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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 787, कुल 869 में से

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पृष्ठ 787

उनतीसवाँ अध्याय ७७१
प्रेम में भूलकर सदासर्वदा भक्तों के अधीन होकर रहते हो। तुमने अपने दासों के अधीन रह कर (द्रौपदी के लिये
दुर्वासा को) आधीरात को भी अन्न की आपूर्ति की। अन्त में तुम तो भूखे ही रह गये। तुम्हारे हिस्से में सब्जी का
पत्ता ही आया। दोनों सेनाओं के बीच शस्त्रों की झंकार में अर्जुन के रथ का सारथी बनकर तुमने कष्ट सहे। अन्त
में उनके घोड़ों की भी धुलाई की। तुम्हारे मुकुट का आकलन वेदों को भी नहीं होता। घोड़ों की लगाम खींच
कर तुम वहीं घोड़ों को धोने लगे। तुम्हें इसमें लाज भी नहीं आयी। तुम भक्तों के इतने अधीन हो जाते हो यह
निश्चित है। जिसे कारागार से छुड़ाया, उस उग्रसेन को तुमने राजा बनाया; धर्मराज के घर की तो तुमने जूठन
उठायी; और नन्द के गौओं की रक्षा की। अस्तु ! तुम बालगोपालों के साथ मिलकर उनके साथ खड़े-खड़े भात
खाते थे और उनकी ही ताल पर नाचते थे। छुआछूत की बात नहीं की; वे केवल चरवाहा थे लेकिन उनका
उच्छिष्ट खाकर तुम स्वानंद में झूमते रहे। द्रौपदी पर आये भीषण संकट के समय उसकी पहनने वाली साड़ी तुम
स्वयं ही बन गये। गोपियों के प्रति प्रेम के कारण तुम उनके साथ नानाप्रकार से नाचे। एक गोपी पानी से भरी
गगरी लेकर जा रही थी, उसके पैर में काँटा गड़ा तो तुमने दोनों हाथों से उसका पैर पकड़कर काँटा निकाल
दिया। दुर्वासा को तुमने कन्धे पर वहन किया; बली के तो तुम द्वारपाल बन गये। इस प्रकार तुम भक्तों के अधीन
रहकर उनकी बात मानते हो। भगवान आप कहेंगे कि केवल मैं ही तुम्हारे गोपालत्व को सत्य मानता हूँ लेकिन
ऐसी बात नहीं है क्योंकि देवताओं को भी तुम पूज्य हो। हे श्रीकृष्ण! इन्द्र, चन्द्र, महेन्द्र, ब्रह्मवेद, बृहस्पति और
शंकर ये जो पूज्य देवता हैं, वे भी तुम्हारे दास हैं। तुम्हें नमस्कार करने के लिये देवताओं की भीड़ एकत्र होती है
जिससे तुम्हारी आसनी पर उनके कोटि-कोटि मुकुटों का घर्षण होता है जिसकी तीव्र झंकार उठती है। तुम्हारी
आज्ञा का पालन न करने पर ब्रह्मदेव जैसे देवता के मस्तक पर भी प्रहार होता है। तुम्हारी आज्ञा के भय से वायु
भी नियम से प्राण का संचालन करता है। उसी प्रकार हे गोविन्द ! तुम्हारी आज्ञा के भय से ही सूर्य दिनमान
चलाता है। तुम्हारी ही आज्ञा के भय से समुद्र सीमा का उल्लंघन नहीं करता और तुम्हारी ही आज्ञा से मेघ
यथासमय जल की वृष्टि करता है। तुम्हारी आज्ञा की महानता अगाध है। उसे साक्षात मृत्यु भी शिरसा वन्दन
करता है। योग्य समय पर ही वह प्रलय लाता है। आज्ञा के विपरीत काम नहीं करता। (आशंका) हे मुरारी !
शायद तुम कहोगे-कि मैं तो नंद का चरवाहा हूँ, उग्रसेन की सेवा करता हूँ इसलिये मेरा यह बखान व्यर्थ है।
लेकिन ऐसी बात नहीं है। तुमने काल के भी दाँत तोड़ कर गुरु के पुत्र को जीवित किया; इन्द्र ने गोकुल पर
अतिवृष्टि की उस समय तुमने उसे अच्छा सबक सिखाया। औरों की क्या बात करें ? गोपालों के साथ वत्स
बनकर तुमने ब्रह्मदेव को भी पागल बना दिया, अन्त में नंद के चरवाहा ही बन कर रहे। बाणासुर की पैरवी
करने के लिये शंकर लाल-लाल आँखें दिखाते हुए आये थे, किन्तु हे शारंगपाणी! हे ईश्वरेश्वर! तुमने आधे ही
क्षण में उन्हें पराजित किया। तुमसे भेंट करने की उत्कंठा क्षीरसागर वाले नारायण को लगी हुई थी। वह ब्राह्मण
लड़के के बहाने तुमसे भेंट करने की इच्छा कर रहा था। तुम भक्तों का कार्य सिद्ध करने वाले सिंह हो। अर्जुन
की प्रतिज्ञा सत्य करने के लिये कृष्ण-नारायण ने क्षीरसागर से भेंट की। उन दोनों के मिलन का आनन्द या रहस्य
संत ही जानें। उन दोनों ने एक-दूसरे को प्रगाढ़ आलिंगन में बाँध लिया। उस समय निजात्मसुख की माधुरी
अभिन्न थी। कृष्ण में नारायण मिले या नारायण में कृष्ण लीन हुए, यह समझ में ही नहीं आया। दोनों का द्वैतभाव
जाकर परिपूर्ण एक ही स्वरूप रह गया। तब अर्जुन को व्यथा हुई। उसे लगा मैं व्यर्थ ही कृष्ण से दूर चला गया।
इतने में उसे शेषशय्या पर श्रीकृष्ण ही नारायण स्वरूप में दिखाई दिये। तो तुम इस प्रकार भक्तों की सहायता
करने वाले तथा लीला भय से शरीर अवतार लेने वाले पुरुष हो। हे दीनोद्धारक श्रीकृष्ण! तुम नाना प्रकार के