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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 773, कुल 869 में से

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पृष्ठ 773

अट्ठाईसवाँ अध्याय ७५७
'एष स्वयंज्योति' का अर्थ यह है कि परमात्मा स्वप्रकाशघन है और साधक भी परमात्मा से अभिन्न होने
के कारण तद्रूप ही है। आत्मा अपने पूर्णत्व से ही परिपूर्ण है; उसे निराली माता, पिता कहाँ से होंगे? इसलिये
आत्मा को जन्म की बात ही नहीं है। त्रिगुणों के तीन प्रकार के मल समूल मिथ्या अर्थात् मायिक हैं। उनका
आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं होता। इसलिये आत्मा निर्मल है। अब उसे 'अप्रमेय' क्यों कहते हैं, यह सुनिये।
उसके सम्बन्ध में कोई प्रमाण नहीं बताया जा सकता। काला, गोरा, साँवला, नीला, सफेद, पीला अथवा यहाँ,
वहाँ, दूर, पास, इन सारे प्रमाणों से अलग ही परमात्मा है। 'महानुभूति' इस पद का अर्थ—आत्मा अखण्ड
दंडायमान अर्थात् सर्वव्यापी, अपने आत्मस्वरूप में ही समसमान तथा सदा-सर्वदा स्वानंदघन है। यहाँ देश, काल
वर्तमान, ध्येय, ध्याता, ध्यान अथवा ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञान; यह भी सच नहीं रहता। नाम, रूप, जाति, गोत्र और
क्रियाकर्म आदि से अलिप्त रहने वाला, उसे जन्म और मरण किसका? आत्मावस्तु सर्वदा स्वानंदपूर्ण ही रहती
है। वहाँ वृद्धि और ह्रास या आदि-मध्य-अन्त का खेल अथवा परिणामादि विकार आदि का भी प्रवेश नहीं
होता। तुम कहोगे कि पहले बताये हुए धर्म इसमें कैसे प्रवेश नहीं करते? तो 'सकलानुभूति' इस पद से
आत्मवस्तु सर्वोपरि अलिप्त है यह बताया गया है ऐसा समझना चाहिये। इस प्रकार धर्म और अधर्म, तथा
प्राणिमात्रों का क्रिया कर्म इनका प्रकाश मैं आत्माराम ही हूँ। श्रेष्ठ परमात्मा इससे भी अलिप्त है। घर के गंगाजल
को अथवा मद्य को आकाश का आवरण रहता है, लेकिन वह दोनों से ही अलिप्त रहता है। इस प्रक्रार परमात्मा
भी ज्ञान-अज्ञान से अलिप्त रहता है। जहाँ ज्ञान-अज्ञान का ही अभाव है, वहाँ कर्माकर्म को कहाँ स्थान है? इसी
का नाम है 'सकलानुभूति' यहाँ स्वानंद के कारण भेदभाव नहीं है। ऐसा परमात्मा परमानंदरूप है। इसमें
सजातीय, विजातीय तथा स्वगत का भेदभाव नहीं है। इस प्रकार आत्मवस्तु शुद्ध होती है, यह प्रसिद्ध ही है यह
आत्मज्ञान से जानना चाहिये। मैं देह हूँ यह कहना 'विजातीय भेद' है। मैं जीव हूँ यह कहना 'सजातीय भेद' है
और मैं ब्रह्म हूँ इस बात का स्फुरण यह 'स्वगत भेद' है। ये तीनों ही भेद परमात्मा को नहीं मालूम हैं। वहाँ युक्ति
प्रयुक्ति लक्षण की आवश्यकता नहीं होती। ब्रह्म परिपूर्ण एवं एक है। ऐसा एक ही अद्वितीय परब्रह्म आत्मगुह्य का
गुह्य है। जो इसे जान ले वह बहुत भाग्यवान है। उसे संसार भ्रम की बाधा नहीं होगी। देह में रहने पर भी उसे
देह की बाधा नहीं होती। उन्हें कर्माचरण भी कमी बाधक नहीं होता और जन्म-मरण की भी बाधा नहीं होती।
ऐसे ज्ञान के बारे में सुनकर यदि तुम उसे स्पष्ट करने को कहो तो उसे करने में वाचा समर्थ नहीं है। शब्दों के
साथ श्रुति भी पीछे हट जाती हैं। जहाँ विवेक सम्पन्न बुद्धि भी प्रवेश नहीं कर सकती, चंचल होने के कारण मन
भी जहाँ पहुँच नहीं पाता, वह परब्रह्म वाणी के अधीन कैसे रह सकता है? अर्थात्, कभी नहीं होगा। शास्त्रों की
व्युत्पत्ति समाप्त हो गयी, दर्शन अभी तक वाद-विवाद ही कर रहे हैं; श्रुति भी 'जहाँ नेति नेति' - न इति
कहकर थक गयी वहाँ वाणी क्या करेगी? वह भी ठहर गयी। जिज्ञासा की उत्कंठा से शब्द ज्ञान ने पहल की।
लेकिन परब्रह्म का एक भी नाम लेने के लिये ज्ञान कम पड़ा। इस प्रकार अच्छी तरह विचार करने पर परादि
वाणी भी उसका उच्चार नहीं कर सकी। इसीलिये यह ब्रह्म परात्पर और क्षर-अक्षर से परे है। वह सदा सभी
अवयवों से शून्य लेकिन अन्त में स्वयं भी शून्य है। शून्य का प्रकाशक चित्स्वरूप परब्रह्म भी एकत्व से परिपूर्ण
है। वहाँ प्रवेश करने के लिये अनेक प्रकार की युक्तियाँ चलायी लेकिन जिस प्रकार सूर्योदय होते ही जुगनूँ
अदृष्य हो जाते हैं उसी प्रकार वे चिदाकाश में लुप्त हो गयी। जुगनूँ यदि सूर्य से गले मिल सकता तो ब्रह्म भी
वाचा के हाथ लग जाता है। आत्मवस्तु के आगे शब्दों का सारा पांडित्य लुप्त हो जाता है। सूर्योदय हो जाने पर
जुगनू जिस प्रकार खोजने पर भी नहीं मिलता उसी तरह आत्मवस्तु जब हाथ में आ जाती है तब शब्दों का