श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
में नवविधा रसों का मधुर जल होता है, उसमें डूबे हुए तुम्हारे चरणकमल भावार्थ सूर्य के उदय के साथ ही
विकसित होते हैं। उसमें स्वानुभवी भ्रमर उन कमलों पर झपट्टा मारकर, आहिस्ते से, केसर को धक्का दिये बिना
सौख्यरूपी मकरंद का सेवन करते हैं। वहाँ आत्मानात्मविवेक करने वाले परमहंस उस सरोवर के राजहंस हैं। वे
तुम्हारे चरणकमलों के सान्निध्य में रहकर सरस मकरंद का उपभोग करते हैं। आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी भक्त ही
क्यों न हों, वे भी उसी सरोवर में रहते हैं, लेकिन उन्हें कमल के मकरंद के बारे में मालूम नहीं रहता। वे कमल
के तल के पास क्रीड़ा करते रहते हैं। श्रीकृष्ण ! ऐसे भोले भक्तों को तुम तारते हो। इस प्रकार जो भी तुम्हारी
भक्ति करते हैं उनका कोई नुकसान नहीं होता। भक्तिभाव से तुम्हारा भजन करने से, उस भावार्थ से ही तुम प्रसन्न
होते हो और तुम्हारे प्रसन्न होते ही तुम्हारे चरण उस भक्त पर स्वानंद की परिपूर्ण वर्षा करने लगते हैं। तुम
विश्वमूर्ति और विश्वंभर हो; तुम ही ब्रह्मादि देवताओं के ईश्वर हो। तुम्हारा अभयहस्त एक बार मस्तक पर पड़ने
पर भक्तों को भवभार स्पर्श नहीं करता। तुम्हारी भक्ति ही तुम्हारा सत्कर्म है, तुम्हारा भाव ही उनका स्वधर्म है;
तुम्हें उत्तम नैवेद्य अर्पण करना यही भक्तों का बहुत बड़ा यज्ञ है। नित्य तुम्हारे नाम का स्मरण करना यही भक्तों
का जप है और तुम्हारा मनोरम कीर्तन करना यही भक्तों की परम समाधि है। इस प्रकार भक्त जो जो कर्म करते
हैं, वह कर्म तुम स्वयं ही हो जाते हो। तुम मेघश्याम श्रीकृष्ण जिस पर प्रसन्न होते हो उसे भवभ्रम स्पर्श नहीं
करता। इस प्रकार तुम भजन के द्वारा भक्तों को आत्मसुख देकर तारते हो और उनके सुख के आनन्द में झूमते
रहते हो। इस प्रकार भक्तों को अनपेक्षित ढंग से, निजसुख से परिपूर्ण करते हो। ऐसा होते हुए भी जो तुम्हारी
शरण में नहीं आते, वे माया के मोह में फँस जाते हैं। तुम्हारे चरणों से जो विमुख हो जाते हैं; वे स्वप्न में भी
सुख का दर्शन नहीं करते। वे सदा निरन्तर बढ़ने वाला दुःख ही भोगते रहते हैं। माया ने उन्हें इस सीमा तक मूर्ख
बनाया रहता है। तुम्हारे चरणों का ध्यान न कर योग यागादि साधन करने से वह साधकों के लिये बन्धन ही हो
जाता है क्योंकि ज्ञातापन की अकड़ से अभिमान क्षुब्ध होता है। पूर्वश्लोक का चरण, 'त्वन्माययाऽमी विहता न
मानिनः' यह श्लोक का अन्तिम चरण है। उसका विचार करने पर, उसमें पण्डितों का ज्ञानाभिमान और अभक्त
भाव ही प्रकट होता है। हम ज्ञाता, हम योगी, हम ही श्रोत्रिय सारे संसार में पवित्र; हमारा ही मार्ग अत्यन्त शुद्ध
है; लोग अज्ञानी हैं, वैसे हम नहीं हैं; हमारा वचन सबके लिये प्रमाण होना ही चाहिये। इस प्रकार ज्ञाता लोग
अपने मन में ऐसा ही समझते रहते हैं। इस ज्ञानाभिमान ने ही उन्हें मूर्ख बनाया रहता है। वे शब्द पांडित्य के
घमण्ड में अपार दुःख भोगते हैं। सारांश, संसार में अभिमान जैसा बैरी कोई और नहीं है। वह ज्ञानाभिमान से
सज्जनों को भी चक्कर में डाल देता है। खैर, इन अभक्तों की कथा रहने दीजिये। वे भक्तिमार्ग से भटके रहने के
कारण ही, देह के अहंकार से व्यर्थ नाना प्रकार की व्यथा भोगते हैं। लेकिन जो भक्ति पर अपना चित्त न्योछावर
कर तुम्हारी अनन्य शरण में आये हैं उनको तुम जगन्नाथ तारने वाले हो। तुम अपने भक्तों को आत्मसुख में रखते
हो। तुम्हारे जो भी भक्त हैं, जिन्होंने भक्ति पर ही अपने प्राण न्योछावर किये हैं, उन्हें बिना माँगे ही आत्मज्ञान की
प्राप्ति होती है। हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारा भजन करते रहने से, विघ्न भक्तों को कभी पीड़ा नहीं देते। वे अत्यन्त
सुखसम्पन्न हो जाते है कैसा आश्चर्य है ! जो अनन्य रूप से तुम्हारी शरण में आते हैं, तुम सदा उनके अधीन रहते
हो। इसी अर्थ का निरूपण उद्धव स्वयं सुना रहा है।
किं चित्रमच्युत तवैतदशेषबन्धो दासेष्वनन्यशरणेषु यदात्मसात्त्वम्।
योऽरोचयत् सह मृगैःस्वयमीश्वराणां श्रीमत्किरीटतटपीडितपादपीठः ॥४॥
हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारे भक्तों को विघ्नों की बाधा नहीं होती यह बहुत बड़ी बात नहीं है क्योंकि तुम भक्तों के