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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 783, कुल 869 में से

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पृष्ठ 783

उनतीसवाँ अध्याय

हे ओंकारस्वरूपी श्री सद्गुरु दयासागर ! तुम्हें नमस्कार ! तुम्हारी कृपा का कोई अन्त नहीं है। तुम अपनी
कृपा से जीव का उद्धार करते हो। हे कृपानिधि ! हे गुरुराया ! तुम जीवभाव दूर कर तथा जीवोपाधि नष्ट कर
भक्तों को संसारसमुद्र से तारते हो। तुम्हारी कृपालुता अद्भुत है। तुम जीव को मारते हो; उसका नामरूप शून्य
कर देते हो और समस्त जातिगोत्र का संहार कर देते हो। अपना-पराया की भावना का निर्दलन कर संसार को
संतान-विहीन कर देते हो। ऐसा प्राणप्रिय मित्र और सच्चे कृपालु तुम कैसे हो सकते हो ? जिस प्रकार अन्धकार
में दृष्टि काम करती है; उसमें कोटि-कोटि नक्षत्र और जुगनू दिखाई पड़ते हैं; लेकिन उन्हें अन्धकार के साथ सूर्य
ग्रस लेता है; उसी प्रकार साधकों की तुमसे भेंट है। तुमसे जब सचमुच ही भेंट होती है, और जब तुम कृपादृष्टि
करते हो तब संसारभेद की त्रिकुटी और त्रिगुण युक्त सृष्टि भी नहीं दिखायी देती। गुणों वाली सृष्टि न दिखाकर
अद्वय ब्रह्म दिखाते हो। एक बार तुमसे सचमुच भेंट होने पर, भेंट में कभी विराम नहीं होता। जो कभी दृष्टि को
नहीं दिखायी देता, उससे भेंट कैसे होगी ? और भेंट में कभी खण्ड नहीं पड़ेगा यह कैसे घटित होगा ? तो जिस
प्रकार गर्भ माँ के पेट में रहने से उसे नहीं दिखायी देता, फिर भी उनकी दोनों की भेंट होती रहती है, उसी प्रकार
साधक तुम्हारे पेट में ही रहते हैं। माँ बड़े प्यार से बच्चे का लालन-पालन करती है लेकिन वह जिस प्रकार माँ
को नहीं पहचानता; उसी प्रकार तुझ में अज्ञानी जन रहते हैं, उन्हें तुम अपने ही प्रेम से सँभालते हो। बालक का
जन्म होने पर माँ उसे अपनी बुद्धि से पालती-पोसती है उसी प्रकार तुम्हारे निजज्ञान से साधक भी संज्ञान होते हैं।
साधकों को तुम्हारा ज्ञान प्राप्त होते ही उन्हें 'मैं तू' का स्मरण नहीं होता। जीव अद्वयभाव से पूर्ण परमात्मा ही
बन जाता है और अपना जीवपन भूल जाता है। यदि सद्गुरु की कृपा न हो तो कोटि उपाय करने पर भी परमार्थ
से भेंट नहीं होगी। सद्गुरु की कृपा होने पर साधनों की आवश्यकता नहीं रह जाती। सृष्टि ब्रह्मानन्द से भर
जाती है और साधकों को आत्मानंद का लाभ मिलता है। सद्गुरु की कृपा होने पर उपनिषदों का अर्थ साधकों के
हाथ लगता है। श्रीगुरु की कृपा इतनी समर्थ है। इसीलिये उनकी कृपा से श्रीभागवत का शुद्ध और सरल
मथितार्थ मैंने प्राकृत में वर्णन किया। श्रीजनार्दन की कृपादृष्टि से ही मेरी अनाड़ी बातें, स्वानंद के जोश में,
निजबोध से एकादशस्कंध में प्रवेश कर सकीं। संस्कृत और प्राकृत भाषाएँ भिन्न होने पर भी उसमें निहित स्वानंद
की माधुरी ही ज्ञाता लोग सेवन करते हैं। गाय लाल हो अथवा काली हो, उससे दूध के स्वाद में अन्तर नहीं
आता। उसी प्रकार भाषा संस्कृत हो या पाली हो, उससे ब्रह्म में कोई अन्तर नहीं पड़ता (मैंने) एकनाथ ने दोनों
भाषाओं का तत्त्व बिना किसी भेदभाव के बतलाया। इसमें मेरा सखा जनार्दन मेरा सहायक है। उसकी कृपा से
ही अट्ठाईसवें अध्याय का गुह्य, गम्भीर और स्वानंदपूर्ण निरूपण किया। उसमें नानाप्रकार की उपपत्तियों से
आत्मज्ञान की युक्ति साधकर, निःशंक ब्रह्मस्वरूप का स्वयं श्रीकृष्ण ने वर्णन किया है। ब्रह्म अद्वयत्व से परिपूर्ण
है; उसमें हेतु, अनुमान, बुद्धि, युक्ति अथवा मन आदि का प्रवेश नहीं हो पाता। वहाँ दृश्य, द्रष्टा, दर्शन नहीं हैं;
ध्येय, ध्याता, ध्यान नहीं है; कर्म, कर्ता, कारण नहीं है; अथवा 'मैं' या 'तू' वाला भाव नहीं है। युक्तियाँ वहाँ
गतप्राण हो गयीं, दृष्टांत बेकार हो गये, प्रमाण अप्रमाण हो गये और ज्ञान के साथ विचार क्षीण हो गया। वहाँ न
वाचा है न मौन है, आकार है न शून्य है; न गुण है न निर्गुण है। इस प्रकार की ब्रह्मस्थिति कृष्ण की कृपा से
उद्धव को प्राप्त हुई; लेकिन वह दुर्बल अज्ञानियों को प्राप्त होना कठिन है; फिर वे लोग कैसे तर पायेंगे ?