श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कीर्ति, भक्ति और सत्संगति इस त्रिवेणी का जिसे स्नान होता है, उन्हें विघ्न स्पर्श भी नहीं करते, उनके कारण
त्रिभुवन पावन हो उठता है। मेरी भक्ति और नामकीर्ति की सत्संगति माता समान है। वह सत्संग प्राप्त हो जाय तो
साधकों को विघ्नों की बाधा नहीं होती। योग, याग, आसन, ध्यान, तप, मंत्र, औषधि आदि साध्य करने से भी
देहाभिमान नहीं छूटता। लेकिन सत्संग से वह समूल नष्ट हो जाता है। योग आदि समस्त उपायों से छोटे-छोटे
विघ्न दूर हो जाते हैं लेकिन सारे विघ्नों का राजा देहाभिमान उनसे नहीं हिल पाता। देहाभिमान असाध्य है, वह
विद्वत्ता के अहंकार से तो और भी भयंकर हो उठता है। इसका समूल निर्दलन केवल सत्संग ही कर सकता है।
अज्ञानी लोगों का अभिमान तो तत्काल चला जाता है लेकिन ज्ञानाभिमान वैसा नहीं है। वह जानकार के लिये
सदा बाधक होता है। लेकिन सत्संग उस अभिमान का भी पीछा कर उसका अस्तित्व समाप्त कर देता है,
इसलिये सत्संग जैसा अन्य कोई साधन नहीं है। देह को ही अजर-अमर करने की कोई बात करता है तो उस
मूर्ख के चक्कर में पड़कर लोग योगादि साधन को सिद्ध करने के फेर में पड़ जाते हैं।
केचिद् देहमिमं धीराः सुकल्पं वयसि स्थिरम्।
विधाय विविधोपायैरथ युञ्जन्ति सिद्धये ॥ ४१ ॥
देह प्रारब्ध के वश में है; उसे प्रारब्ध से ही जन्म और मरण आता है। उस देह को पामर अमर करने का
प्रयत्न करते हैं। उस प्रारब्ध का सूत्र काल के हाथ में रहता है इसलिये काल द्वारा निर्धारित जन्म और मरण
सबके पीछे लगा ही रहता है। मार्कण्डेय को चौदह कल्प की आयु थी, फिर भी काल ने उसे दबोचा ही;
लोमहर्ष का एक-एक केश एक-एक युग में झरता था, उसका गला भी काल ने दबा ही दिया। चार-हजार युगों
का एक दिन ऐसी जिस ब्रह्मदेव ने कालगणना कर दी है वह सारी सृष्टि का कर्त्ता ब्रह्मदेव, वह भी काल की
सत्ता से नहीं बच पाता। उत्पत्तिकर्ता ब्रह्मदेव को काल निगल लेता है, उसी प्रकार पालनकर्ता विष्णु को भी वह
ग्रस लेता है, वह प्रलयकर्त्ता रुद्र को भी अपने सामर्थ्य से भस्म कर देता है। इस प्रकार काल अत्यन्त असाध्य है,
लेकिन यह जाने बिना अविचारी लोग देह को अजर-अमर करने के लिये काल पर ही प्रभाव जमाने का प्रयास
करते हैं। जो-जो दिखायी देता है, वह सब नष्ट होता है। काल की यह सत्ता देखकर भी मूर्ख लोग अजर-अमर
होने के लिये कितना प्रयास करते हैं। जलकुण्ड का तरंग अमर होने की इच्छा करता है तभी जलकुण्ड सूख
जाता है। उसी प्रकार यह संसार नाशवान है; उसमें पामर लोग देह को अजर-अमर करने की इच्छा करते हैं और
उसके लिये अथक प्रयास करते हैं। देह जाता है तो उसे जाने दें किन्तु जीव चिरंजीव रहे और उसके लिये प्रयास
करें, उसी में नरदेह का अमरत्त्व है। देह तो पूरी तरह नाशवान है; अविवेकी लोग उसे अनेक कष्टकारी उपायों
से अजर-अमर करने का प्रयत्न करते हैं। देह तो काल का एक खाद्य है, उसे अमर करने का उपाय साधक के
लिये हानिकारक होता है। सारांश, मूर्खतावश, देह के अमरत्व के लिये उपाय कर हठयोगी ठगे गये हैं। परकाया
प्रवेश साधने के लिये प्राण धारण करते-करते योगी थक गये हैं। सारांश, देहाभिमान के कारण ही योगी लोग
अपनी हानि कर चुके हैं। देह की नश्वरता को जान कर ही ज्ञानी लोग देहाभिमान नहीं करते। श्रीकृष्ण उसी का
निरूपण कर रहे हैं।
नहि तत् कुशलादृत्यं तदायासो ह्यपार्थकः।
अन्तवत्त्वाच्छरीरस्य फलस्येव वनस्पतेः ॥ ४२ ॥
विचार करने से मालूम होता है कि यह संसार समूल नश्वर है; इसलिये ज्ञानी लोग देह के अजर-अमर