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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 775, कुल 869 में से

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पृष्ठ 775

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५९
आत्मा नित्यमुक्त है, तीन गुणों से परे है; सर्वदा परिपूर्ण ही रहने के कारण वह आकाश से भी अत्यन्त
अलिप्त रहता है। ब्रह्म अखण्ड दण्डायमान होकर सदा सर्वदा आनन्दघन है। ऐसी अलिप्त वस्तु पर प्रपंच का
आरोप मिथ्या है। उस आरोप का अधिष्ठान भी स्वयं परमात्मा ही है। इसलिये प्रपंच का भान होता है। प्रपंच को
परमात्मा से अलग कोई स्थान ही नहीं है; इसलिये उत्पत्ति, स्थिति और लय का भी वहाँ भास होता है। रस्सी
वाला सर्प रस्सी से अलग नहीं दिखायी देता लेकिन वह रस्सी सर्प नहीं बन जाती, फिर भी वहाँ सर्प का आभास
होता ही है। उसी प्रकार ब्रह्म पूर्व निर्विकल्प है। उसे रूप, नाम, गुण, कर्म आदि स्पर्श भी नहीं करते। फिर भी
मन का भ्रम विषम प्रपंच की कल्पना करता ही है। जिस प्रकार रस्सी में मिथ्या सर्प का आभास होता है, उसी
प्रकार ब्रह्म में संसार का मिथ्या आरोप होता है। अर्थात्, उसमें सुख, दुःख, भय, कम्पन यह प्रयास भी मायिक
ही है। सारांश प्रपंच का भास मिथ्या है, आत्मवस्तु शुद्ध एवं आनन्दमय है। उसी प्रकार ब्रह्म परिपूर्ण एवं अद्वय
है, ऐसा निरूपण से स्पष्ट हुआ है। इस प्रकार अनेक युक्तियों से ब्रह्म की अद्वयता अबाधित रूप से सिद्ध की।
जो पण्डित यह नहीं मानते उनके मत का श्रीकृष्ण खण्डन करते हैं।
यन्नामाकृतिभिर्ग्राह्यं पञ्चवर्णमबाधितम्।
व्यर्थेनाप्यर्थवादोऽयं द्वयं पण्डिमानिनाम्॥ ३७॥
इस प्रकार वेदों द्वारा प्रतिपादित, सभी शास्त्रों का मतिमार्थ जो ब्रह्म है वह सदासर्वदा अद्वय ही रहता है यह
मैंने सिद्ध करके दिखला दिया। मेरे इस मत को पण्डित लोग झटक कर, अपने ज्ञान में अत्यन्त उन्मत्त होकर
अपने पांडित्य के अभिमान में चूर हो जाते हैं। उनका मत है कि जब प्रपंच अनुभव सिद्ध है, तो उसे मिथ्या
मानकर यह अद्वैत कहाँ से निकल आया? अद्वैत को स्थान ही नहीं है, कहीं भी जाकर देखिये, अद्वैत का कोई
निश्चित ठिकाना नहीं है। इसलिये वह सारा झूठ है। ये पण्डित लोग रूप, नाम, गुण, कर्म विषम से पंचमहाभूत
और भौतिक, चातुर्वर्ण्य और चार आश्रम ये सत्य हैं, ऐसा मानते हैं। इन्हें सत्य मानने का कारण यह है कि ये मन
के भ्रम से भ्रमित हुए रहते हैं, ज्ञानाभिमान के कारण फँस जाने के कारण वे अपने आप को ही भूल जाते हैं। वे
विषय के सुख को प्रमुख मानते हैं और उसके लिये उत्कृष्ट पुण्य कमाकर स्वर्ग का भोग अवश्य करना चाहिये
यही सत्य है, ऐसा मानते हैं। विषय को बिलकुल सच मानना यह देहाभिमान का असली मर्म है। उसने संज्ञान
लोगों को अधम बनाकर जन्म-मरण भोगने को बाध्य किया है। पुनः स्वर्ग, पुनः नरक, पुनः गर्भवास, इस प्रकार
पण्डित लोगों के अहंकार ने पठत मूर्ख बना दिया है। उनका ज्ञान वेदबाह्य होने के कारण बिलकुल ग्राह्य नहीं है।
अंत्यजों का अन्न जिस प्रकार अग्राह्य है, उसी प्रकार उनका ज्ञान भी अत्यन्त त्याज्य है। ज्ञानाभिमानी लोगों का
विचार अज्ञान का शुद्ध सार है। उनका जो दृढ़ निश्चय है वह सचमुच महामोह है। उनका विवेक इन्द्रायण फल
जैसा है, ऊपर से देखने में सुन्दर किन्तु भीतर विष से भरा हुआ। प्रपंच नामरूपात्मक है, मायिक होने के कारण
वह मिथ्या है यह बिलकुल सच है किन्तु ज्ञानाभिमानी उसे ही सच मानकर व्यर्थ की कचकच करते रहते हैं।
प्रपंच की रचना को यदि सत्य मानें तो 'मैं देह हूँ' यह बुद्धि माथे पर बैठ जाती है और दारिद्र्य में गिराती है।
उनकी योग्यता देखें तो उनका वेदपठन बिलकुल गायत्रीतुल्य रहता है। सारे शास्त्र, श्रुति, पुराण, इतिहास सब
कुछ उन्हें अवगत रहता है, उत्कृष्ट वक्तृत्त्व और समय-सूचक भाषण करने में पारंगत होने के कारण वह
अहंकार से फूल जाता है। अद्वैत का समाधान उन्हें मालूम नहीं होता फिर भी योग्यता का अहंकार कम नहीं
होता। ऐसे अहंकारी पण्डितों की बात गरीब अज्ञजनों को नहीं सुननी चाहिये क्योंकि देहाभिमान से जिन्हें लूट