श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 780, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंही उसकी साड़ी बन गया। जब दावाग्नि ने गोपालों को पीड़ा दी तो मैंने अपने मुँह से ही वे ज्वालायें निगल लीं।
उद्धव ! अपने भक्तों के प्रति मेरे मन में अत्यधिक करुणा रहती है। अश्वत्थामा के शस्त्र की पीड़ा से मैंने परीक्षित
की गर्भ में रक्षा की। इन्द्र ने गोकुल को त्रस्त किया तब मैंने गोवर्धन को हाथ पर उठा लिया। अर्जुन को बचाने
के लिये मैंने दिन में ही सूर्य को छिपा दिया। रणभूमि पर हार ले जाकर मैंने ही भीष्म को सत्यप्रतिज्ञ किया।
भक्तों का ऐसा सहायक सिर पर हो तो उन्हें विघ्न कौन करेगा ? मैं श्रीहरि उनका रक्षक हूँ। जो मेरी भक्ति का
अनुसरण करते हैं, उन भक्तों पर मैं कभी विघ्न नहीं आने देता। मैं अपना देह उन्हें अर्पण कर उन्हें निजस्वरूप
में परमानन्द में रखता हूँ। सद्भाव से मेरी भक्ति करने पर साधकों को आत्मसुख का लाभ होता है। तब वासना
के साथ ही काम और लोभ लोप हो जाता है और भक्तों को मेरा सुख प्राप्त होता है। तुम कहोगे, देह के अन्त में
भक्त को आत्मसुख की प्राप्ति होगी लेकिन मेरी चौथी भक्ति वैसी नहीं है। इसके योग से देह में रहते हुए ही
आत्मसुख की प्राप्ति होती है। देह रहे या जाये, उस सुख का कभी भी अभाव नहीं रहता। इस प्रकार मेरे भक्त
सुखपूर्वक आत्मसुख का भोग करते रहते हैं। भक्त देह में विचर रहे हैं ऐसा लगता है, लेकिन वे मुझमें ही
विचरते रहते हैं। मैं सदा सर्वदा उनके हृदय में ही वास करता हूँ। भक्त आत्मज्ञान से मुझमें और मैं निजांग से
उनके भीतर और बाहर रहता हूँ। इस प्रकार आत्मसुख के बीच वाले घर में हम दोनों परस्पर विचरण करते रहते
हैं। मैं देव और वह भक्त यह तो बाहर कहने की बात है। गूढ़ दृष्टि से विचार करें तो मैं और भक्त दोनों एक हैं।
घी पिघला हुआ हो या जमा हो। उसी प्रकार मैं और भक्त दोनों एक हैं। मुझमें और भक्त में कल्पांत में भी
भेदभाव नहीं है। तब मैं और वह एक हैं, यह कहनेवाला भी कोई नहीं रहता। इस प्रकार भक्त मत्स्वरूप से
मिलकर आत्मानंद प्राप्त करते हैं। ऐसा यह अट्ठाईसवाँ अध्याय ब्रह्मज्ञान का कलश है। श्रीकृष्ण कुशल कारीगर
है, उसने मन्दिर पर यह कलश चढ़ाया। अलंकारों में जिस प्रकार 'मुकुटमणि' रहता है, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान का
यह अट्ठाईसवाँ अध्याय है। श्रीकृष्ण भक्तों की माता होने के कारण उसने उद्धव का श्रृंगार किया। उत्तम से उत्तम
अलंकार पहना कर जिस प्रकार माँ अपने मुन्ने का शृंगार करती है, उसी प्रकार उत्तम से उत्तम ज्ञाननिर्णय से
उद्धव का शृंगार किया। माँ अपने बच्चे को अलंकार पहनाती है और बाद में उन्हें उतार लेती है किन्तु श्रीकृष्ण ने
एक बार उद्धव का श्रृंगार किया तो वह शृंगार-शरीर से निकल ही नहीं पाया। शरीर पर वह अमूल्य अलंकार
स्थायी हो गया, इसमें उद्धव अनमोल हो गया। सारा त्रैलोक्य उसके पैरों पर गिरने लगा और ब्रह्मदेव आदि
देवतागण भी उसकी पूजा करने लगे। श्रीकृष्ण ने स्वस्वरूपालंकार से उद्धव का श्रृंगार किया था इसलिये वह
ब्रह्मस्थिति तक पहुँच गया, इसीलिए वह त्रिभुवन में वन्दनीय हो गया और पुराण में भी महाकवि उसका वर्णन
करने लगे। माधुर्य में अमृत श्रेष्ठ है, उसे भी फीका बना कर श्रीकृष्ण ने उद्धव को परमामृत पिलाया। देव
अमृतपान करते हैं लेकिन वे भी मृत्युरूपी संसार में डूबते ही हैं। श्रीकृष्ण ने उद्धव को कथामृत से तृप्त कर
अक्षय बना दिया। वह सर्वांग से शान्त हुआ, परमानन्द से तृप्त हुआ; इस प्रकार मैं उद्धव हूँ इसका भान ही वह
भूल गया और स्वानंद से डोलने लगा। फिर परमानन्द के उन्माद में वह जहाँ भी 'दूजा' देखता उसे मार कर
गिरा देता। इस प्रकार संसार को लात से ठुकरा कर वह देवताओं के मस्तक पर चढ़ गया। देवताओं के माथे पर
चढ़कर उनका देवत्व भी भक्तों का भक्तपन भी उसने निगल लिया और फिर सच्चिदानन्द के स्वानंद से स्वयं ही
आत्मस्वरूप बन गया। वहाँ सत्, चित् और आनन्द का त्रिविध भेद भी नहीं रहा। सदैव परमानन्द और आनन्द
ही भर गया। नश्वर का त्याग करते समय अविनाश को 'सत्' कहते हैं, जड़ की निवृत्ति करते समय वस्तु को
'चित्' कहते हैं और जहाँ दुःख की बाधा नहीं है उसे 'आनन्द' कहते हैं। इस प्रकार 'सच्चिदानन्द' शब्द की