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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 776, कुल 869 में से

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पृष्ठ 776

७६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
लिया है ऐसे लोगों के सौजन्य से भी अधःपतन होता है। विष खानेवालों की पंक्ति में जो पुरुष अन्न की आशा से
बैठेगा उसे, बिना बुलाये ही मृत्यु का निमंत्रण प्राप्त हो जायेगा। इसलिये ऐसे लोगों की संगत नहीं करनी चाहिये,
उनसे बात भी नहीं करनी चाहिये; उनके घर कभी नहीं जाना चाहिये, जीवभाव से उनका त्याग ही करना
चाहिये। उनके मुँह नहीं लगना चाहिये, उनके मार्ग पर नहीं चलना चाहिये, जो ज्ञान के अभिमान में भूल जाते
हैं, वे अपने हित से वंचित हो जाते हैं। उन्हें अपने घर नहीं जाना चाहिये, स्वयं उनके घर नहीं जाना चाहिये। जो
अभिमान से लुट जाते हैं, उनसे कोई बात नहीं करनी चाहिये। उनसे बाजार में भी नहीं मिलना चाहिये; उन्हें
आँखों से देखना भी नहीं चाहिये; धर्मशील मनुष्य के लिये जिस प्रकार परनिंदा त्याज्य है, उसी प्रकार उसे भी
पूरी तरह त्याज्य समझना चाहिये। वेदशास्त्रों का मतितार्थ अद्वैत परमार्थ जो स्वार्थ सिद्ध करने वाला है, उसे जो
नहीं पसन्द करते हैं, उनके यहाँ अनर्थ विचरता रहता है। इसीलिये उनकी संगत से दूर रहना चाहिये। अब
साधकों के योग का स्वरूप और उसमें आने वाले विघ्नों की निवृत्ति श्रीकृष्ण बताते हैं।
योगिनोऽपक्वयोगस्य युञ्जतः काय उत्थितैः ।
उपसर्गैर्विहन्येत तत्रायं विहितो विधिः ॥ ३८ ॥
योगी योगाभ्यास प्रारम्भ करता है तो उसके पूर्ण होने के बीच अनेक प्रकार के विघ्न उसे कष्ट देते हैं।
शरीर में कोई रोग ही उत्पन्न होता है; अथवा विषय का विकार खलबली मचा देता है; अथवा जल्दीबाजी या
भ्रान्ति के कारण संकट आता है; या विकल्प उत्पन्न होकर ही योग का भंग होता है। अथवा ज्ञान का अहंकार ही
बहुत बढ़ जाता है जिससे दूसरों के गुणदोषों की कुचेष्टा करना यही एकान्त में बात करने का विषय बन जाता
है। कभी देह में शीत बढ़ जाता है या ऊष्मा बढ़ जाती है; प्राणवायु गलत राह पकड़ लेता है या क्षुधा अधिक
बार लगने लगती है। कभी कल्पना का भय तथा प्रकाश दर्शन आदि विघ्न उपस्थित हो जाते हैं अथवा पराया
धन और परस्त्री का चस्का लग जाता है। इस प्रकार के अनेक उपसर्ग आते हैं। उन्हीं के निवारण के लिये
श्रीकृष्ण उपाय बताते हैं।
योगधारणया कांश्चिदासनैर्धारणान्वितैः ।
तपोमन्त्रौषधैः कांश्चिदुपसर्गान् विनिर्दहेत् ॥ ३९ ॥
देह में ठंडक बढ़ने पर, अग्निधारण करने से उसका निवारण होता है; देह में उष्णता बढ़ने पर सोमधारणा
करने से वह दूर होती है। अकस्मात् वायु वाममार्ग पर चला गया हो तो देह में वायु भर लेना चाहिये, वायु में
वायु मिलने पर, अभ्यास से वह पूर्व स्थिति पर आ जाता है। कभी-कभी जब वायु का क्षोभ बढ़ कर उसका
दबाव पेट पर होता है, तब क्षुधा अत्यन्त बढ़ जाती है, कभी खाने से तृप्ति नहीं होती। ऐसे समय प्राणवायु का
उत्सर्ग कर अपानवायु को अन्दर करें। वह जठर की ओर आता है तो क्षुब्ध हुआ प्राणवायु सहज ही उधर ही
आता है। उस समय साधक को प्राण और अपान की एकता सहज ही प्राप्त होती है; फिर षट्चक्र भेद कर
निकलने में क्षणभर का समय भी नहीं लगता। तब साधक को सत्रहवीं को अमृतपान करने का अवसर प्राप्त
होता है। इस प्रकार योगी क्षुधा की बाधा को समाप्त कर देते हैं। अब हे उद्धव! परद्रव्य और परस्त्री पर आसक्ति
होना, पापों का फल है। उसका निवारण करने के लिये तपश्चर्या ही एकमेव साधन है। भक्तिभाव से मंत्रों का
अनुष्ठान करने से वैराग्य उत्पन्न होता है; उस वैराग्य से साधक की विषयवृत्ति का सहज ही निर्दलन होता है।
शुद्ध मंत्रों का पुरश्चरण सभी विघ्नों का नाश करता है। उससे पिशाच बाधा का भी समूल विनाश होता है। शरीर