपाणी! हे ईश्वरेश्वर! तुमने आधे ही
क्षण में उन्हें पराजित किया। तुमसे भेंट करने की उत्कंठा क्षीरसागर वाले नारायण को लगी हुई थी। वह ब्राह्मण
लड़के के बहाने तुमसे भेंट करने की इच्छा कर रहा था। तुम भक्तों का कार्य सिद्ध करने वाले सिंह हो। अर्जुन
की प्रतिज्ञा सत्य करने के लिये कृष्ण-नारायण ने क्षीरसागर से भेंट की। उन दोनों के मिलन का आनन्द या रहस्य
संत ही जानें। उन दोनों ने एक-दूसरे को प्रगाढ़ आलिंगन में बाँध लिया। उस समय निजात्मसुख की माधुरी
अभिन्न थी। कृष्ण में नारायण मिले या नारायण में कृष्ण लीन हुए, यह समझ में ही नहीं आया। दोनों का द्वैतभाव
जाकर परिपूर्ण एक ही स्वरूप रह गया। तब अर्जुन को व्यथा हुई। उसे लगा मैं व्यर्थ ही कृष्ण से दूर चला गया।
इतने में उसे शेषशय्या पर श्रीकृष्ण ही नारायण स्वरूप में दिखाई दिये। तो तुम इस प्रकार भक्तों की सहायता
करने वाले तथा लीला भय से शरीर अवतार लेने वाले पुरुष हो। हे दीनोद्धारक श्रीकृष्ण! तुम नाना प्रकार के

अवतार धारण करते हो। इस प्रकार हे ऋषीकेशी ! तुम्हारी महिमा अगाध है। यह बात तुम्हारे इसी अवतार में
समझ में आयी। अखण्ड ऐश्वर्य की स्थिति, माया के आवरण के बिना होने वाली ज्ञानस्फूर्ति, अद्वयानंद कभी
च्युत नहीं होता इसलिये तुम्हें 'अच्युत' कहते हैं। इस प्रकार तुम अनंत और अपार हो। नियंता ईश्वर के भी
ईश्वर हो; भक्तों पर करुणा करने वाले हो। उसके बारे में भी सुनो। देवताओं के नमस्कार के लिये भी दुर्लभ तुम
रामचन्द्र लीलावतार चरित्र में रीछ और वानर को आलिंगन दे रहे थे। तुमसे बात करने के लिये वेद भी प्रतीक्षा
करते रहते हैं और तुम वानरों के कान में कहानियाँ सुना रहे थे। तुम्हारा ज्ञान वेदशास्त्रों की भी समझ में नहीं
आता। तुम वानरों से सलाह ले रहे थे और उनकी सलाह पर चल रहे थे। यज्ञों की आहुति भी तुम सरलता से
नहीं लेते लेकिन तुम बड़े प्रेम से वानरों के दिये फल उन पर कृपा करने के लिये खा रहे थे। इस प्रकार तुम
भक्तों के प्रेम का ख्याल करते हो। तुझमें विषमभाव नहीं है। तुम सारे संसार के आत्माराम हो। तुम अंतर्यामी के
निजसखा हो। तुम हृदयस्थ परमात्मा हो। तुझ में भूतों और भौतिकों के प्रति भिन्न भाव नहीं है। तुम जड़ को
चेतनता प्रदान करते हो, मूढ़ को ज्ञान देते हो और समस्त प्राणिमात्र को आनन्द प्रदान करते हो; तुम्हारी चित्सत्ता
पर ही सारा संसार चल रहा है। माता-पिता के प्रेम में सांसारिक भावना रहती है। तुम हृदयस्थ निजसखा हो तथा
सभी को सुख प्रदान करने वाले हो। इस प्रकार तुम सबके हृदय में वास करते हो तथा समर्थ होने के कारण
सबको वंद्य हो। तुम दीनों के कृपालु स्वामी हो तथा उनका हृद्गत जानने वाले हो। इस प्रकार, हे श्रीकृष्ण ! तुम
भक्तों के दीनदयाल हो। ऐसे प्रभु को छोड़कर सम्पत्ति से उन्मत्त हुए लोगों का भजन कौन करेगा?
तं त्वाखिलात्मदयितेश्वरमाश्रितानां सर्वार्थदंस्वकृतविद् विसृजेत को नु।
को वा भजेत् किमपि विस्मृतयेऽनु भूत्यै किं वा भवेन्न तव पादरजोजुषां न ॥ ५ ॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ये मायागुणों के अवतार हैं और तुम माया का नियंता ईश्वर होकर भक्तों पर
करुणा करने वाले एवं सुखदाता हो। तुम्हारी भक्ति करने से चारों पुरुषार्थ और चारों मुक्ति भक्तों को दण्डवत
करती आती हैं। तुम भगवान सर्वज्ञ होने के कारण भक्तों का मनोगत जानते हो। इतना ही नहीं बल्कि उन्हें जो
चाहिये वह सब तुम उन्हें देते हो। भावार्थ का भोक्ता एक तुम श्रीकृष्ण ही हो। वह लक्षण तुम्हारे सिवा किसी
और पर लागू नहीं होता। तुम उत्तमोत्तम स्वामी हो, तुम्हारे कारण साधकों को अत्यन्त सुख प्राप्त होता है। तुम्हारे
जैसा कोई अन्य है ही नहीं। तुम पुरुषोत्तम सबके स्वामी हो। तुम सभी के स्वामी हो; किन्तु अपने भक्तों पर
कृपालु हो। अग्नि, विष आदि संकटों से तुमने ही प्रह्लाद को बचाया। तुम्हें भक्तों पर करुणा आती है; उत्तानपाद
राजा के नन्हे बालक को वैराग्य सम्पन्न कर, उस ध्रुव को तुमने अटल बना दिया। विभीषण शत्रु का भाई था
लेकिन अनन्य भाव से तुम्हारी शरण में आया, उस पर कृपा करने के लिये तुमने रावण का उसके कुल के साथ
उद्धार किया। तुमने बली को धोखा देकर बाँधा लेकिन अन्त में तुझमें इतनी अधिक करुणा उपजी कि तुम लाज
छोड़कर उसके घर के द्वारपाल बन गये। इस प्रकार तुम्हें भक्त पर करुणा हो आती है; तुम भक्त के हृदय की बात
जानते हो। ऐसे स्वामी को छोड़ धनांध लोगों की कौन सेवा करेगा ? देहेन्द्रियों को सुख का जो आभास होता है
वह तुम्हारे ही सुख का अंश होता है। इस प्रकार तुम अपने सारे सुखों की निधि के साथ अनायास ही अपने
भक्तों पर प्रसन्न होते हो। केवल साधु ही तुम्हारी महिमा जानते हैं, तुम ज्ञानी पुरुषों का अभेद आत्मा हो। हे
पुरुषोत्तम ! तुम भक्तप्रिय हो। तुम्हारे सुख का कोई अन्त नहीं है। तुम्हारी सेवा के प्रेम के कारण भक्त आत्मसुख
से सुखी होते हैं। दैहिक द्वंद्वों के अथवा जन्म-मरण के दुःख स्वप्न में भी उनके निकट नहीं आयेंगे। तुम्हारे भक्त

उनतीसवाँ अध्याय ७७३.
तुम्हारे भजनसुख के कारण विषयों के प्रति विरक्त होकर समुद्रवलयांकित पृथ्वी का राज्य भी तुच्छ मानकर त्याग
देते हैं। सारे ऐश्वर्य के साथ यदि स्वर्ग भी भक्तों के पास आ जाय, तो जिस प्रकार राजहंस कीचड़ का कुण्ड
छोड़ देते हैं, उसी प्रकार वे भी स्वर्ग की उपेक्षा करते हैं। जो भजन में तल्लीन हो जाते हैं उन्हें तुम सुख स्वरूप
बना देते हो और देह में होते हुए भी विदेही बना देते हो। ऐसे भक्त सर्वत्र समभाव रखते हैं। हे श्रीकृष्ण! तुम
सर्वश्रेष्ठ स्वामी इस प्रकार भक्तों पर सदा सन्तुष्ट रहते हो। तुम्हारी सेवा करना भी कठिन नहीं है। सेवा करने के
लिये परदेश जाने की आवश्यकता नहीं होती। उसी प्रकार सेवा के लिये किसी विशेष समय की आवश्यकता
नहीं होती। सबके हृदय में रहने वाले तुम रात-दिन भक्तों के पास ही रहते हो। तुम्हारी सेवा के लिये धन की
आवश्यकता नहीं होती, अथवा शारीरिक कष्ट की भी जरूरत नहीं होती। तुम्हारे चरणों में मन रखना ही पर्याप्त
है। इतने से ही तुम स्वानंदधन सन्तुष्ट होते हो। सन्तुष्ट होकर तुम प्रपंच का भ्रम दूर करते हो। त्रिगुणों के साथ
सारा त्रिकूट मिथ्या होकर नष्ट हो जाता है। तुम ऐसे सेवनीय तथा कृपालु और दीनदयालु स्वामी हो। जो तुम्हारी
सेवा का त्याग करता है वह संभ्रमित, मूर्ख और मन्दबुद्धि है। पलकों का झपकना भी तुम्हारी ही इच्छा से होता
रहता है। तुम्हारी सेवा से जो पुरुष विन्मुख रहते हैं, वे भाग्यहीन और अत्यन्त पामर हैं। तुम्हारी सेवा सुख
स्वरूप ही है। उसकी उपेक्षा कर जो सर्वदा विषयों की विषैली लहरों की इच्छा करता है वह मूर्ख है जिन
विषयों का विशय लेश पास के आत्मसुख का विनाश करता है और जन्म-मरण के फन्दे में फँसा कर दुःसह
दुःख भोगने को विवश करता है, उन विषयों के विषदाता इन्द्र-महेन्द्र आदि अत्यन्त कंजूस रहते हैं। जो विषय
स्वार्थ के लिये उन्हें भजते हैं वे भी सचमुच भाग्यहीन ही हैं। भगवन्! तुम्हारी कृपा से तुम्हारे भक्त अत्यन्त
सुखसम्पन्न, अत्यन्त समर्थ एवं संसार में रहकर भी विरक्त हो जाते हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। तुम्हारे
चरणरज की सेवा करने वाले जो पृथुजनकादि राजा हैं, उन्हें इन्द्रादिक देवता भी वन्दन करते हैं और ऋद्धि-
सिद्धि भी उनके चरण छूती हैं। आकल्प तपश्चर्या कर जिन सिद्धियों की प्राप्ति नहीं होती, वे भक्तों की शरण में
आती है, इतनी तुम्हारी भक्ति श्रेष्ठ है। अन्य साधनों की अपेक्षा तुम्हारे भजन में मन रखने से सारी सिद्धियाँ
स्वाभाविक रूप से भक्तों की शरण में आती हैं। इस प्रकार भक्तों पर तुम्हारे अपार उपकार होते रहते हैं। उस
श्रीहरि के चरणों में लीन होने पर ही उस उपकार से उऋण हुआ जा सकता है। विलीन होना उसी प्रकार जैसे
प्रतिबिम्ब बिम्ब से मिल जाय, अथवा घट का आकाश महादाकाश में प्रवेश करे। इस प्रकार यदि तुझमें विलीन
न हों तो तुम्हारे उपकार की परिपूर्ति नहीं होती क्योंकि जो हमारे सारे मनोरथ पूर्ण करता है, उसे भूलना
अधःपतन है।
नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश ब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुदः स्मरन्तः।
योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्वन्नाचार्यचैत्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति ॥ ६॥
सचमुच, तुझमें विलीन न होकर जो पुरुष ब्रह्मायु होकर, योगयाग करके थक गये, फिर भी उससे तुम्हारे
उपकारों की पूर्ति नहीं हुई। अस्तु! ज्ञानसम्पन्न लोग नाना प्रकार के साधन करते हैं, फिर भी उससे तुम्हारे
उपकारों की पूर्ति रत्तीभर भी नहीं होती। वह उपकार कौन सा है? तो हे दयासागर! तुम अपने भक्तों के अन्तर
के और बाहर के पातक नष्ट कर देते हो। अंतःकरण के पातक अंतर्यामी के रूप में तथा बाहर के पातक सद्गुरु
के रूप से तुम संकल्प के साथ विलीन कर देते हो। अंतर्यामी और सद्गुरु इन दोनों रूपों से तुम्हीं करुणा कर
भक्तों का संसारभार दूर कर आत्मनिश्चय धारण कराते हो। आत्मनिश्चय होने का लक्षण यही है कि 'मैं' तू बन
सहज ही विलीन हो जाता है; देहाभिमान अपने आप दूर हो जाता है; और जन्म, जरा, मरण का ही विलय हो

७७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जाता है। जन्म, जरा, मरण समाप्त होने पर भक्त सहज ही आनंदघन होकर रहते हैं। तुम्हारी इस कृपा से भक्त
पूर्णरूप से उपकृत हो जाते हैं। हे कृपामूर्ति ! तुम अपनी ऐसी स्वरूपस्थिति भक्तों को अर्पण करते हो। हमारे
स्वामी तुम श्रीकृष्ण, त्रिभुवन में देवताओं के भी पूज्य हो। ऐसे तुम्हारे प्रसाद से भक्त स्वानंद से सुखी होते हैं
और शेष प्रारब्ध के अनुसार सदा स्वानंद बोध से विचरण करते हैं। वे देह में होते हुए विदेही और कर्म करते
हुए अकर्ता बने रहते हैं। इस प्रकार भक्तों पर तुम्हारे अनेक उपकार हैं। उनसे वे कैसे उबर पायेंगे ? उबर पाने के
लिये वे क्या करें ? क्योंकि मन को मनपन तुम्हारे ही कारण आता है। बुद्धि को निश्चय तुम्हारे ही योग से आता
है; और इन्द्रियों का स्फुरण तुम्हारे ही कारण होता है। आँखों का खुलना, बन्द होना तुम्हारे ही योग से होता है।
ऐसे तुम्हारे नित्य नये उपकार हैं। तुम्हारे उन उपकारों की पूर्ति मनुष्यों से कभी नहीं होगी। जो भी कोई साधन
करो वह तुम्हारी ही कृपा से सिद्ध होता है। इस प्रकार उपकार कर तुमने बड़े-बड़े लोगों का उद्धार किया है।
लेकिन जिससे भोले-भाले लोग सुलभ तरीके से यह संसारसमुद्र तर सकें ऐसा उपाय बताओ। हे कृपामूर्ति
श्रीकृष्ण ! भले, श्रद्धालु स्वस्वरूप की प्राप्ति सुगम रीति से कर सकें ऐसा उपाय बताओ। तुम्हारे निजधाम जाने
के बाद, हे मेघश्याम ! हे पुरुषोत्तम ! जिससे दीन दुर्बल तर कर जा सकें ऐसा उपाय मुझे बता कर रखिये। यह
कहकर उद्धव ने दण्डवत किया और श्रीकृष्ण के चरण मस्तक से लगाकर बोला, गरीब श्रद्धालु लोगों के तरने
का उपाय बताइये। उद्धव ने दीनजनों का तथा त्रिभुवन का भी उद्धार हो इसलिये प्रार्थना की। उसे सुनकर
कृपासागर श्रीकृष्ण सन्तुष्ट हुए। उद्धव ने इस प्रकार श्रीकृष्ण की प्रार्थना की यह देखकर शुक्राचार्य को भी मन
ही मन आनन्द हुआ और आनन्द के उसी आवेग में उन्होंने कहा, हे राजा परीक्षित ! ध्यानपूर्वक सुनो। त्रिभुवन
का उद्धार करने के लिये सुगम उपाय बताने के लिये उद्धव ने श्रीकृष्ण से बिनती की, इससे दयासागर श्रीकृष्ण
सन्तुष्ट हुए। संसाररूपी समुद्र को तारने के उपाय का बीज जिस मार्ग से सुलभ रीति से साध्य होगा, उसे श्रीकृष्ण
अब बताएंगे। श्रीकृष्णनाथ निजधाम को चले जाने के बाद सारे दुर्बल लोगों को तरने के लिये तथा ब्रह्म प्राप्ति के
लिये उद्धव ने यह सेतु ही बना दिया है। उद्धव ही इस प्रश्नोत्तरी से शुक्राचार्यजी को भी अत्यन्त आनन्द हुआ
और उसी का निरूपण वे परीक्षित को सुना रहे हैं।
श्रीशुक उवाच
इत्युद्धवेनात्यनुरक्तचेतसा पृष्टो जगत्क्रीडनकः स्वःशक्तिभिः ।
गृहीतमूर्तित्रय ईश्वरोश्वरो जगाद सप्रेममनोहरस्मितः ॥ ७ ॥
जो ज्ञानियों का शिरोमणि है, जो ब्रह्मचारियों का मुकुटमणि है, योगियों में जो अग्रगण्य है, जिन्हें सिद्ध भी
वन्दन करते हैं; जो ब्रह्मज्ञान का निजनिधि है, जो स्वानंदबोध का समुद्र है, जो भूतदया का क्षीराब्धि है, वह शुक
स्वानुभव से बताने लगा। हे भाग्यवान परीक्षित ! पाण्डव कुल की तुम अगाध कीर्ति हो, कौरव कुल में तुम्हारे
रूप से भक्ति कायम है। त्रिभुवन में आजकल धर्म संस्थापक तुम ही हो। मेरी बात सुनो। संसार का जो यह
अद्भुत रूप दिखायी देता है, वह उसकी लीला का एक खिलौना है। वह खिलौना भी वह स्वयं ही बनकर,
अलिप्त होकर खेलाता है। अद्भुत दिखायी देने वाला यह संसार, उसकी सत्ता से क्रीड़ा करता है और यह सारा
संसार ही जिसका क्रीड़ास्थल है, उसके कारण ही संसार को संसारपन प्राप्त हुआ है। इस प्रकार जगद्रूप से
क्रीड़ा करने वाला श्रीकृष्ण, जो ईश्वर का भी ईश्वर है; मायादि तीनों गुण उसके ही योग से प्रकाशित होते हैं।
मायागुणों के अवतार जो उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने वाले ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं वे भी उसके

उनतीसवाँ अध्याय ७७५
आशाधारी हैं। श्रीकृष्ण से अनेक लोगों ने प्रार्थना की थी, लेकिन वह सब उनके अपने कार्य तक सीमित थी
किन्तु उद्धव ने नम्रतापूर्वक जो प्रश्न पूछा वह संसार के उद्धार के लिये उपकारी था। उस प्रश्न से श्रीकृष्ण को
अत्यन्त संतोष हुआ वे अब सुगम उपाय से ब्रह्मप्राप्ति का साधन बतायेंगे। इसलिये, जिससे भोले-भाले
श्रद्धालुजन तत्काल समाधान प्राप्त कर सकें ऐसा सरल ब्रह्मज्ञान श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं। ज्ञानमार्ग के राही
यदि जीवभाव से छलांग लगायेंगे तो उद्धव के प्रश्न की चाह से उन्हें भी सुलभ रीति से ब्रह्मज्ञान प्राप्त होगा।
मोहमाया की जंजीर पहनकर जो अहंकार के कारागार में पड़े हुए हैं, उन्हें भी तत्काल छुटकारा प्राप्त हो, इसकी
उद्धव के मन में चिन्ता थी। उद्धव भाग्यवान था, उसने संसार का उपकार करने के लिये प्रश्न किया; इसलिये
श्रीकृष्ण सन्तुष्ट होकर, अत्यन्त आदर के साथ बोलने लगे। श्रीकृष्ण का मुख वैसे भी सुन्दर था, तिस पर मनोहर
हास्ययुक्त हो जाने के कारण वह और भी अधिक रमणीय दिखायी देने लगा। श्रीकृष्ण उल्हास से, गम्भीर वाणी
में बोलने लगे।
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि मम धर्मान् सुमङ्गलान्।
याञ्छ्रद्धयाऽऽचरन् मर्त्यो मृत्युं जयति दुर्जयम्॥८॥
जो प्रणव का शुद्ध सार है, जो ज्ञान की सच्ची लगन है, जो चैतन्य का मानों चमत्कार हैं और जो परावाणी
से भी परे है, वे श्रीकृष्ण मेघसमान गम्भीर वाणी से गर्जना करते हुए स्वानंद से बोले, उद्धव! तुम्हारी वाणी धन्य
है। तुम्हारे प्रश्न से मुझे समाधान हुआ। यदि भोले-भाले लोगों को सुगमरीति से ब्रह्मप्राप्ति होनी है तो उसके
लिये मेरी भक्ति समर्थ है। मैं श्रीकृष्ण सदा उसके ही वश में रहता हूँ। मेरा अनन्य भाव से भजन करने से मैं
सदा भक्त के अधीन रहता हूँ। उसमें जाति, गोत्र, ज्ञातापन, ऊँच-नीच, वर्ण आदि मैं कुछ भी नहीं देखता। अब
जिससे उत्तम भजन हो सके, वह भागवत धर्म तुम्हें बताता हूँ। इससे कर्माकर्म आदि सब नष्ट होकर जन्म-मरण
का भी नाश होता है। उस धर्म का स्वयं आचरण करने से भवव्यथा समूल खन कर बाहर निकल आती है। उस
धर्म के योग से साधकों को स्वभावतः सुख सम्पत्ति प्राप्त होती है। जिस धर्म का स्तवन करने से असत्यादि दोषों
का निर्मूलन होता है, जिस धर्म का निष्ठापूर्वक श्रवण करने से विषयवासना का नाश होता है, वे मेरे धर्म अत्यन्त
पवित्र हैं तथा कलियुग के पातकों और दोषों को नष्ट करने वाले हैं; उनके भजन से मंगल का भी मंगल होता
है। मेरे धर्म का श्रद्धापूर्वक आचरण करने से मेरे स्वरूप के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है और उससे भवभ्रम नष्ट
होकर जन्म-मरण चूक जाता है। जो मृत्यु ब्रह्मदेव को भी निगल लेता है; हरिहर का भी संहार करता है, वह
मृत्यु संसार में अत्यन्त असाध्य है। देवदानव भी उससे थर-थर काँपते हैं। उस मृत्यु का भय खनकर बाहर
निकालकर, कलिकाल के दाँत तोड़कर; मेरे भक्त अद्वय भजन से संसार में सुखपूर्वक रहते हैं। उद्धव! तुम मेरे
निजसखा हो, इसलिये मेरे भजन का सामर्थ्य उसकी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर संक्षेप में बताता हूँ, सुनो।
कोटि-कोटि शस्त्रों का घाव शरीर पर लगने पर भी वीर योद्धा उसमें से बच जाता है लेकिन वही मर्म पर एक
ही प्रहार होने पर तत्काल मर जाता है। उसी प्रकार नानाप्रकार के साधन करने से भी जन्म-मरण नहीं टलता
लेकिन मेरा थोड़ा-सा भी भजन करने से उनका समूल विनाश हो जाता है। शुक्राचार्य एकनाथ के मुख से बोलते
हैं। घनश्याम मेघ यही एक बड़ा मेघ है; उसने उद्धवरूपी चातक के लिये स्वानंदरूपी जीवन की वृष्टि की
जिससे त्रिभुवन सुखी हुआ। वर्षाकाल समाप्त होने पर शरदऋतु का जल अत्यन्त मनोरम दिखायी देता है, उसी

७७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकार यह उनतीसवाँ अध्याय भजन से समर्थ होने के कारण उसमें सुख के कल्लोल सुनाई देते हैं। एकादश
स्कंध के अन्त में सुगम रीति से ब्रह्मप्राप्ति हो इसलिये श्रीकृष्ण स्वमुख से भक्ति के उत्तम से उत्तम प्रकार बता
रहे हैं।
कुर्यात् सर्वाणि कर्माणि मदर्थं शनकैःस्मरन् ।
मय्यर्पितमनश्चित्तो मद्धर्मात्ममनोरतिः ॥ ९॥
देशाचार, कुलाचार अथवा वृद्धाचार आदि के अनुसार प्राप्त हुए वेदोक्त नित्यनैमित्तिकादि कर्तव्यों को
'कर्म' कहते हैं। इसी में मेरे सन्दर्भ में किये हुए कर्म को 'साधारण' मदर्पण कहते हैं और कर्म के अन्दर बाहर
मैं ही हूँ यह जानकर किये हुए कर्म को 'मुख्य-मदर्पण' कहते हैं और यह बिना प्रयास किये होता है। सारा कर्म
मेरे ही कारण प्रकाशित होता है; कर्म क्रिया मेरे ही कारण भासित होती है; इस दृष्टि से जहाँ समूल कर्म को
देखा जाता है वह अनायास होने वाला मदर्पण है। कर्म का आदि मैं; कर्मकर्ता मैं; कर्म में कर्मसिद्धि का दाता मैं;
कर्म में कर्म का फलभोक्ता भी मैं, इसी को कर्म का 'कृष्णार्पण' कहते हैं। परन्तु सहसा मन ऐसा नहीं करता।
इसके लिये धीरे-धीरे अनुसंधान अखण्ड चालू रखने से मन स्वस्वरूप में प्रवीण अर्थात् तल्लीन होता रहता है।
लेकिन जब मन को यह अनुसंधान अच्छा न लगने लगे, उस समय मेरा नामस्मरण करें। मेरे स्मरण से मन मेरे
भजन में अनुसंधान करने लगता है। भजन का इस प्रकार अभ्यास बढ़ने पर, मन को आत्मस्वरूप से प्रीति होने
लगती है और फिर बुद्धि भी वहीं डुबकी लगाती है और अभिमान भी देह की अहंता छोड़ देता है। मन को मेरे
स्वरूप से अलग कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार मन मेरे प्रति रहने से उसे 'मदर्पण' कहते हैं। इस प्रकार
मत्स्वरूप में मन निमग्न हो जाय तभी उसे मेरा भजन अच्छा लगा ऐसा समझना चाहिये। मेरी भक्ति से ही मेरे
भक्त परम पावन होते हैं। तुम कहोगे कि विषयनिष्ठ मन भजन का अनुसंधान कभी नहीं करेगा। उसके लिये भी
श्रीकृष्ण उत्तम उपाय बता रहे हैं।
देशान् पुण्यानाश्रयेत मद्‌भक्तैः साधुभिः श्रितान् ।
देवासुरमनुष्येषु मद्भक्ताचरितानि च ॥ १० ॥
कुरुक्षेत्र यह पवित्र देश है; अयोध्या भी पवित्र देश है। गंगायमुना के दोनों किनारों पर के प्रदेश और
अर्बुदाचल भी अत्यन्त पवित्र है। कलापग्राम, नंदिग्राम, बद्रिकाश्रम देश भी अत्यन्त पवित्र हैं। पंचवटी का श्रीराम
का आश्रम और गोदावरी तट भी अत्यन्त पवित्र है। जहाँ श्रीराम ने अपने चरण रखे थे वह दण्डकारण्य भी
अत्यन्त पवित्र देश है। मथुरा, गोकुल, वृन्दावन और ब्रह्मगिरी भी अत्यन्त पावन हैं। पांडुरंग क्षेत्र भी अत्यन्त
पावन है, उसी को दक्षिण द्वारावती भी कहते हैं। वहाँ विठ्ठल की मूर्ति है जहाँ पंढरी का जयघोष होता है।
पंचक्रोशी काशी तो सभी पातकों का संहार करती है। वाराणसी यह देश पुण्यकारक होते हुए साधकों के लिये
अत्यन्त सहायक है। जहाँ पवित्र नदियाँ बहती हैं, वह प्रदेश भी साधकों के लिये पवित्र है। गंगा, यमुना,
सरस्वती, साबरमती, वैतरणी, गंडकी, नर्मदा, तापी, गोदावरी, भीमा, कृष्णा, वेण्या, तुंगभद्रा, गोमती ये नदियाँ
तथा श्रीशैलस्थान भी पावन है। कावेरी के दोनों तट तथा चिदम्बर क्षेत्र भी पवित्र है। प्रतीची नदी भी उसी प्रकार
पवित्र है। उसके जल से मनुष्य पावन होते हैं। कृतमाला, पयस्विनी, अत्यन्त पवित्र ताम्रपर्णी, उसी प्रकार
नैमिषार अरण्य के पवित्र प्रदेश ये सब साधकों के सेवन के लिये सुयोग्य स्थल हैं। इस पवित्रता की महिमा
छोड़िये। पवित्रता की अपेक्षा भी एक और बात है। जहाँ सज्जन भक्त रहते हैं, वह देश भी सभी दृष्टियों से