श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 785, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनतीसवाँ अध्याय ७६९
हैं, यह कह कर गिरिकंदराओं में चले जाते हैं किन्तु मन उन्हें भी ठग कर सबके सामने चपलता से निकल जाता
है। कोई मन का निग्रह करने के लिये अन्न का त्याग करते हैं लेकिन उसका परिणाम विचित्र होता है। उनका
मन जागृति में और स्वप्न में अन्नमय ही हो जाता है। इस प्रकार मनोनिग्रह करते समय मन और भी अधिक क्षुब्ध
हो उठता है। इस प्रकार मन का नियमन करने वाले बड़े-बड़े ज्ञाता साधन करके थक जाते हैं। वायु को गठरी में
बाँध सकते हैं, अग्नि को भी एक बार में पी सकते हैं; समुद्र को भी निगल सकते हैं लेकिन यह मन कभी भी
आत्मस्वरूप में नहीं रह पायेगा। आकाश को तह करके रख सकते हैं; महामेरु को पुड़िया में बाँध सकते हैं;
शून्य का गला टीप सकते हैं लेकिन इस मन का नियमन असम्भव है। सचमुच काल पर भी विजय प्राप्त की जा
सकती है; त्रिभुवन की सत्ता भी प्राप्त की जा सकती है; परन्तु हे अच्युत ! मनोनिग्रह की बात तुम्हारे बिना कैसे
साध्य होगी? मन तपस्वी लोगों को तत्काल धोखे में डालता है; मन नेमी लोगों का नियम टालता है; इस प्रकार
यह मन बल से भी अधिक बलशाली है। वह धैर्य की राख कर देता है। मन इन्द्र को नीचा दिखाता है, ब्रह्मदेव
को भी हठ से अटकाता है; इस प्रकार मन की जिद बहुत खराब है; उसे साधक अपने वश में नहीं कर सकते।
साधना करके मन कितना भी थक जाय, लेकिन मन पर विजय नहीं प्राप्त होती। हे अच्युत ! तुम्हारे बिना यह
मन नियमित नहीं होता। यदि अत्यन्त प्रयास करने से मनोजय प्राप्त हो भी जाय तो सिद्धियों का ढेर लग जाता है
और उससे साधकों का मन असमंजस में पड़ जाता है। तुम्हारी कृपा हुए बिना साधक मन को कभी वश में नहीं
कर सकते। तुम जनार्दन यदि सन्तुष्ट हो जाओ तो मन स्वयं ही अपना मनपन भूल जाता है। सारांश, भक्तिभाव से
तुम्हारी शरण में गये बिना साधक अपने मन को वश में नहीं कर सकते। इसलिये मनोनिग्रह के लिये तुम्हारी
शरण में आना ही पड़ेगा।
अथात आनन्ददुधं पदाम्बुजं हंसाः श्रयेरन्नरविन्दलोचन।
सुखं नु विश्वेश्वर योगकर्मभिस्त्वन्माययामी विहता न मानिनः ॥ ३ ॥
हे कमलापति ! हे कमलवदन ! हे कमलालय ! हे कमलनयन ! नाभिकमल में वास करने वाले ब्रह्मदेव को
तुमने ही ब्रह्मज्ञान दिया है। तुम्हारे चरणों का चरणामृत तुम्हारी कृपा से जिसे प्राप्त होता है, उसका मनोजय
सुनिश्चित हो जाता है। वह सांसारिक सुख के प्रति विरक्त हो जाता है। तुम्हारे चरणामृत की माधुरी तत्काल
मनोजय का लाभ करा देती है। आधिव्याधियों का विनाश करती है जिससे साधकों को स्वानंद की राशि प्राप्त हो
जाती है। इसलिये इस सारे साधनों का सार, महासमर्थ सांख्य योग और विवेक का भी सार कहना चाहिये। हे
श्रीकृष्ण ! भक्ति को रहस्य जान कर हृदय के प्रेम के प्रति जो आकृष्ट हुए वे ही विज्ञानयुक्त राजहंस भजन सार
का सेवन करते हैं। जिनका काया, वाचा और मन सद्भाव से सदा सम्पन्न रहता है, ऐसे भक्तों को तुम्हारे चरण
परिपूर्ण स्वानंद प्रदान करने वाले हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये विधियुक्त साधनों से ही प्राप्त होते हैं। उन
साधनों में जरा भी कमी होने से साधकों की हानि होती है लेकिन तुम्हारी भक्ति वैसी नहीं है। जीव-भाव से तुम्हें
भजने से भजन करने वालों पर कोई विघ्न नहीं आता। इसके विपरीत भक्त ही विघ्नों का नुकसान करता है। सूर्य
और जुगनू की यदि आराम से भेंट होगी, तभी विघ्न भक्तों के पास आने का साहस करेंगे। सिंह की गन्ध आते
ही मदोन्मत्त हाथी भी भागने लगते हैं। उसी प्रकार तुम्हारे भक्तिभावयुक्त भजन से विघ्न भागने लगते हैं। ऐसे
निश्चय से सम्पन्न होकर जो तुम्हारे चरणों के पास अनन्य भाव से आते हैं, उन्हें जन्म-मरण भी स्पर्श नहीं
करता, फिर अन्य विघ्नों की क्या बिसात है? ऐसी भावना से जो तुम्हारी शरण में आते हैं, उन्हें तुम्हारे चरण,
कामधेनु जिस प्रकार वत्स को तृप्त करती है, उसी प्रकार स्वानंद से सदा तृप्त करते हैं। भक्तिरूप निर्मल सरोवर