श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 788, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंअवतार धारण करते हो। इस प्रकार हे ऋषीकेशी ! तुम्हारी महिमा अगाध है। यह बात तुम्हारे इसी अवतार में
समझ में आयी। अखण्ड ऐश्वर्य की स्थिति, माया के आवरण के बिना होने वाली ज्ञानस्फूर्ति, अद्वयानंद कभी
च्युत नहीं होता इसलिये तुम्हें 'अच्युत' कहते हैं। इस प्रकार तुम अनंत और अपार हो। नियंता ईश्वर के भी
ईश्वर हो; भक्तों पर करुणा करने वाले हो। उसके बारे में भी सुनो। देवताओं के नमस्कार के लिये भी दुर्लभ तुम
रामचन्द्र लीलावतार चरित्र में रीछ और वानर को आलिंगन दे रहे थे। तुमसे बात करने के लिये वेद भी प्रतीक्षा
करते रहते हैं और तुम वानरों के कान में कहानियाँ सुना रहे थे। तुम्हारा ज्ञान वेदशास्त्रों की भी समझ में नहीं
आता। तुम वानरों से सलाह ले रहे थे और उनकी सलाह पर चल रहे थे। यज्ञों की आहुति भी तुम सरलता से
नहीं लेते लेकिन तुम बड़े प्रेम से वानरों के दिये फल उन पर कृपा करने के लिये खा रहे थे। इस प्रकार तुम
भक्तों के प्रेम का ख्याल करते हो। तुझमें विषमभाव नहीं है। तुम सारे संसार के आत्माराम हो। तुम अंतर्यामी के
निजसखा हो। तुम हृदयस्थ परमात्मा हो। तुझ में भूतों और भौतिकों के प्रति भिन्न भाव नहीं है। तुम जड़ को
चेतनता प्रदान करते हो, मूढ़ को ज्ञान देते हो और समस्त प्राणिमात्र को आनन्द प्रदान करते हो; तुम्हारी चित्सत्ता
पर ही सारा संसार चल रहा है। माता-पिता के प्रेम में सांसारिक भावना रहती है। तुम हृदयस्थ निजसखा हो तथा
सभी को सुख प्रदान करने वाले हो। इस प्रकार तुम सबके हृदय में वास करते हो तथा समर्थ होने के कारण
सबको वंद्य हो। तुम दीनों के कृपालु स्वामी हो तथा उनका हृद्गत जानने वाले हो। इस प्रकार, हे श्रीकृष्ण ! तुम
भक्तों के दीनदयाल हो। ऐसे प्रभु को छोड़कर सम्पत्ति से उन्मत्त हुए लोगों का भजन कौन करेगा?
तं त्वाखिलात्मदयितेश्वरमाश्रितानां सर्वार्थदंस्वकृतविद् विसृजेत को नु।
को वा भजेत् किमपि विस्मृतयेऽनु भूत्यै किं वा भवेन्न तव पादरजोजुषां न ॥ ५ ॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ये मायागुणों के अवतार हैं और तुम माया का नियंता ईश्वर होकर भक्तों पर
करुणा करने वाले एवं सुखदाता हो। तुम्हारी भक्ति करने से चारों पुरुषार्थ और चारों मुक्ति भक्तों को दण्डवत
करती आती हैं। तुम भगवान सर्वज्ञ होने के कारण भक्तों का मनोगत जानते हो। इतना ही नहीं बल्कि उन्हें जो
चाहिये वह सब तुम उन्हें देते हो। भावार्थ का भोक्ता एक तुम श्रीकृष्ण ही हो। वह लक्षण तुम्हारे सिवा किसी
और पर लागू नहीं होता। तुम उत्तमोत्तम स्वामी हो, तुम्हारे कारण साधकों को अत्यन्त सुख प्राप्त होता है। तुम्हारे
जैसा कोई अन्य है ही नहीं। तुम पुरुषोत्तम सबके स्वामी हो। तुम सभी के स्वामी हो; किन्तु अपने भक्तों पर
कृपालु हो। अग्नि, विष आदि संकटों से तुमने ही प्रह्लाद को बचाया। तुम्हें भक्तों पर करुणा आती है; उत्तानपाद
राजा के नन्हे बालक को वैराग्य सम्पन्न कर, उस ध्रुव को तुमने अटल बना दिया। विभीषण शत्रु का भाई था
लेकिन अनन्य भाव से तुम्हारी शरण में आया, उस पर कृपा करने के लिये तुमने रावण का उसके कुल के साथ
उद्धार किया। तुमने बली को धोखा देकर बाँधा लेकिन अन्त में तुझमें इतनी अधिक करुणा उपजी कि तुम लाज
छोड़कर उसके घर के द्वारपाल बन गये। इस प्रकार तुम्हें भक्त पर करुणा हो आती है; तुम भक्त के हृदय की बात
जानते हो। ऐसे स्वामी को छोड़ धनांध लोगों की कौन सेवा करेगा ? देहेन्द्रियों को सुख का जो आभास होता है
वह तुम्हारे ही सुख का अंश होता है। इस प्रकार तुम अपने सारे सुखों की निधि के साथ अनायास ही अपने
भक्तों पर प्रसन्न होते हो। केवल साधु ही तुम्हारी महिमा जानते हैं, तुम ज्ञानी पुरुषों का अभेद आत्मा हो। हे
पुरुषोत्तम ! तुम भक्तप्रिय हो। तुम्हारे सुख का कोई अन्त नहीं है। तुम्हारी सेवा के प्रेम के कारण भक्त आत्मसुख
से सुखी होते हैं। दैहिक द्वंद्वों के अथवा जन्म-मरण के दुःख स्वप्न में भी उनके निकट नहीं आयेंगे। तुम्हारे भक्त