श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 791, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनतीसवाँ अध्याय ७७५
आशाधारी हैं। श्रीकृष्ण से अनेक लोगों ने प्रार्थना की थी, लेकिन वह सब उनके अपने कार्य तक सीमित थी
किन्तु उद्धव ने नम्रतापूर्वक जो प्रश्न पूछा वह संसार के उद्धार के लिये उपकारी था। उस प्रश्न से श्रीकृष्ण को
अत्यन्त संतोष हुआ वे अब सुगम उपाय से ब्रह्मप्राप्ति का साधन बतायेंगे। इसलिये, जिससे भोले-भाले
श्रद्धालुजन तत्काल समाधान प्राप्त कर सकें ऐसा सरल ब्रह्मज्ञान श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं। ज्ञानमार्ग के राही
यदि जीवभाव से छलांग लगायेंगे तो उद्धव के प्रश्न की चाह से उन्हें भी सुलभ रीति से ब्रह्मज्ञान प्राप्त होगा।
मोहमाया की जंजीर पहनकर जो अहंकार के कारागार में पड़े हुए हैं, उन्हें भी तत्काल छुटकारा प्राप्त हो, इसकी
उद्धव के मन में चिन्ता थी। उद्धव भाग्यवान था, उसने संसार का उपकार करने के लिये प्रश्न किया; इसलिये
श्रीकृष्ण सन्तुष्ट होकर, अत्यन्त आदर के साथ बोलने लगे। श्रीकृष्ण का मुख वैसे भी सुन्दर था, तिस पर मनोहर
हास्ययुक्त हो जाने के कारण वह और भी अधिक रमणीय दिखायी देने लगा। श्रीकृष्ण उल्हास से, गम्भीर वाणी
में बोलने लगे।
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि मम धर्मान् सुमङ्गलान्।
याञ्छ्रद्धयाऽऽचरन् मर्त्यो मृत्युं जयति दुर्जयम्॥८॥
जो प्रणव का शुद्ध सार है, जो ज्ञान की सच्ची लगन है, जो चैतन्य का मानों चमत्कार हैं और जो परावाणी
से भी परे है, वे श्रीकृष्ण मेघसमान गम्भीर वाणी से गर्जना करते हुए स्वानंद से बोले, उद्धव! तुम्हारी वाणी धन्य
है। तुम्हारे प्रश्न से मुझे समाधान हुआ। यदि भोले-भाले लोगों को सुगमरीति से ब्रह्मप्राप्ति होनी है तो उसके
लिये मेरी भक्ति समर्थ है। मैं श्रीकृष्ण सदा उसके ही वश में रहता हूँ। मेरा अनन्य भाव से भजन करने से मैं
सदा भक्त के अधीन रहता हूँ। उसमें जाति, गोत्र, ज्ञातापन, ऊँच-नीच, वर्ण आदि मैं कुछ भी नहीं देखता। अब
जिससे उत्तम भजन हो सके, वह भागवत धर्म तुम्हें बताता हूँ। इससे कर्माकर्म आदि सब नष्ट होकर जन्म-मरण
का भी नाश होता है। उस धर्म का स्वयं आचरण करने से भवव्यथा समूल खन कर बाहर निकल आती है। उस
धर्म के योग से साधकों को स्वभावतः सुख सम्पत्ति प्राप्त होती है। जिस धर्म का स्तवन करने से असत्यादि दोषों
का निर्मूलन होता है, जिस धर्म का निष्ठापूर्वक श्रवण करने से विषयवासना का नाश होता है, वे मेरे धर्म अत्यन्त
पवित्र हैं तथा कलियुग के पातकों और दोषों को नष्ट करने वाले हैं; उनके भजन से मंगल का भी मंगल होता
है। मेरे धर्म का श्रद्धापूर्वक आचरण करने से मेरे स्वरूप के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है और उससे भवभ्रम नष्ट
होकर जन्म-मरण चूक जाता है। जो मृत्यु ब्रह्मदेव को भी निगल लेता है; हरिहर का भी संहार करता है, वह
मृत्यु संसार में अत्यन्त असाध्य है। देवदानव भी उससे थर-थर काँपते हैं। उस मृत्यु का भय खनकर बाहर
निकालकर, कलिकाल के दाँत तोड़कर; मेरे भक्त अद्वय भजन से संसार में सुखपूर्वक रहते हैं। उद्धव! तुम मेरे
निजसखा हो, इसलिये मेरे भजन का सामर्थ्य उसकी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर संक्षेप में बताता हूँ, सुनो।
कोटि-कोटि शस्त्रों का घाव शरीर पर लगने पर भी वीर योद्धा उसमें से बच जाता है लेकिन वही मर्म पर एक
ही प्रहार होने पर तत्काल मर जाता है। उसी प्रकार नानाप्रकार के साधन करने से भी जन्म-मरण नहीं टलता
लेकिन मेरा थोड़ा-सा भी भजन करने से उनका समूल विनाश हो जाता है। शुक्राचार्य एकनाथ के मुख से बोलते
हैं। घनश्याम मेघ यही एक बड़ा मेघ है; उसने उद्धवरूपी चातक के लिये स्वानंदरूपी जीवन की वृष्टि की
जिससे त्रिभुवन सुखी हुआ। वर्षाकाल समाप्त होने पर शरदऋतु का जल अत्यन्त मनोरम दिखायी देता है, उसी