श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 781, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंअट्ठाईसवाँ अध्याय ७६५
व्याख्या है लेकिन वह मायिक ज्ञान सम्बन्ध है क्योंकि आत्मवस्तु सत् भी नहीं है और असत् भी नहीं है, उसी
प्रकार वह चित् भी नहीं है और अचित् भी नहीं है। उसे सुख दुःखातीत तथा सन्मात्रस्वरूपी समझ लो। इस
प्रकार अट्ठाईसवें अध्याय का यह आत्मबोध आनन्दकंद श्रीकृष्ण ने सन्तुष्ट होकर उद्धव को दिया। निजधाम
जाना स्थगित कर श्रीकृष्ण ने अपनी गुप्तनिधि उद्धव को दी। उसके भाग्य का वर्णन किन शब्दों में करें? जो
अपने पिता वसुदेव को नहीं दिया, अपने बन्धु बलिभद्र को नहीं दिया, पुत्र प्रद्युम्न को नहीं दिया, वह उद्धव को
दिया। जो माँ देवकी को नहीं दिया। फूफी कुन्ती को नहीं दिया, यशोदा को भी नहीं दिया, वह उद्धव को दिया।
आप कहेंगे कि यह तो अर्जुन को भी बताया था। वह भी उसका लाडला था यह सच है; लेकिन उसके हाथ से
पृथ्वी का बोझ कम हो इसलिये उसे जल्दबाजी में युद्ध में उपदेश दिया था। उद्धव की बात वैसी नहीं थी। उसे
उसने निश्चित रूप से अपने निर्णय की बात अर्थात् गुप्त निधि उसे सौंपी। पिता की कमाई का धन, उसका
स्वामित्व उसके पुत्र के पास आता है; उसी प्रकार श्रीकृष्ण के गूढ़ ज्ञान का हकदार उद्धव बन गया। पाण्डवों में
अर्जुन धन्य है और यादवों में उद्धव धन्य है। त्रिभुवन में इन दोनों के जैसा भाग्य किसी का नहीं दिखायी देता।
सारे सार का सार यह एकादश स्कंध का अट्ठाईसवाँ अध्याय है। संन्यासियों में जिस प्रकार परमहंस श्रेष्ठ हैं,
उसी प्रकार पूरे भागवत में यह अध्याय श्रेष्ठ है। जिस प्रकार क्षीराब्धी में शेष और उसके ऊपर नारायण है, उसी
प्रकार भागवत में भी यह अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्णब्रह्मरूप है। जिस प्रकार परमपावन वैकुण्ठ में भगवान
शोभायमान हैं, उसी प्रकार भागवत में अट्ठाईसवाँ अध्याय शोभा दे रहा है। ऐसा लोकोत्तर वैभव कृष्ण की कृपा
से उद्धव को प्राप्त हुआ। उसके निजभाग्य की गति अत्यन्त तीव्र है। वह स्वयं ही ब्रह्मस्वरूप हो गया। उद्धव
पूर्णब्रह्म हो गया उसका प्रमाण कृष्ण कृपा ही है। मैं अज्ञानी, प्राकृत देशी भाषा में उसका वर्णन कर रहा हूँ।
अन्धे पर जब सूर्य प्रसन्न हो जाता है तो वह पृथ्वी के भीतर का गुप्त खजाना भी देख पाता है, उसी प्रकार
जनार्दन प्रकट होकर यह गुप्त ज्ञान मुझसे कहलवा रहा है। जनार्दन अब प्रकट हुआ यह कहना भी मेरी मूर्खता
ही है क्योंकि वह तो सदासर्वदा स्वतः सिद्ध ही है। लेकिन यह भी उसकी ही कृपा से मालूम हुआ। उसकी कृपा
ने मेरा 'मैं'पन' भी समाप्त कर दिया। जिस प्रकार सूर्य अँधेरे को ले जाता है वैसे ही वह मेरा 'मैं'पन' ले गया।
जनार्दन मुझ पर कृपा करता है यह भी मुझ अज्ञानी को मालूम नहीं होता। उस दयाघन ने कृपा करके यह
गुह्यज्ञान मुझसे कहलवाया। वह मेरे सान्निध्य में होते हुए भी मुझे उसकी महिमा नहीं मालूम हुई। उसने अपनी
महिमा स्वयं ही मेरे मुख से कहलवायी। जिसे मैं 'मेरा मुख' कहता हूँ, वह भी सचमुच जनार्दन ही बन गया है।
उस मुख से निःशंकर आत्मसत्ता से ही आत्मसुख कहलवाया। सारांश, मेरे नाम से भले ही कविता दिखायी दे
रही हो लेकिन उसका वक्ता जनार्दन ही है। उसी ने अपने वक्तृत्व से यह रसमयी कथा चलायी है। ब्रह्मरस से
सनी हुई कथा अर्थात् श्रीभागवत का निरूपण उसी ने किया है। उसमें अट्ठाईसवाँ अध्याय तो वास्तव में
ब्रह्मस्वरूप की तल्लीनता है। अट्ठाईसवें अध्याय का निरूपण वस्तुतः परिपूर्ण ब्रह्म ही है। उसका श्रद्धा से श्रवण
करने के कारण उद्धव ने पूर्ण समाधान प्राप्त किया। उद्धव स्वयं तृप्त तो हुआ लेकिन उसने विचार किया कि यह
शुद्ध आत्मज्ञान अवश्य है लेकिन वह निर्बल और अज्ञानियों को प्राप्त होना कठिन है। अतः इस चित्स्वरूप की
प्राप्ति साधकों को कैसे सुलभ होगी, इसकी विनती वह अगले अध्याय में करेगा। पर्वत की चट्टान काट कर मार्ग
बनाया जाय या ऊँचाई चढ़ने के लिये सीढ़ियाँ बनायी जायँ ताकि सुगम रीति से निर्गुणत्व तक पहुँचा जा सके,
वह उपाय उद्धव पूछेगा। तो अगला अध्याय सुरस होते हुए साधकों को परमार्थ सिद्धि कराएगा। दुर्बल पुरुषों को
तैरने की अपेक्षा पैदल चलकर ही संसार समुद्र पार करना चाहिये। श्रीकृष्ण इसके लिये सरल उपाय बतायेंगे।