श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 779, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंअट्टाईसवाँ अध्याय ७६३
होने की ओर ध्यान नहीं देते क्योंकि देह को प्राप्त होने वाली सिद्धि सचमुच बाधक ही है। ज्वर से शरीर तप्त
होने पर, वह मृत्यु के भय से काँपने लगता है; लेकिन शीतोपचार करने पर भी उसे मृत्यु आती है। मिथ्या देह
का अभिमान ही हमेशा जन्म-मरण का भोग कराता है; ऐसे देह को अजर-अमर करने से देह बंधन और भी
कस जाता है। योगसाधन से देहबन्धन दृढ़ करने पर तथा देह की सिद्धि भोगने पर भी अधःपतन नहीं टलता।
ज्ञान के ही लिये क्यों न हो, लेकिन योग साधन करते हुए यदि सिद्धि समय पर आ जाय तो अपने कल्याण के
लिये उसका भी त्याग करना चाहिये जिसका राजा के पास आना-जाना रहता है उसी को रिश्वत मिलती है
लेकिन उसके कारण ही उसका अपमान होता है। उसी प्रकार साधक की सिद्धियाँ उसके लिये घातक होती हैं।
वृक्ष पर फल आते हैं लेकिन वृक्ष उन्हें नहीं छूता। उसी प्रकार सिद्धि प्राप्त होने पर भी उन्हें वैराग्य बल से छोड़
देना चाहिये। सूखे वैराग्यबल से त्याग करने पर वह स्थायी नहीं होता। विवेकयुक्त वैराग्य से त्याग करने पर
सिद्धियाँ तृणवत हो जाती हैं। अन्धा हाथी जब मदमस्त हो जाता है तो उसे अपना पतन नहीं दिखायी देता। उसी
प्रकार जो अविवेक से त्याग करते हैं, उनका अधःपतन होता है। जब देह ही नश्वर है तो उससे प्राप्त सिद्धि
कितनी शाश्वत होंगी ? ऐसे विवेक से जो वैराग्य सम्पन्न रहते हैं, वही देह के भोग से अलिप्त रहते हैं। यहाँ देह
जितना अनित्य है वहीं आत्मा सत्य और नित्य है। यह जानकर ही विवेकी लोग आत्माभ्यास के लिये तैयार हो
जाते हैं।
योगं निषेवतो नित्यंकायश्चेत् कल्पतामियात् ।
तच्छ्रद्दध्यान्न मतिमान् योगमुत्सृज्य मत्परः ॥ ४३ ॥
परमार्थ के लिये योगसाधन करते समय यदि सिद्धि प्राप्त हो जाए तो अपने हित के लिये उन्हें छोड़ देना
चाहिये। लेकिन सिद्धि छोड़ने पर भी नहीं छूटती प्रारब्ध के बल से गले पड़ जाती हैं। यदि ऐसा हो जाय तो
योगाभ्यास छोड़कर मेरे भजनमार्ग पर लग जाएँ। मेरे भक्ति मार्ग में विघ्नों का प्रवेश नहीं होता क्योंकि मैं श्रीरंग
भक्त के प्रेमरंग में रंग जाता हूँ। सद्भाव से मेरी भक्ति करने से विघ्न कभी नहीं आते क्योंकि मैं श्रीकृष्ण रात-
दिन भक्तों के साथ रह कर उनका संरक्षण करता हूँ। ऐसी भक्ति की महिमा का वर्णन श्रीकृष्ण करते हैं।
योगचर्यामिमां योगी विचरन् मदपाश्रयः ।
नान्तरायैर्विहन्येत निःस्पृहं स्वसुखानुभूः ॥ ४४ ॥
जो अनन्यप्रीति से मेरी शरण में आते हैं, समस्त प्राणिमात्र में मेरी ही भावना रखते हैं और अभेद बुद्धि से
मेरा भजन करते हैं उन्हें विघ्नों की बाधा बिलकुल नहीं होती। मेरे भक्तों के सारे उपसर्ग मैं श्रीकृष्ण निवारण
करता हूँ। जिसे अनन्य भजनयोग है ऐसे भक्त को मैं अपना अंग ही बस्ती के लिये देता हूँ। मेरे भक्तों की ओर
विघ्न आने लगते हैं तो मैं वहाँ कूद पड़ता हूँ। मेरे भक्तों का संकट मैं निवारण करता हूँ क्योंकि वे मेरे लाडले हैं।
वे कितने लाडले हैं, उसके बारे में सुनो। उनके संकट मैं निरन्तर सहन करता हूँ। राजा हिरण्यकश्यपु प्रह्लाद को
यातना दे रहा था उस समय मैंने उसकी पूरी तरह सुरक्षा की। अम्बरीष पर संकट आया तो मैंने दुर्वासा का
अपमान किया। उसके दसों गर्भवास मैंने झेले लेकिन भक्तों को कमी नहीं होने दी। गजेन्द्र को पीड़ा हुई तो मैं
हाथ में सुदर्शन लेकर, कूद कर उसके पास पहुँचा और क्षण भर में उसे छुड़ाया। कौरव सभा में द्रौपदी के
असाध्य संकट में, दुष्ट लोग उसे नग्न करने लगे, उस समय मैंने उसे वस्त्रों का ढेर उपलब्ध कराकर उसे उस
संकट से बचाया। यदि द्रौपदी के हाथ में साड़ी देता तो उसे पहनते समय वह नग्न दिखाई देती इसलिये मैं स्वयं