श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 777, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंअट्ठाईसवाँ अध्याय ७६१
में व्याधि का प्रवेश होने पर दिव्यौषधि उसका संहार करती है; उसी प्रकार मन की व्याधि दूर करने के लिये
निश्चयपूर्वक योग की साधना करें। योगसिद्धि साध्य होने से आधिव्याधि समूल नष्ट हो जाती है। उसी प्रकार
उद्धव! वह योगसिद्धि अन्य भी कई विघ्नों का नाश करती है। ये भिन्न-भिन्न उपाय कितने बतायें ? भक्तिभाव से
मेरा ध्यान करने पर सारे विघ्नों का नाश होता है। उसी का निरूपण श्रीकृष्ण करते हैं।
कांश्चिन्ममानुध्यायेन नाम संकीर्तनादिभिः ।
योगेश्वरानुवृत्त्या वा हन्यादशुभदाञ्छनैः ॥ ४० ॥
उद्धव! मेरा क्षण भर ध्यान करने से ही आधि-व्याधि सहित सारे विघ्न, विकल्प, विकर्म, देहाभिमान तथा
ज्ञानाभिमान आदि सारे भस्म हो जाते हैं। मेरा ध्यान करने की आदत डालने से सभी उपसर्ग धीरे-धीरे भाग जाते
हैं, खोजने से भी विघ्न नहीं दिखायी देता। साधकों के लिये सारी सृष्टि निर्द्वंद्व हो जाती है। सारे विघ्नों का
अभाव होकर विकल्प अपने आप ही नष्ट हो जाते हैं। अब तुम पूछोगे कि आसन लगाकर कब बैठा जाय ? मन
को कब एकाग्र किया जाय ? इतना करके भी जब तुम्हारा ध्यान मन में बसेगा तभी तो विघ्नों की बाधा होगी ?
तो सुनो! मेरा ध्यान भी मन में न बसता हो तो दूसरा आसान उपाय है। वह यही है कि मेरा नामकीर्तन करो।
हरिनाम से भी विघ्नों का नाश होता है। जहाँ नाम की घड़घड़ाहट होती है वहाँ विघ्नों को रास्ता ही नहीं मिल
पाता। मेरे नाम की कीर्ति जिसके मुख में अखण्ड बस्ती करती है, उसे देखकर सारे विघ्न भाग जाते हैं। समस्त
उपसर्गों का नाश हो जाता है। मेरे नाम का गजर महापातकों का संभार भगा देता है। विघ्नों के लिये स्थान ही
नहीं छोड़ता। हरि के नाम में इतना सामर्थ्य है। भूल कर भी मेरा नाम ले लेने से वह समस्त पातकों को भस्म
कर देता है। फिर जहाँ मेरे गुण नाम-कर्म का अखण्ड गायन चल रहा हो वहाँ विघ्नों का स्पर्श भी नहीं होगा।
जिसकी वाणी मेरे नाम की विरुदावली गाती हो, उसके सामने विघ्न उसी प्रकार नहीं आते, जिस प्रकार सूर्य के
सामने अन्धकार नहीं आ पाता। इस लोक में मेरी नामकीर्ति के अलावा जिसका मुँह खाली नहीं रहता, वह जिस
प्रकार पतंगे को अग्नि जलाता है, उसी प्रकार महाविघ्नों को भस्म कर देता है। 'नामकीर्ति' श्रेष्ठ है यह तो
विश्वासपूर्वक स्वीकार है, किन्तु वह नाम मुख में रहे तो कैसे ? उसके लिये क्या करना चाहिये ? यह कहोगे तो
इसके लिये साधु की सेवा करे, संतों की सेवा पर जीव-भाव से भक्ति करें। इससे, वहाँ विघ्नों का प्रवेश नहीं
होता। सद्भावना से सत्संगति करने से उससे मुख में नामकीर्ति बस जाती है और चित्त में विकल्प उत्पन्न नहीं
होता। मुख को हरिनाम की मधुरता तथा मन को संतसेवा की चाह हो तो उसके प्रभाव से कोटि-कोटि विघ्नों का
नाश होता है। साधकों का रक्षक संतसंग यदि निजसखा हो जाय तो वह एक ही क्षण में महाविघ्नों के मुँह तोड़
देता है। साधु का चरणोदक सेवन करने से साधक अत्यन्त शुद्ध हो जाते हैं और उस शुद्धत्व से महादोष निर्मूल
हो जाते हैं। साधु के चरणतीर्थ के पास सारे तीर्थ शुद्धि के लिये आते हैं, इसलिये वह तीर्थ भक्तिभाव से सेवन
करने से सारे विघ्न नष्ट हो जाते हैं। साधुओं की चरणधूलि का वन्दन करने से साधकों का कार्य सिद्ध होता है।
विघ्नों का बीज ही नष्ट होकर उन्हें स्वानंद का अनुभव होता है। भाग्य से यदि संतों की चरणरज मस्तक पर पड़
जाय तो वह कलिकाल को भी लात मारता है फिर विघ्नों की क्या बिसात है ? निर्भय वीर वैसे ही बलशाली
होता है, फिर उसके हाथ में अच्छा सा शस्त्र देकर युद्ध में भेजें और उसकी पीठ थपथपायें तो उस उल्हास से
वह शत्रुओं का भीषण संहार करने लगता है। उसी प्रकार भक्तिभाव से सत्संगति धारण कर मुख में अखण्ड
नामकीर्ति रखें और भावपूर्वक संतों की भक्ति करें तो साधक सहज ही महाविघ्नों का विनाश कर सकते हैं।