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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 789, कुल 869 में से

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पृष्ठ 789

उनतीसवाँ अध्याय ७७३.
तुम्हारे भजनसुख के कारण विषयों के प्रति विरक्त होकर समुद्रवलयांकित पृथ्वी का राज्य भी तुच्छ मानकर त्याग
देते हैं। सारे ऐश्वर्य के साथ यदि स्वर्ग भी भक्तों के पास आ जाय, तो जिस प्रकार राजहंस कीचड़ का कुण्ड
छोड़ देते हैं, उसी प्रकार वे भी स्वर्ग की उपेक्षा करते हैं। जो भजन में तल्लीन हो जाते हैं उन्हें तुम सुख स्वरूप
बना देते हो और देह में होते हुए भी विदेही बना देते हो। ऐसे भक्त सर्वत्र समभाव रखते हैं। हे श्रीकृष्ण! तुम
सर्वश्रेष्ठ स्वामी इस प्रकार भक्तों पर सदा सन्तुष्ट रहते हो। तुम्हारी सेवा करना भी कठिन नहीं है। सेवा करने के
लिये परदेश जाने की आवश्यकता नहीं होती। उसी प्रकार सेवा के लिये किसी विशेष समय की आवश्यकता
नहीं होती। सबके हृदय में रहने वाले तुम रात-दिन भक्तों के पास ही रहते हो। तुम्हारी सेवा के लिये धन की
आवश्यकता नहीं होती, अथवा शारीरिक कष्ट की भी जरूरत नहीं होती। तुम्हारे चरणों में मन रखना ही पर्याप्त
है। इतने से ही तुम स्वानंदधन सन्तुष्ट होते हो। सन्तुष्ट होकर तुम प्रपंच का भ्रम दूर करते हो। त्रिगुणों के साथ
सारा त्रिकूट मिथ्या होकर नष्ट हो जाता है। तुम ऐसे सेवनीय तथा कृपालु और दीनदयालु स्वामी हो। जो तुम्हारी
सेवा का त्याग करता है वह संभ्रमित, मूर्ख और मन्दबुद्धि है। पलकों का झपकना भी तुम्हारी ही इच्छा से होता
रहता है। तुम्हारी सेवा से जो पुरुष विन्मुख रहते हैं, वे भाग्यहीन और अत्यन्त पामर हैं। तुम्हारी सेवा सुख
स्वरूप ही है। उसकी उपेक्षा कर जो सर्वदा विषयों की विषैली लहरों की इच्छा करता है वह मूर्ख है जिन
विषयों का विशय लेश पास के आत्मसुख का विनाश करता है और जन्म-मरण के फन्दे में फँसा कर दुःसह
दुःख भोगने को विवश करता है, उन विषयों के विषदाता इन्द्र-महेन्द्र आदि अत्यन्त कंजूस रहते हैं। जो विषय
स्वार्थ के लिये उन्हें भजते हैं वे भी सचमुच भाग्यहीन ही हैं। भगवन्! तुम्हारी कृपा से तुम्हारे भक्त अत्यन्त
सुखसम्पन्न, अत्यन्त समर्थ एवं संसार में रहकर भी विरक्त हो जाते हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। तुम्हारे
चरणरज की सेवा करने वाले जो पृथुजनकादि राजा हैं, उन्हें इन्द्रादिक देवता भी वन्दन करते हैं और ऋद्धि-
सिद्धि भी उनके चरण छूती हैं। आकल्प तपश्चर्या कर जिन सिद्धियों की प्राप्ति नहीं होती, वे भक्तों की शरण में
आती है, इतनी तुम्हारी भक्ति श्रेष्ठ है। अन्य साधनों की अपेक्षा तुम्हारे भजन में मन रखने से सारी सिद्धियाँ
स्वाभाविक रूप से भक्तों की शरण में आती हैं। इस प्रकार भक्तों पर तुम्हारे अपार उपकार होते रहते हैं। उस
श्रीहरि के चरणों में लीन होने पर ही उस उपकार से उऋण हुआ जा सकता है। विलीन होना उसी प्रकार जैसे
प्रतिबिम्ब बिम्ब से मिल जाय, अथवा घट का आकाश महादाकाश में प्रवेश करे। इस प्रकार यदि तुझमें विलीन
न हों तो तुम्हारे उपकार की परिपूर्ति नहीं होती क्योंकि जो हमारे सारे मनोरथ पूर्ण करता है, उसे भूलना
अधःपतन है।
नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश ब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुदः स्मरन्तः।
योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्वन्नाचार्यचैत्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति ॥ ६॥
सचमुच, तुझमें विलीन न होकर जो पुरुष ब्रह्मायु होकर, योगयाग करके थक गये, फिर भी उससे तुम्हारे
उपकारों की पूर्ति नहीं हुई। अस्तु! ज्ञानसम्पन्न लोग नाना प्रकार के साधन करते हैं, फिर भी उससे तुम्हारे
उपकारों की पूर्ति रत्तीभर भी नहीं होती। वह उपकार कौन सा है? तो हे दयासागर! तुम अपने भक्तों के अन्तर
के और बाहर के पातक नष्ट कर देते हो। अंतःकरण के पातक अंतर्यामी के रूप में तथा बाहर के पातक सद्गुरु
के रूप से तुम संकल्प के साथ विलीन कर देते हो। अंतर्यामी और सद्गुरु इन दोनों रूपों से तुम्हीं करुणा कर
भक्तों का संसारभार दूर कर आत्मनिश्चय धारण कराते हो। आत्मनिश्चय होने का लक्षण यही है कि 'मैं' तू बन
सहज ही विलीन हो जाता है; देहाभिमान अपने आप दूर हो जाता है; और जन्म, जरा, मरण का ही विलय हो