श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। अँधियारी रात में जो दीपक से काम चलाते हैं, वे सूर्योदय होने पर दीपक को
त्याग देते हैं। उसी प्रकार साधक शाब्दिक ज्ञानयुक्ति से, अनुतापयुक्त अंतःकरण से ब्रह्म का विचार करते हैं,
लेकिन जिन्हें ब्रह्मप्राप्ति हो चुकी है, वे शब्द की उपेक्षा करते हैं। जैसे-जैसे शब्दों का अभिमान बढ़ता है, वैसे-
वैसे ब्रह्मज्ञान दूर भागता जाता है। उद्धव, उसका भी लक्षण बताता हूँ, सुनो। जब वर को कन्या देनी होती है तो
माता, पिता, बन्धु, ज्योतिषी तथा इष्टमित्रों से मिलकर वह कन्या वर को अर्पण करते हैं। किन्तु पति के साथ
एकान्त के समय माता, पिता और रिश्तेदारों की उपस्थिति उसके लिए पति सुख में व्यवधान उपस्थित करती है।
उसी प्रकार योग्यता, चातुर्य, शब्द ज्ञान आदि होने पर ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। जिस प्रकार
आँख में एक कण भी सहन नहीं होता, उसी प्रकार ब्रह्म में भी कल्पना सहन नहीं होती। इसलिये निर्विकल्प
भाव से देखने पर ही शुद्ध ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जब सारे ज्ञान का अन्त और सारे भाषणों का जहाँ विराम
होता है, तभी परब्रह्म की प्राप्ति होती है, ऐसा श्रीकृष्ण ने बताया। जिसका बुद्धि से आकलन नहीं होता, वह मन
को कभी प्राप्त नहीं होता, जो शब्द का विषय ही नहीं है वहाँ प्रमाण के कदम नहीं बढ़ते। इस प्रकार आत्मवस्तु
किसी उपाय से नहीं प्राप्त होती इसलिये वह वस्तु ही नहीं है, ऐसा यदि तुम मन में विचार कर रहे हो, तो उसके
बारे में सुनो। मूल श्लोक का पद—'येनेषिता वागसवश्वशति', अर्थात् देह, इन्द्रिय और प्राण ये जड़मूढ़ और
अचेतन हैं; उन्हें चिद्रूप आत्मा ही चैतन्य प्रदान करतां है। उसका भी लक्षण सुनो। आत्मा के प्रकाश से ही दृष्टि
प्रकाशित होती है लेकिन आत्मा दृष्टि को स्पर्श भी नहीं करता, दृष्टि में भीतर और बाहर आत्मा ही रहता है,
लेकिन वह अदृश्य होने के कारण दिखायी नहीं देता। आत्मा की सत्ता से ही कान श्रवण करते हैं, लेकिन उस
कान को आत्मा स्पर्श नहीं करता। कान के भीतर और बाहर व्याप्त होने पर भी आत्मा श्रवण का विषय नहीं
बनता। आत्मसत्ता से ही वाणी प्रकट होती है लेकिन वाणी के शब्दों को आत्मा स्पर्श नहीं करता। शब्द के आगे-
पीछे आत्मा भरा रहता है लेकिन उस शब्द को आत्मा का अनुभव नहीं होता। आत्मसत्ता से ही मन चपल है;
मन के भीतर और बाहर आत्मा है लेकिन वह मन को बिलकुल स्पर्श नहीं करता। आत्मा को मन नहीं जान
पाता। चैतन्य ही चित्त को जागृत करता है, चित्सत्ता से ही चित्त में चिन्तन उत्पन्न होता है; चित्त के भीतर-बाहर
परिपूर्ण चैतन्य ही रहता है; फिर भी उस चित्त को चैतन्य मालूम नहीं होता। आत्मा के संयोग से 'अहं' उल्हसित
होता है लेकिन उस अहंता को आत्मा कभी स्पर्श नहीं करता। अहंता के अंतर्बाह्य आत्मा रहता है लेकिन वह
अहंकार को दिखायी नहीं देता। आत्मप्रभा के प्रकाश से ही विवेकबुद्धि प्रकाशित होती है; बुद्धि के भीतर और
बाहर आत्मा रहता है लेकिन बुद्धि आत्मा को नहीं पहचानती। आत्मा की प्रभा से ही प्राण चालित होता है, फिर
भी प्राण को आत्मा स्पर्श नहीं करता। प्राण के भीतर-बाहर आत्मा रहता है लेकिन प्राण परमात्मा को नहीं
पहचानता। उद्धव तुम इस प्रकार देखने का प्रयत्न करो। जिसके योग से जड़ व्यवहार कर रहा है, वह आत्मा
स्वतः सिद्ध ही होता है। वह नहीं है, ऐसा कल्पांत में भी नहीं हो सकता। इस प्रकार आत्मा स्वतःसिद्ध है। भेद
में रमण कर अभेद ही रहता है, द्वंद्व प्रकाशित करके भी निर्द्वंद्व रहता है। इस आत्मज्ञान को दृढ़ करना चाहिये।
सारांश आत्मा निर्द्वंद्व और अद्वैत है, वह है या नहीं यह कहने के लिये भी कोई नहीं बचता क्योंकि आत्मा
आत्मस्वरूप से परिपूर्ण है। आत्मा सदा आत्मस्वरूप में ही रहता है, व्यर्थ ही उस पर सांसारिक होने का आरोप
लगा है। इस विषय में श्रीकृष्ण अगले श्लोक में बता रहे हैं।
एतावानात्मसम्मोहो यद् विकल्पस्तु केवले।
आत्मन्नृते स्वमात्मानमवलम्बो न यस्य हि॥ ३६ ॥